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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

प्रारंभिक दौर का सिनेमा [1920-1950]

प्रारंभिक दौर का सिनेमा

जो अपने समय से बहुत आगे थीं (1920-1950 ) का दशक

डॉ संगीता गांधी

ईमेल rozybeta@gmail.com


 

 

भारत में फिल्में बनने की शुरुआत ‘राजा हरिश्चंद्र’ फ़िल्म से हुई। दादा साहब फाल्के ने इस फिल्म से  एक युग का आरम्भ किया।1931 की ‘आलम आरा’ फ़िल्म भारत की  पहली बोलती फ़िल्म थी।प्राम्भ में फिल्मों के विषय पौराणिक होते थे।मिथकीय चरित्र प्रमुख  होते थे।पारसी नाटकों पर भी फिल्में बनी। १९२० के दशक में महाभारत और रामायण के कथानक पर बहुत सी फ़िल्में बनी।सुचेत सिंह ने मृछ्कटिक फिल्म बनायीं ,जो संस्कृत नाटक पर आधारित थी। लव कुश ,कृष्ण सुदामा ,सैरंधरी आदि फ़िल्में पौराणिक कथानकों को लेकर बनाई गयीं।धीरे धीरे सामाजिक कहानियां भी चित्रित होने लगीं।

 हिंदी फिल्मों के उस प्राम्भिक दौर में भी कुछ ऐसी फिल्में थीं ,जो कथ्य ,विषय व प्रस्तुतिकरण में अपने समय से बहुत आगे थीं।

    .1917 में जब ब्रितानी सरकार ने भारत में 'सेंसरशिप एक्ट' लागू किया उस वक़्त इस एक्ट में सिर्फ एक धारा थी कि देश भक्ति का प्रचार करने वाली फिल्मों को रोक दिया जाए।नग्नता के खिलाफ इस एक्ट में कोई धारा नहीं थी।

भारतीय फिल्मों का शुरुआती दौर मूक फिल्मों का था।मूक फिल्मों में अधिकतर पौराणिक कथानक  लिए जाते  थे। इन पौराणिक फिल्मों में भी दो फिल्में ऐसी थीं  जिनमें बहुत खुलापन था। उस समय का समाज इतना  खुलापन स्वीकार नहीं कर पाता था।इसके बाद भी ये फिल्में बनीं।इनमें से एक थी --” सती अनुसूया “ ( 1921 )  इस फ़िल्म में नग्न दृश्य दिखाया गया था। एक दृश्य में सकीनाबाई नाम की एक अभिनेत्री को  नग्न दिखाया गया लेकिन ये सीन फिल्म में कुछ ही क्षणों के लिए था  और धुंधला था। दूसरी फिल्म थी --पति भक्ति (1922)

नाटककार आगा हश्र कश्मीरी के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित फिल्म ‘पति भक्ति’ के नायक उस समय के प्रसिद्ध अभिनेता मास्टर मोहन थे और हीरोइन की भूमिका एंग्लो-इंडियन लड़की पेशेंस कूपर ने निभाई थी। पति भक्ति पहली ऐसी फिल्म थी जिस पर ब्रिटिश सरकार के मद्रास सेंसर बोर्ड ने अपनी आपत्ति जताई थी। इस फिल्म के एक (डांस सिकवेंस) को हटाने की मांग की गई।   डांस को अश्लील माना गया। “ पति भक्ति “ विवाद में फंसने वाली  भारत  की पहली फिल्म बन गई।फिल्म में एक डांस की सेंसर शिप को लेकर काफी बवाल हुआ लोगों का कहना था ये डांस वल्गर है ...1922 में आई फिल्म 'पति भक्ति' में इटली की अभिनेत्री सिगनोरिना मिनैली ने भी कुछ बहुत ही बोल्ड दृश्य दिए।पति भक्ति में इतालवी अभिनेत्री सिगनोरिना मिनैली ने  खलनायिका की भूमिका निभाई थी।

1930 के दशक में अछूत कन्या , धूप-छांव ,महल ,चंडीदास ,पुकार,अमर ज्योति  आदि फिल्मों ने उस समय के समाज की कुरीतियों व देशभक्ति की भावना को प्रबलता से प्रस्तुत किया।

अछूत कन्या -फिल्म में ब्राह्मण नायक व हरिजन नायिका की कहानी उस समय के हिसाब से बहुत  क्रन्तिकारी थी।देविका रानी ने हरिजन लड़की का रोल किया था।चंडीदास में भी उच्च जाती के नायक व निम्न जाती की लड़की की कहानी थी।दोनों फिल्मों में समस्या को उठाया गया पर अंत दोनों का दुखांत था।

अमर ज्योति फिल्म में एक रानी के माध्यम से बन्धनों में जकड़ी स्त्री का प्रतीकात्मक चित्रं था।

पुकार --पौरस व सिकन्दर के ऐतिहासिक कथानक के माध्यम से देशभक्ति को बल देने वाली फिल्म थी।धूप-छांव फिल्म में पहली बार प्लेबैक गायन का प्रयोग हुआ था।

  1935 की फ़िल्म ‘ दुनिया न  माने ‘ स्वयं में बहुत प्रगतिशील फ़िल्म थी।नायिका थी शीला आप्टे।ये वो दौर था जब बाल विवाह ,कम उम्र की कन्या का दुगनी आयु के विधुर से विवाह एक आम बात थी।इस विषय को लेकर विद्रोह के स्वर नायिका उठा  सकती -- ये सोच से परे की बात थी।इस फ़िल्म में यही विषय था।वी शांताराम ने नारी के संघर्ष  को साकार कर दिया।एक सीन में टूटे हुए आईने के माध्यम से बूढ़े नायक की नपुंसकता का बिम्ब बहुत प्रभावी था।ये फ़िल्म ‘ वेनिस फिल्म फेस्टिवल ‘ में भी दिखाई गई थी।

 ‘ किस्मत ‘ इस दौर की एक अन्य  अपने समय से आगे की फ़िल्म थी।इसका नायक एक अपराधी था।अशोक कुमार ने नायक की भूमिका की थी।उस दौर में नायक की छवि बहुत भले इंसान ,त्यागवान सज्जन पुरुष की होती थी।एक चोर को नायक दिखाना समय से आगे की बात थी।

1935 की ही फ़िल्म ‘आदमी ‘में एक पुलिस वाले और वेश्या की कहानी थी।जो उस समय के हिसाब से बोल्ड थी।

इसी दशक में पडोसी फिल्म में हिन्दू -मुस्लिम एकता का बड़ा सन्देश दिया गया।एक ही रास्ता फिल्म में युद्ध से लौटे एक वृद्ध फौजी की कहानी दिखाई गयी।व्यवस्था से उसका संघर्ष दिखाता है की युद्ध लड़ना आसान है पर समाज के अंदर रह कर व्यवस्था से लड़ना कितना मुश्किल है।

१९३९ की अछूत फिल्म --बहुत महत्वपूर्ण है।२३ दिसम्बर १९३९ को हुए इसके प्रीमियर को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संबोधित किया था।अस्पृश्यता पर बनी इस फिल्म में कत्थक न्नृत्यांगना सितारा देवी थीं।

इसी दशक में ज़िन्दगी फिल्म आयी जिसमें एक क्रूर पति से त्रस्त महिला का किसी एनी पुरुष से प्रेम सम्बन्ध दिखाया गया।उस ज़माने में यह चित्रण साहस की बात थी।

1940 के दशक में सिकंदर ,राम राज्य ,अंदाज़ ,डॉ कोटनिस की अमर कहानी आदि फ़िल्में अपने नये कथ्य व शिल्प में बहुत बेहतरीन थीं।

राम राज्य --वो इकलौती फिल्म थी ,जिसे महात्मा गाँधी ने अपने जीवन काल में देखा।हॉलीवुड में टेन कमांडमेंट्स बनाने वाले सिसिल ने इस फिल्म की बेहद प्रशंसा की थी।

डॉ कोटनिस की अमर कहानी द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के चीन पर आक्रमण पर आधारित थी।भारत के डॉ कोटनिस चीन जा कर प्लेग के मरीजों का इलाज करते हैं।वहीँ एक चीनी लड़की से विवाह करते हैं और वहीँ उनकी मृत्यु होती है।

 “नीचा नगर “बहुत से लोगों ने इस फिल्म का नाम भी नहीं सुना होगा।1946 की फिल्म नीचा नगर भारत की पहली फिल्म थीजिसे अंतराष्ट्रीय कान फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार मिला था।फिल्म के  निर्देशक थे --चेतन आनंद , जिन्होंने बाद में हीर राँझा और हक़ीक़त ,हँसते ज़ख्म  जैसी लाजवाब फ़िल्में बनायी थीं। नीचा नगर फिल्म  में संगीत रविशंकर का था।सही मायनों में ये फिल्म उस दौर की बेहद यथार्थवादी फिल्म थी।

       फिल्म की कहानी एक शहर के दो हिस्सों की कहानी थी।एक हिस्सा जिसमें  शहर के बड़े बड़े अमीर रहते हैं और दूसरा हिस्सा जो नीचे बसा है जहां गरीब तबका रहता है।

किसी कारण सारा पानी प्रदूषित हो जाता है।अमीर हिस्से  को साफ करके सारे गंदे पानी की निकासी निचले हिस्से में कर दी जाती है।वहां जगह जगह गंदे पानी  की बाढ़ आ जाती है।

.एक सीन बहुत जबर्दस्त था।नीचे के शहर में पीने तक के लिए पानी नहीं है।सारा पानी गन्दा और बदबूदार है।एक बच्चा बहुत प्यासा है ---एक गड्ढे के पास जाता है ..उसमें मुंह डाल कर गन्दा पानी ही वो पी लेता है। बहुत मार्मिक दृश्य था --प्यास के आगे गटर का पानी भी सही लगता है फिल्म बहुत  यथार्थवादीथी।श्याम बेनेगल ,सत्यजीत रे  के रीयलिस्टिक सिनेमा से भी पहले ऐसी लाजवाब फिल्म हिंदी में बनी।वर्ग संघर्ष ,समाजवाद ,शोषण और पूंजीवादी व्यवस्था का बेजोड़ चित्रण नीचा नगर फिल्म में है।

मेहबूब खान की --’ रोटी ‘ ‘ओरत ‘समय को पीछे छोड़ती फिल्में थीं।  रोटी  में शेख  मुख़्तार हीरो थे और कथक नृत्यांगना सितारा देवी का एक महत्वपूर्ण रोल था।’ ओरत ‘फ़िल्म की कहानी पर ही 'मदर इंडिया ‘ बनी थी जो अपने समय को  चुनोती देने वाली फिल्म थीं।मदर इंडिया आस्कर के लिए  भी नामांकित हुई थी। आज तक मदर इंडिया ,सलाम बॉम्बे और लगान  ये 3 हिंदी फिल्में हैं जो आस्कर के लिए नामांकित हुई हैं।

आरम्भिक दौर की ये कुछ फ़िल्में हैं जिन्होंने नये सामाजिक मूल्यों ,कुरीतियों पर चोट ,नये विषयों व शिल्प  प्रयोगों की नींव रखी।1940 के बाद का सिनेमा जिन नई चुनोतियों को स्वीकार करता है --उनका आधार इन्हीं फिल्मों ने तैयार किया।

1950 के दशक की --समाधि ,जोगन ,संग्राम ,बाबुल ,दास्तान आदि फ़िल्में नये कथ्य लेकर सामने आयीं।उस दौर में इन फिल्मों ने 50लाख से लेकर 75 लाख तक का व्यापार किया।

हिंदी फिल्मों का ये प्रारम्भिक इतिहास दर्शाता है की बॉलीवुड आरम्भ से ही नई चुनौतियों को लेकर चला है।यहाँ मसाला फिल्मों से लेकर नये प्रतिमान स्थापित करतीं ऐसी फ़िल्में भी बनीं हैं ---जिन्होंने समाज को बदलते मूल्य दिए हैं।नये कथानक ,प्रस्तुतिकरण के नये तरीके ,नया शिल्प ,संगीत ,गीत  व समाज के बदलते आयामों को दर्शाती ये फ़िल्में सदा अविस्मरणीय रहेंगी।