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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

चंदायन के विविध पथ :अतीत वर्तमान समबन्धों की एक खोज

चंदायन के विविध पथ :अतीत वर्तमान समबन्धों की एक खोज

रीता दूबे

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

नई दिल्ली, 110067


                 

भारत कथाओं का देश है। लोरिक चंदा की कथा भी उन कथाओं  में से एक है इस कथा का प्रसार लोक पूरे उत्तर भारत में है।विद्वानों ने समय- समय पर इसकी कथाओं को एकत्रित करके उन्हें विश्लेषित करने का काम किया है। लोक कथाएँ केवल मनोरंजन का साधन मात्र नहीं है बल्कि वह लोक के भीतर सांस लेने वाले प्राणधारा को उसकी सभ्यता,संस्कृति और उसके विश्वासों को जानने का अहम् सूत्र है। भारतीय जीवन और संस्कृति का पूर्ण अध्ययन इनके अध्ययन के बिना अधूरा है। मानव समुदाय को एकता के सूत्र में बाँधने का काम भी इन लोककथाओं ने किया है।

वास्तव में लोक संस्कृति की कलात्मक और सृजनात्मक चेतना शिष्‍ट साहित्य के बीच अंतर्गमन करती  है, उसे प्रभावित करती है और उससे प्रभावित होती है। साहित्य के अंतर्गत आने वाली प्रथायें, अंधविश्वास, मुहावरे, पहेलियाँ, गीत, कथाएँ, अवदान और कथानक रूढ़ियाँ मानवविज्ञान की समाग्री है । मानवजाति के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहासलेखन की प्रक्रियाँ इनके विश्लेषण की बिना संभव नहीं है। इनके वास्तविक अभिप्रायों के बीच मानव संस्कृति की प्राणधारा संचालित है।

 

लोरिक चंदा की कथा का प्रसार लोक

                  लोरिक चंदा की कथा आम जनता के बीच इतनी प्रसिद्ध है कि  इस कथा के रूप किसी एक बोली और भाषा में नहीं अपितु कई बोली और भाषा में पाए जाते हैं । यह लोक कथा जितनी प्रसिद्ध भोजपुरी क्षेत्र में है उतनी ही ज्यादा महत्वपूर्ण अवधी, मैथली, मगही, छत्तीसगढ़,के प्रदेशों में भी है और इसके गाए जाने के संकेत गुजरात और महाराष्ट्र में भी मिलते  हैं । प्रस्तुत कथा के कई रूपों को विद्वानों ने लिपिबद्ध किया है । मिर्जापुर में गाए जाने वाली लोककथा को दो विद्वानों क्रमशः काव्योपाध्याय और विलियम क्रुक द्वारा प्रस्तुत किया गया है । छतीसगढ़ में प्रचलित रूप को वैरियर एलविन1  और श्यामचरण दुबे2 ने तैयार किया है । बिहार से शरदचंद्र मित्र3 द्वारा एकत्रित रूप विद्वानों के सामने है । गाजीपुर के भोजपुरी और इलाहबाद के अवधी रूप को नित्यानंद तिवारी4 ने रामसेवक यादव और छेदीलाल की सहायता से एकत्र किया है । साथ ही बुलेटिन आँफ दी स्कूल आफ ओरियंटल स्टडीज लंदन में ग्रियर्सन5 ने लोरिक के जन्म की कथा के दो मगही रूपांतर दिए हैं । नित्यानंद तिवारी के अनुसार- “सम्पूर्ण कथा केवल भोजपुरी और अवधी रूपों में प्राप्‍त  हो सकी है,शेष अपूर्ण है, या यह भी कहा जा सकता है की उन विशेष स्थानों पर उतने ही अंश के गाए जाने का प्रचलन है।”6 लोक में प्रचलित जितने रूपों की चर्चा अब तक की जा चुकी है उनमे लोरिक चंदा की सम्पूर्ण लोक कथा को एक साथ एकत्र करने का महत्वपूर्ण कार्य  डॉ० श्याम मनोहर पाण्डेय  ने किया है उन्होंने इस लोककथा के चार विभिन्‍न रूपों को अलग अलग खण्डों में प्रकाशित किया है । भोजपुरी लोरिकी, लोक महाकाय लोरिकी, लोक महाकाव्य चनैनी और लोकमहाकाव्य लोरिकायन । इन चार रूपों में लोरिक चंदा की पूरी कथा प्राप्‍त हो जाती है जो निम्‍न महत्वपूर्ण भागों में विभाजित है -   

1-लोरिक का विवाह

2-मलसावर का विवाह

3-चनवा का उढ़ार

4-नेउरी का युद्ध

5- लोरिक की गउरा वापसी

लोरिक चंदा की कथा का साहित्यिक रूपांतरण:  लोरिक चंदा की इस लोककथा की  प्रसिद्धि इतनी ज्यादा थी कि विद्वान् भी इससे मुख न मोड़ सके और अनेक मध्ययुगीन कवियों ने इस लोक कथा पर आधारित साहित्यिक कृतियों का लेखन किया । सर्वप्रथम अवधी में 1379 ईस्वी में मुल्ला दाऊद ने “चंदायन” की रचना की । चंदायन को हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रथम ज्ञात सूफी रचना के रूप में मान्यता मिली हुई है। दौलत काजी कृत ‘सती मयना उ लोर चंद्रानी’, गवासी कृत “मैना सतवंती”, साधन रचित “मैनासत” हमीदी कृत “इस्मात्नाम” भी रची गई।

 दाउद कृत चंदायन : लोरिक और चंदा की लोककथा को आधार बनाकर जितने भी साहित्यिक कृतियों की रचना की गई उनमें चंदायन प्रमुख है।चंदायन की कथा इस प्रकार शुरू होती है कि  राजा सहदेव महर के घर एक कन्या का जन्म होता है जिसका नाम चांदा रखा जाता है । बारहवें मास तक उसके सौन्दर्य की ख्याति दूर-दूर तक फैल जाती है  और चार वर्ष की उम्र में उसका विवाह वीर बावन से होता है । यह ‘चंदायन’  के कथानक की पहली महत्वपूर्ण घटना है

चांदा जब सोलह वर्ष की हुई तब भी उसे अपने पति का संसर्ग न मिला । जिससे वह दुःखी रहने लगी और उसने अपनी सास को इसके बारे में बताया  पर उसने भी ध्यान न दिया । इस व्यवहार से क्षुब्ध चंदा अपने मायके वापस आ जाती है । चांदा का अपने क्लीव पति को छोड़कर मायके वापस आ जाना विशेष महत्व की घटना है । गोबर में घूमते हुए बाजुर ने धवलगृह पर खड़ी चांदा को देखा, चांदा को देखते ही वह बेसुध हो गया । होश में आने पर राजा रूपचंद के पास जाकर उसने चांदा के सौन्दर्य की प्रशंसा की जिसके फलस्वरूप राजा रूपचंद ने गोबर पर आक्रमण किया ।

महर के आग्रह पर लोरिक अपने सैनिकों को लेकर रूपचंद पर आक्रमण करके उसे परास्त करता है। चंदा को गोबर और उसका स्वयं का उद्धार करने वाले को देखने की साध हुई । अपनी इस इच्छापूर्ति के लिए चंदा ने अपने धवलगृह से लोरिक को देखा और देखते ही उसके वशीभूत हो गई । इस प्रथम द्रष्‍ट्‍या प्रेम ने आगे की कथा में महत्वपूर्ण योगदान दिया । इसी के फलस्वरूप चंदा ने भोज का आयोजन कराया ताकि वह दुबारा लोरिक को देख सके, लोरिक ने इसी भोज के समय चंदा को देखा और देखते ही अपने सुध-बुध खो बैठा । वह धाय के समझाने पर योगी बनकर मन्दिर में बैठता है, जहाँ उसे पुनः चंदा का दर्शन होता है और बाद में वह चंदा से मिलने उसके धवलगृह जाता है ।

चंदा व लोरिक गोबर से भाग जाने का निश्‍चय करते हैं । दोनों गोबर छोड़कर प्रस्थान करते हैं, लेकिन रास्ते में उन्हें तरह-तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। चंदा दो बार सर्पदंश का शिकार होती है । यहाँ कथानक तीव्र गति से आगे बढ़ता है, लोरिक उसके लिए मृत्यु का वरण करने को भी तैयार है इधर मैना लोरिक के विरह में दिन रात रोती रहती है । एक दिन एक बनजारे द्वारा वह अपना विरह सन्देश लोरिक तक पहुँचाती है । लोरिक मैना का विरह सन्देश सुनकर गोबर वापस आता है ।

इसके आगे की कथा का पता नहीं चलता है लेकिन कई जगह की लोककथाओं में घर आगमन के बाद युद्ध करते हुए  लोरिक की मृत्यु हो जाती है।दाउद ने भी अपनी कथा में लिखा है कि जिसने भी इसे सुना वह मुरझा गया इससे अंदाजा लगाया जा  सकता है कि इस लोककथा का अंत दु:खद है।

दौलत काजी कृत “सती मयना उ लोर चंद्रानी7-  दौलत काजी ने लोरिक और चंदा की इस प्रसिद्ध लोक कथा को देखकर इस पर आख्यान लिखना आरम्भ किया । विद्वानों के अनुसार संभवतः 1622-1628  ईस्वी के बीच दौलत काजी ने इस रचना का लेखन आरम्भ किया, लेकिन इस रचना के प्रारम्भ करने के थोड़े दिनों बाद ही दौलत काजी की मृत्यु हो गई । जिसके कारण उसके बाद की कथा को उनके दरबार के अलाओल ने इसे पूरा किया इसकी कथा इस प्रकार है –एक राजा था जिसकी पुत्री का नाम मैनावती था,वह पार्वती के सामान अपूर्व सुंदरी थी । सुंदरी होने के साथ ही साथ वह मृदुभासी और पतिव्रता भी थी । अपने पति की शंकर के सामान सेवा करती थी उसके पति का नाम लोरक था और वह भी सारे गुणों से सुशोभित था इतना ही नहीं वह दुर्जय, वीर, साहसी और निर्भय भी था ।  एक बार वह मैनावती को छोड़कर विहार के लिए चला जाता है लेकिन इतना ही नहीं वह मैनावती को त्यागकर दुःखी नहीं होता है ,वरन वन में नाना प्रकार से विहार करता है और सभी तरह के सुख भोगता है । इसी समय वन में उसे एक योगी मिलता है जो उसे एक सुन्दर स्‍त्री का चित्र दिखाता है उस चित्र को देखकर राजा लोरक अपना सुध-बुध खो देता है।

 लोरिक उस चित्र के बारे में योगी से पूछता है तो योगी उसे बताते हुए कहता है कि यह चित्र चंद्रानी का है, चंद्रानी नाम की स्त्री का विवाह वामन नामक पुरुष से होता है लेकिन देर रात तक नृत्यगीत का आनन्द लेने के बाद वामन पैर फैलाकर सो गया और रूपसी चंद्रानी से बात तक न की, चंद्रानी रात भर रोती रही, वामन सुबह होते ही उठकर शिकार करने चला गया । चंद्रानी की माँ चंद्रानी का हाल चाल जानने के लिए आई तो राजकुमारी ने सारी व्यथा माता से कह दी। रानी ने वामन से इसका कारण पूछने का निश्‍चय किया लेकिन वामन पर किसी भी बात का असर न हुआ। इन सारी बातों से आहत चंद्रानी ने यह निश्‍चय किया की वीर वामन से अलग रहेगी, रानी ने उसकी यह बात मान ली और और उसके लिए एक भवन का निर्माण करा दिया जिसमे वह अपने सखियों के साथ रहने लगी  और कभी-कभी पर्व त्यौहार के समय देव मंदिर में दर्शन करने के लिए जाती है । उस समय नगर के और नगर के बाहर के सारे लोग उसकी एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़ते हैं, योगी ने आगे का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार मैं भी मंदिर में समाधि लगा कर बैठा हुआ था,उसी समय मैंने चंद्रानी को देखा था और देखते ही बेहोश गया था और तीन दिन और रात संज्ञाहीन पड़ा रहा । संज्ञा लौटने पर मैंने उसका एक चित्र बनया और उसे लेकर घूम रहा हूँ। इसके बाद योगी ने राजा को गौहरी देश जाने का मार्ग बताया । लोरक अपनी सेना के साथ गौहरी देश की ओर चल पड़ा। राजा मोहर ने लोरक की अगवानी की,राजा लोरक चंद्रानी को देखने के लिए उत्सुक था । गन्धर्व का रूप लेकर लोरक राजा मोहर के दरबार में पहुँचा, चंद्रानी गन्धर्व रूप धारण किये हुए लोरक को देखकर उस पर मोहित हो गई और धाय को अपनी व्याकुलता बताई, धाय ने उन दोनों को मिलाने का वचन दिया और कुछ समय बाद दोनों को मिलने का मौका दिया । लोरक चंद्रानी को लेकर राज्य छोड़कर चला गया। वीर वामन ने भागते हुए लोरक और चंद्रानी का पीछा किया, लेकिन लोरक और वीर वामन के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें  वामन मारा गया । राजा मोहर ने लोरक और चंद्रानी का विवाह करा दिया और अपना राज्य भी लोरक को दे दिया । इधर कवि मैना की कथा पर वापस आता है और बताता है की लोरक के जाने के बाद अतिसुंदरी मैनावती के लिए कई देश के राजकुमार व्याकुल रहने लगे।                                                                                           शुक पक्षी सहित एक ब्राम्हण को लोरक के पास सन्देश लेकर भेजा । ब्राह्मण ने लोरक को समझाया और लोरक गौहर का राज्य अपने पुत्र को सौपकर चंद्रानी के साथ अपने नगर को लौट आया,लोरक मैनावती और चंद्रानी तीनो सुखपूर्वक रहने लगे ।  

गवासी कृत “मैना सतवंती8-   गवासी ने इस कथानक में इस बात का संकेत दिया है कि  उन्होंने इस कथा को दिल्ली में सुना और देखा था । उन्होंने स्वंय स्वीकार किया है कि  यह कथा फ़ारसी में थी और मैंने इसे दखिनी में अनुवाद किया है । गवासी के सामने शायद हमीदी कृत ‘इस्मतनामा’ की प्रति रही होगी । क्योंकि हमीदी कृत ‘इस्मतनामा’ 1608 ईस्वी में लिखी गई। गवासी का 1650 में  देहांत हो गया था, इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है की गवासी के सामने “इस्मतनामा” रही होगी और गवासी जिस फ़ारसी कृति की बात कर रहें हैं वह ‘इस्मतनामा’ ही है । इसकी कथा इस प्रकार है कि लोरक और राजा गंभीर की बेटी में प्रेम हुआ। राजा ने दोनों का विवाह करा दिया,लोरक और मैना दोनों सुखपूर्वक रहने लगे लेकिन एक बार दैवीय प्रकोप के कारण उनका सारा राज्य,सुख वैभव नष्‍ट हो गया वो दर-दर भटकने लगे और अपना राज्य छोड़कर परदेश चले गए । अपने गुजारे के लिए लोरक ने चरवाहे का काम करना शुरू कर दिया । उसी समय उसने एक सुंदरी को देखा जिसका नाम चंदा था,उसका पति मुर्ख और गवार था । चंदा और लोरिक दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गए । लोरक ने चंदा के साथ नगर छोड़ दिया,इसकी शिकायत नगर के राजा तक पहुँचती है तो राजा इस बात से अप्रसन्‍न होने के बजाय खुश हो जाता है क्योंकि अब सुंदरी मैना का पति लोरक नगर से बाहर है और उसे मैना से मिलने का अवसर मिल सकेगा ।

    इसके  आगे के कथानक का पता नहीं चल पाता है ।

साधन रचित मैनासत:9  माताप्रसाद गुप्‍त ने इसका रचनाकाल 1567 ईस्वी माना है । और बिहार के खानखाह में विद्यमान मैनासत की प्रति से इसका रचनाकाल 1506 ईस्वी प्राप्‍त होता। इनके अनुसार बर्नापुरी नामक राज्य में लालानशाह नामक एक महाजन रहता था, उसकी मैना नामक अत्यंत रूपवती स्‍त्री थी, एक बार नगर के महाजनों ने व्यपार के लिए पारदीप जाने का निश्‍चय किया तो लालानशाह भी उनके साथ जाने का इच्छुक हुआ, वह एक वर्ष में लौट आएगा यह कहकर वह परदेश चला गया । पति के जाने के बाद मैना अकेली हो गई, और उदास भी रहने लगी।इसी बीच नगर के एक राजकुमार की दृष्‍टि अटारी पर बैठी मैना पर पड़ी और वह उसे पाने के लिए लालायित हो उठा और अपना सन्देश देकर रतना नामक मालिन को मैना के पास भेजता है। मैना ने मालिन का आदर सत्कार किया, उसे घर में स्थान दिया, मालिन अपना दावं चलती है और कहती है कि हे मैना तू इतनी मैली कुचैली क्यों रहती है । तू साज श्रृंगार क्यों नहीं करती? मैना ने उत्‍तर दिया कि मेरा पति परदेश चला गया है तो मैं किसके लिए श्रृंगार करूँ पूरी रचना में  साधन ने वर्ष के बारहो महीने के प्रसंग में दूती रतना द्वारा कामोद्वीपक उक्‍तियाँ कहलाई हैं और प्रत्येक बार मैना ने उस उक्‍ति के बाद सत की महिमा का बखान किया है । इस प्रकार के संवाद के द्वारा साधन ने कृति को बहुत ही ज्यादा आकर्षक बना दिया है । उसी समय एक संदेशवाहक पत्र लेकर आया और उसने सन्देश दिया कि परदेश गए हुए सारे लोग नगर को वापस आ रहें हैं यह सुनकर मैना के हर्ष का ठिकाना न रहा । मैना ने श्रृंगार किया और अब वह पूर्णिमा के चाँद की तरह दिखने लगी सारी सखियाँ मिलकर मंगलगीत गाने लगी मैना हर्ष से भर उठी  और अपने पति के साथ सुखपूर्वक  रहने लगी।

 हमीदी कृत इस्मतनामा 10हमीदी ने अपने ग्रन्थ की रचना 1608 ईस्वी में फ़ारसी में की  ।इस्मतनामा की कथा में मैना एक राजा की लड़की है और अत्यंत रूपवती है उसका विवाह लोरिक नामक वीर पुरुष से हुआ लेकिन लोरक चाँद नामक सुंदरी पर आसक्‍त होकर उसे लेकर कहीं दूर चला गया सातन नामक राजकुंवर ने दूती द्वारा मैना को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया परन्तु मैना ने अपने सत की रक्षा बड़ी दृढ़ता से की । चाँद की मृत्यु हो जाने पर लोरिक वापस मैना के पास लौट आया,दोनों सुखपूर्वक रहने लगे । हमीदी ने अपनी रचना को अन्योक्‍ति का रूप दिया है । इस्मतनामा में लोरक ईश्‍वर का प्रतीक है, मैना आत्मा है, सातन शैतान और कुटनी वासना है। ईश्‍वरोन्मुखी आत्मा को शैतान वासना के माध्यम से ईश्‍वरविमुख करने का प्रयास करता है।

 लोरिक चंदा की कथाओं का प्रसार लोक कितना व्यापक है इसका पता इस बात से सहज ही हो जाता है कि यह कथा हिन्दी में दाऊद के चंदायन के साथ ही फ़ारसी में,मुल्ला गवासी के मैना सतवंती के रूप में दक्खिनी में और दौलत काजी कृत सती मयना उ लोर चंद्रानी के रूप में बांग्ला में भी रची गई । बाद में हजारी प्रसाद द्ववेदी ने भी अपने उपन्यास ‘पुनर्नवा’ में इस कथा का इस्तेमाल किया है । चंदायन और पुनर्नवा को छोड़कर प्रत्येक रचना में कथा का  मूल आधार मैना का सतीत्व है । मैना का सतीत्व ही वह महत्वपूर्ण बिंदु है जिसके चारों तरफ कथा घुमती है । एक स्‍त्री को पतिव्रत धर्म का निर्वाह कैसे करना चाहिए, किस प्रकार दूसरे पुरुष से अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए, और किस प्रकार अगर पति नपुंसक भी है या  फिर वह दूसरे स्‍त्री के मोह में है या उससे सम्बन्ध रखता है तब भी अपने पती को ही अपना आराध्य मानना चाहिए । इसी बात की जानकारी इन कथाओं के माध्यम से हो पाती है । इन कृतियों को पढ़ते समय एक जिज्ञासा मन में हमेशा रही कि वह कौन सा कारण था जिसके कारण चंदायन के बाद लिखे जाने के बावजूद इन कृतियों की नायिका मैना है न की चंदायन की तरह चंदा । अगर यह मान भी ले की यह लेखक की अपनी स्वतन्त्रता और सृजनात्मकता के चुनाव के कारण है तो भी प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं मिल पाता है क्योंकि बात इतनी आसान नहीं है । दाऊद ने जिस रूप में चंदा को रचा है वह एक विद्रोही और स्वतन्त्र नारी है जो समाज के झूठे नियमों के बंधन में बंधना नहीं चाहती जिसे अपने स्व की पहचान है । चंदायन में चंदा अपने नपुंसक पति को पहले तो समझाने को कोशिश करती है अपने ससुराल वालो से इस विषय में बात करती है लेकिन जब उसे समझने और उसका साथ देने के लिए कोई तैयार नहीं होता है तो वह अपने पिता के घर वापस लौट आती है और अपनी रक्षा करने वाले लोरिक से प्रेम कर बैठती है। और इस प्रेम सम्बन्ध को निभाने के लिए समाज से विद्रोह मोल लेती है । लेकिन बाद के कवियों ने चंदा के व्यक्‍तित्व को पूरी तरह से खत्म करके पतिव्रत धारण करने वाली मैना को प्रमुखता दी । और चंदा का चित्रण एक ऐसी स्त्री चरित्र के रूप में हुआ है जो एक सामंती मानसिकता के पुरुष के लिए विलास मात्र का साधन है।

आज विमर्शों के इस युग में दाउद की  नायिका चंदा हमें ज्यादा आकर्षित करती है क्योंकि वह समाजगत रुढियों के समक्ष एक खुली चुनौती पेश करती है और डटकर उसका सामना करती है परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि ‘गवासी’, ‘हमीदी’ और साधन की मैना हमारे समाज का अंग नहीं है जरुरत इस बात को समझे जाने की है कि इन सती स्त्रियों के मानक की हमारे समाज को जरुरत क्यों थी और इतने लम्बे समय तक इतने ज्यादा कवियों ने इसी तरह से चंदा को नकार कर मैना के सती रूप को आदर्श क्यों बनाया।

 

 वास्तव में लोरिक चंदा के बहुप्रचलित संस्करण भारतीय समाज की उस एक ख़ास विशिष्टता की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं जिसे हम ‘बहुआयामी’ कहते हैं। यह मानकर कि मैना का व्यक्तित्व मूल कथा में क्षेपक की तरह बाद के कवियों द्वारा जोड़ा गया इसलिए बाद में मैना प्रमुख पात्र बनकर उभरी, यह कहना पर्याप्त न होगा क्योंकि अगर ऐसा है भी है तो हमें उन कारणों की तलाश करनी होगी जिसके कारण इन क्षेपकों की सृष्टि हुई। इसका एक कारण परम्परागत स्त्री छवि को बरकरार रखना रहा होगा।स्त्री की सत्ता पुरुष सत्ता के अधीन है वह अपनी एक अलग पहचान नहीं बना सकती उसकी पहचान पुरुष के साथ जुड़कर ही है इस मान्यता के साथ मैना का चित्रण प्रारम्भ हुआ होगा। लोरिक चंदा की कथा का हर रूप अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि एक व्यापक जन समाज ने इन रूपों को अपनी मान्यता और वैधता प्रदान की है। इसलिए आज मध्यकाल का अध्ययन करते समय विद्यार्थियों को एक पाठ नहीं बल्कि हर पाठ की जानकारी कराना और भारतीय समाज की उस महत्वपूर्ण विशेषता की तरफ उनका ध्यान आकर्षित कराना है जिसे हम ‘बहुलतावादी’ समाज कहते हैं।जितना महत्वपूर्ण वर्तमान के लिए चंदा का चरित्र है उतना ही महत्वपूर्ण उन कारणों की पड़ताल है जिसके परिणामस्वरुप मैना जैसे पात्रों को बाद में प्रमुखता मिली।क्योंकि इसके बिना चंदा के व्यक्तित्व को परिभाषित नहीं किया जा सकता और  न ही मध्याकालीन समाज की मानसकिता को ही समझा जा सकता है।  

 

 

सन्दर्भ ग्रन्थ

  1. फादर वैरियर एलविन,फोक सांगस आफ छत्तीसगढ़ पृष्ठ संख्या,338-341
  2. श्यामचरण दुबे, फील्ड सांगस आफ छत्तीसगढ़
  3. शरतचन्द्र मित्र, दी बैलेड आफ लूरिक: क्वार्टरली जर्नल आफ दी मिस्टिक सोसायटी वाल्यूम 25 जनवरी 1935
  4. नित्यान्द तिवारी, मध्ययुगीन रोमांचक आख्यान पृष्ठ संख्या 37
  5. ग्रियर्सन, दी बर्थ आफ लोरिक :बुलेटिन आफ द स्कूल आफ ओरियंटल स्टडीज
  6. नित्यानंद तिवारी, मध्य युगीन रोमांचक आख्यान पृष्ठ संख्या 38
  7. हरिहर निवास द्ववेदी, साधन कृत मैनासत, विद्या मंदिर प्रकाशन ग्वालियर, प्रथम संस्करण 1959 पृष्ठ संख्या 41
  8. हरिहर निवास द्ववेदी, साधन कृत मैनासत, विद्या मंदिर प्रकाशन ग्वालियर, प्रथम संस्करण 1959 पृष्ठ संख्या 42
  9. हरिहर निवास द्ववेदी ,साधन कृत मैनासत,विद्या मंदिर प्रकाशन ग्वालियर,प्रथम संस्करण 1959 पृष्ठ संख्या 44
  10. श्री सुकुमार सेन, बांग्ला साहित्य का इतिहास, पृष्ठ संख्या 616