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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

कार्बी और बोड़ो आदिवासियों का सामाजिक जीवन एवं आध्यात्मिक प्रतीक

 कार्बी और बोड़ो आदिवासियों का सामाजिक जीवन एवं आध्यात्मिक प्रतीक

                                          -वीरेन्द्र परमार   

 

कार्बी (मिकिर) जनजाति  

     कार्बी समुदाय के लोग असम के कार्बी आंगलोंग जिले में रहते हैं। इनकी कुछ आबादी असम के नार्थ कछार, कामरूप, नगाँव और शोणितपुर जिलों में भी निवास कराती है। इन्हें मिकिर भी कहा जाता है परन्तु वे लोग स्वयं को कभी मिकिर नहीं कहते हैं। पड़ोस में रहनेवाले समुदाय के लोग इन्हें मिकिर कहते हैं। भारतीय संविधान में भी इन्हें मिकिर की संज्ञा दी गई है। मंगोल मूल के कार्बी समुदाय का देशांतरगमन कहाँ से हुआ, इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। मिथकों और लोककथाओं के अनुसार वेलोग दक्षिण – पूर्व एशिया से आकर असम में आबाद हुए। भाषिक दृष्टि से ये तिब्बती – बर्मी समूह से संबद्ध हैं। कार्बी  भाषा और कुकी भाषा में बहुत समानता है। रीति – रिवाजों की दृष्टि से नागा समुदाय से इनका सामीप्य है। कुछ विद्वानों का अभिमत है कि आरम्भ में कार्बी समुदाय के लोग नगाँव और शिबसागर (वर्तमान में जोरहाट) जिले के मध्य पर्वतीय क्षेत्र में बस गए। कालान्तर में असम के अन्य क्षेत्रों में इनका प्रसार हुआ। कुछ विद्वानों ने मत व्यक्त किया है कि आरंभिक चरण में कार्बी लोग दीमापुर (नागालैंड) और कपिली नदी के बीच स्थित हायोंग क्षेत्र में आबाद हुए। इस समुदाय के लोग बांस के मचान (प्लेटफार्म ) पर अपने घर बनाते हैं जो जमीन से लगभग पांच फीट ऊपर होता है। छत फूस की होती है तथा दीवारें बांस की होती हैं। दीवारों पर मिट्टी के पलस्तर लगाए जाते हैं। घर में कई कमरे होते हैं। घर दो हिस्सों में विभक्त होते हैं। सामने के हिस्से को काम कहते हैं। यह अतिथियों के उपयोग के लिए होता है। घर के दूसरे हिस्से को कुत कहा जाता है। इसका उपयोग सोने के लिए परिवार के सदस्य करते हैं। इसमे चूल्हा भी होता है। घर के सामने बरामदा होता है जिसे होंगकुप कहते हैं तथा पीछे के बरामदे को  पंगहोंगकुप कहते हैं। कुत के मध्य में दाम – बुक होता है। यहाँ बच्चे विश्राम करते हैं। जलावन की लकड़ियों का जिस जगह भण्डारण किया जाता है उसे “थेंग – पोंग –राई” कहा जाता है। कार्बी समुदाय तीन वर्गों में विभक्त है – चिंगथोंग, रोंगहंग तथा अमरी। तीनो वर्गों के पांच मुख्य कुर(गोत्र) हैं:-- ।.इंगती।I.तेरान।II.तेरांग।V. इंघी V. तिमंग। इन पांच गोत्रों के भी अनेक उपगोत्र हैं। पिता का कुर (गोत्र) ही बच्चों के कुर माने जाते हैं। कुर के अन्दर विवाह सर्वथा प्रतिबंधित है। एक कुर के सभी सदस्य परस्पर भाई – बहन समझे जाते हैं। इस समाज में एकविवाह प्रथा प्रचलित है। बहुविवाह प्रतिबंधित नहीं है। विधवा विवाह सामाजिक रूप से मान्य है। अविवाहित छोटा भाई अपने बड़े भाई की विधवा से शादी कर सकता है लेकिन किसी भी स्थिति में बड़ा भाई छोटे भाई की विधवा से शादी नहीं कर सकता। इस समाज में दोनों प्रकार की शादी प्रचलित है - माता-पिता द्वारा बातचीत के आधार पर विवाह एवं लड़का – लड़की की परस्पर सहमति के आधार पर विवाह। माता-पिता द्वारा बातचीत के आधार पर होनेवाले विवाह में भी लड़की की सहमति आवश्यक है। अगर कोई लड़का किसी लड़की को पसंद करता है और उससे शादी करना चाहता है तो सर्वप्रथम वह अपने माता – पिता को लड़की के घर भेजता है। माता – पिता अंगूठी, मदिरा, पान पत्ता इत्यादि उपहार के साथ लड़की के घर जाते हैं। यदि उपहारों को स्वीकार कर लिया जाता है तो विवाह के लिए स्वीकृति समझी जाती है। कार्बी समाज में तलाक विशेष परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है। ग्रामसभा की अनुमति से ही तलाक लिया जा सकता है। पूर्वोत्तर की दूसरी जनजातियों की तरह कार्बी समुदाय में वधू – मूल्य की कोई परंपरा नहीं है। विवाह के उपरांत भी पत्नी अपने पिता के उपनाम धारण किए रहती है लेकिन बच्चे अपने पिता का उपनाम धारण करते हैं। कार्बी पितृसत्तात्मक समाज है। पिता परिवार का प्रमुख होता है। परिवार में पति, पत्नी, उनके बच्चे और अविवाहित भाई – बहन रहते हैं। कुछ संयुक्त परिवार भी पाए जाते हैं। पिता की मृत्यु के बाद उसकी चल – अचल संपत्ति पर पुत्र का अधिकार होता है। पैतृक संपत्ति पर पुत्रियों का कोई अधिकार नहीं होता है। अगर किसी व्यक्ति को पुत्र नहीं है तो उसकी मृत्यु के उपरांत उसकी संपत्ति उसके गोत्र के किसी निकटतम संबंधी को दे दी जाती है। कार्बी समाज कृषि पर निर्भर है। पर्वतीय क्षेत्रों में झूम खेती की जाती है। चावल इनकी मुख्य फसल है। कार्बी आंगलोंग के मैदानी क्षेत्रों में स्थायी खेती की जाती है। चावल के अतिरिक्त ये लोग मक्का, कपास आदि का भी उत्पादन करते हैं। येलोग गाय, भैंस, बकरी आदि जानवर पालते हैं लेकिन दूध नहीं पीते हैं। महिलायें बुनाई के काम में दक्ष होती हैं। बुनाई इस समाज में कुटीर उद्योग जैसा है। महिलाएं घरेलू उपयोग के लिए स्वयं कपडे तैयार करती  हैं। चावल इनका प्रमुख भोजन है। चावल के साथ कभी – कभी दाल भी खाते हैं। इसके अतिरिक्त सब्जियां, पत्ते, कंद – मूल, सूअर एवं मुर्गी का मांस, मछली आदि खाते हैं। दिन में दो बार ये लोग चावल खाते हैं। रेशम का कीड़ा इन लोगों के लिए विशिष्ट आहार है। सूखी मछलियाँ, अंडे इनके भोजन में शामिल है। कार्बी लोग दूध नहीं पीते हैं लेकिन कभी – कभी बिना दूध की चाय पीते हैं। चावल से बनी मदिरा (मोरपो) का नियमित सेवन किया जाता है। मदिरा के बिना किसी सामजिक – सांस्कृतिक –धार्मिक आयोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

        धार्मिक दृष्टि से कार्बी समाज प्रकृतिपूजक अथवा ब्रह्मवादी है। येलोग विभिन्न देवी – देवताओं की पूजा करते हैं। पुनर्जन्म, आत्मा के अमरत्व आदि में इनकी आस्था है। “अरनम संसार रेचो” अर्थात ईश्वर ने ही संसार की रचना की है, ऐसा इनका विश्वास है। असंख्य देवी – देवताओं में से कुछ हितकारी एवं कुछ अनिष्टकारी माने जाते हैं। इनलोगों का विश्वास है कि प्रत्येक बीमारी के लिए कोई न कोई दिव्य शक्ति उत्तरदायी है। “ अर्नम केथे “इनके गृहदेवता हैं। तीन वर्ष में एक बार इस गृह देवता की पूजा – अर्चना की जाती है और पशु –पक्षियों की बलि देकर उन्हें प्रसन्न किया जाता है। गृह देवता को महान देवता माना जाता है। घर के किसी सदस्य के बीमार होने पर सूअर की बलि दी जाती है तथा सम्पूर्ण गाँव को भोज दिया जाता है। मदिरा इस भोज का अनिवार्य अंग है। एक दूसरे गृहदेवता हैं जिनके नाम हैं पेंग। वर्ष में एक बार बकरे की बलि देकर इनकी पूजा की जाती है। आरोग्य प्राप्ति के लिए जिस देवता की पूजा की जाती है उसके नाम हैं “ हेम्फी अर्नम “I एक अन्य गृहदेवता हैं जिनके नाम “ रेक अंगलोंग “ हैं। कार्बी समाज सभी प्राकृतिक शक्तियों के प्रति श्रद्धावनत है तथा उनकी पूजा करता है। सूर्य, चन्द्रमा, जलप्रपात, पर्वत, नदियाँ आदि इनके लिए आराध्य हैं। समय और स्थान के अनुसार इस समाज की पूजा विधियों में भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। एक तरह से कार्बी समाज हिन्दू धर्मावलम्बी है। जहाँ पूर्वोत्तर की अनेक जनजातियों ने इसाई धर्म ग्रहण कर लिया है, कार्बी समाज अभी तक ईसाईयत के प्रभाव से अछूता है। ये लोग अपने बच्चों का  नामकरण मृत पूर्वजों व रिश्तेदारों के नामो के आधार पर करते हैं क्योकि इनका मानना है कि मृत व्यक्ति इस संसार में पुनः जन्म लेता है। कार्बी (मिकिर) समुदाय के लोग अनेक त्योहार मनाते हैं जिनमे “रंगकर” और “हचा” महत्वपूर्ण है । रंगकर नववर्ष के उपलक्ष्य में मनाया जानेवाला त्योहार है। इस दिन सुख – समृद्धि की कामना से देवी – देवताओं की पूजा की जाती है। गाँव के सभी वरिष्ठ पुरुष सदस्य इस त्यौहार में भाग लेते हैं। महिलाएं इसमें भाग नहीं ले सकती हैं। फसल तैयार होने पर कार्बी समुदाय के लोग हचा उत्सव मनाते हैं। इस उत्सव में सामूहिक भोज, नृत्य, गीत आदि का आयोजन किया जाता है। कार्बी समाज में युवागृह की परंपरा विद्यमान है। इसे फरला अथवा जिरकेदम कहते हैं। इसका निर्माण गाँव के किसी केन्द्रीय स्थल पर किया जाता है। गाँव के सभी अविवाहित युवक इसके सदस्य होते हैं। सभी युवक इसमें रात्रि विश्राम करते हैं। इस युवागृह में दस पदाधिकारी होते हैं जो युवागृह द्वारा संचालित होनेवाली विभिन्न गतिविधियों की देखभाल व निगरानी करते हैं। यहाँ पर सभी प्रकार के धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। आधुनिकता और चिंतन पद्धति में बदलाव के कारण अन्य संस्थाओं की तरह फरला भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। कार्बी समुदाय में मृत्यु होने के बाद शव को जलाने का रिवाज है। मृतक के सभी रिश्तेदार एवं ग्रामवासी शव को लेकर शवदाह स्थल पर जाते हैं जिसे थिरी कहा जाता है। मृतक की आत्मा की शांति के लिए मृत्यु के दूसरे दिन कुछ संस्कार संपन्न होते हैं। यह संस्कार चार दिनों तक चलता है। मृत्यु संबंधी मुख्य संस्कार परिवार की सुविधा के अनुसार बाद में भी किये जा सकते हैं क्योकि यह एक खर्चीला आयोजन होता है।

 

बोडो कछारी जनजाति

        असम का बोडो कछारी समुदाय भारतीय – मंगोलियन प्रजाति समूह का सदस्य है। इस समुदाय को अन्य कई नामों से भी संबोधित किया जाता है। ऊपरी असम में इसे सोनोवाल व थेंगल कछारी कहा जाता है जबकि पश्चिमी असम में बोडो अथवा बोडो कछारी कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इन्हें दिमासा या बर्मन के नाम से भी संबोधित किया जाता है लेकिन विशेष रूप से ध्यान देने की बात यह है कि बोडो, दिमासा, सोनोवाल और बर्मन एक ही वृहत प्रजाति समूह के सदस्य होते हुए भी किंचित भिन्न हैं। कोकराझार जिले में बोडो समुदाय की अधिकांश आबादी निवास करती है। कामरूप एवं दरांग जिलों में भी इनके निवास हैं। इस समुदाय के पारंपरिक नियमों के अनुसार परिवार की संपत्ति पर सभी पुरुष सदस्यों का संयुक्त उत्तराधिकार होता है। पिता की मृत्यु के बाद उसके सबसे बड़े पुत्र अथवा परिवार के अन्य वरिष्ठतम सदस्य संपत्ति के उत्तराधिकारी बनते हैं। उत्तराधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार के सभी दायित्वों का पालन भी करेगा। दायित्वों का निर्वाह करने के लिए उन्हें पैतृक संपत्ति का अपेक्षाकृत अधिक हिस्सा दिया जाता है। गाँव के पुजारी को ओजा अथवा ओझा कहा जाता है जिसका चुनाव सर्वसम्मति से किया जाता है। ओजा सामाजिक – धार्मिक कार्यों में गाँव के लोगों का मार्गदर्शन करता है। बोडो गांवों में ग्राम परिषद होती है जिसका निर्णय मानना सभी के लिए बाध्यकारी होता है। ग्राम प्रधान को गाँव बूढा कहा जाता है और उसके सहायक को हलमाजी कहते हैं। वे दोनों गाँव के सभी सामाजिक कार्यों को संपन्न कराते हैं। इस समाज में गोत्र को अरी कहा जाता है। बोडो समाज कुल 23 अरी में विभक्त है जिनके नाम हैं:- स्वर्गियारी, बसुमतारी, मोछारी, खंगखलारी, दोइमारी, नर्जरी, गयारी, महिलारी, अउरी, जोजोआरी, इसारी, कहारी, सिबियूगारी, सिबीजियारी, बियुग – बियुगारी, गउजलेरारी, फदनगारी, सफरंगारी, रामसारी, खेरकतारी,थालेतारी, बोडोगावरी। बोडो समाज में अपने गोत्र से बाहर विवाह करने का विधान है पर धीरे – धीरे यह परंपरा शिथिल हो रही है। इस समाज में एकविवाह प्रथा प्रचलित है। विधवा विवाह सामाजिक रूप से मान्य है। अविवाहित छोटा भाई अपने बड़े भाई की विधवा से शादी कर सकता है लेकिन किसी भी स्थिति में बड़ा भाई छोटे भाई की विधवा से शादी नहीं कर सकता। वर और कन्या दोनों पक्षों के बीच बातचीत (हथचुनी) द्वारा अधिकांश विवाह तय होते हैं। सर्वप्रथम वर पक्ष के बुजुर्ग  अथवा माता – पिता लड़की को देखने उसके घर जाते हैं। यदि उन्हें लड़की पसंद आ जाती है तो उपहार के रूप में चांदी की चूड़ियाँ, अंगूठी,मदिरा इत्यादि देते हैं। यदि उपहारों को स्वीकार कर लिया जाता है तो विवाह के लिए स्वीकृति समझी जाती है। शादी के पहले लड़का लड़की के घर जाता है, दोनों एक – दूसरे को देखते – समझते हैं। लड़की लडके को रुमाल, तौलिया आदि भेंट करती है, साथ - साथ अपनी सहमति के संकेत भी देती है। यदि लड़की ऐसा नहीं करती है तो माना जाता है कि उसने लडके को पसंद नहीं किया है। बोडो समाज में विवाह का एक अन्य रूप भी प्रचलित है जिसे खर चनई विवाह कहते हैं। इस प्रकार के विवाह में लड़की स्वेच्छा से लडके के साथ भाग जाती है। बाद में विवाह के कुछ संस्कार संपन्न किए जाते हैं और इस विवाह को सामाजिक मान्यता मिल जाती है। इस समाज में वधू – मूल्य की  परंपरा विद्यमान है पर सुशिक्षित परिवारों में वधू – मूल्य एक रस्म भर रह गया है। पारंपरिक बोडो समुदाय एवं हिन्दू धर्म को माननेवाले बोडो समुदाय की विवाह पद्धतियों में थोडा अंतर है। हिन्दू धर्मावलम्बी बोडो जनजाति में पुजारी द्वारा वैदिक संस्कार एवं हवन आदि कराए जाते हैं जबकि परंपरागत बोडो परिवारों में आदिवासी रीति – रिवाजों से विवाह होते हैं।

       बोडो समाज में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। वेलोग सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति को बाथो बरई अथवा खोरिया बरई महाराजा के नाम से संबोधित करते हैं। यह शिव का ही एक नाम है। मैनाव धन की देवी हैं जिन्हें बुली बुरी भी कहा जाता है। इनके अतिरिक्त इस समाज में अन्य अनेक देवी – देवता हैं जिनकी पूजा – अर्चना की जाती है। कुछ देवी – देवताओं के नाम हैं – अगराउग, खोइला, खाजी, राजखंद्र, राजपुतुर, बुरा अली, असी मैनाव, साली मैनाव, बगराजा, बसुमती इत्यादि। इन असंख्य देवी – देवताओं में से कुछ को हितकारी एवं कुछ को अनिष्टकारी माना जाता है। इन्हें पशु –पक्षियों की बलि देकर तथा चावल से बनी मदिरा अर्पित कर प्रसन्न किया जाता है। बोडो समाज में अनेक पर्व – त्योहार मनाए जाते हैं। बैशाख महीने में बैशागु मनाया जाता है। इसे बिशु अथवा बिहू के नाम से भी जानते हैं। दो अन्य बिहू भी मनाए जाते हैं जिसे दोमासी (भोगाली बिहू) और कात्रिगाचा ( कंगाली बिहू ) कहते हैं। चैत्र मास के अंतिम दिन नव वर्ष का उत्सव मनाया जाता है। यह इस समाज का वसंतोत्सव है। इस दिन गाय की पूजा की जाती है। इसके दूसरे दिन बच्चे अपने माता – पिता एवं अन्य सभी बुजुर्गों से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। बुजुर्ग अपने बच्चों को आरोग्य व सुख – समृद्धि का आशीर्वचन देते हैं। इस अवसर  पर बथोउ की पूजा – अर्चना की जाती है तथा मुर्गे की बलि दी जाती है। चावल निर्मित मदिरा अर्पित करना इस पूजा का अभिन्न अंग है। अगले सात दिनों तक यह उत्सव चलता है। सभी लोग नृत्य – गीत के द्वारा अपना हर्ष प्रकट करते हैं। सामुहिक स्तर पर प्रतिवर्ष खेरई पर्व मनाया जाता है। इस त्योहार में बथाव अथवा शिबराई और मैनाव की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि बथाव पंचभूतों ( पृथ्वी, पवन, जल, अग्नि, आकाश ) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन पाँच तत्वों से ही मानव शरीर निर्मित हुआ है। यह त्योहार कार्तिक माह में मनाया जाता है। त्योहार के समापन के समय सामुदायिक स्तर पर पितरों की पूजा की जाती है। बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत बागरूंबा नृत्य इस त्योहार का प्रमुख आकर्षण है। बोडो समाज की आर्थिकी कृषि पर निर्भर है। वे अहू और साली दोनों प्रकार के धान की खेती करते हैं। इनके पास बीजों को परिरक्षित रखने तथा सिंचाई करने की उन्नत पारंपरिक विधि विद्यमान है। नदियों से पानी लाकर खेतों की सिंचाई करने का इनका कौशल प्रशंसनीय व अनुकरणीय है। अधिक वर्षा होने पर जब खेतों में लगी फसलों को नुकसान होने की आशंका होती है तो वे जलधारा को दूसरी दिशा में मोड़ देने का कौशल भी जानते हैं। बोडो कछारी समुदाय में मृत्यु के उपरांत शवों को जलाने एवं दफनाने की दोनों परंपरा विद्यमान है  पर आजकल सामान्य रूप से शवों को जलाने की विधि अधिक प्रचलित है। कुछ सुदूर गांवों में शवों को खुले मैदान में फेंक दिया जाता है। खुले मैदानों में शवों को फेंकने के पीछे यह धारणा है कि जंगली पशु – पक्षी इसे खाकर संतुष्ट होंगे तो मृतक द्वारा जीवन काल में किये गए बुरे कर्म माफ़ हो जायेंगे। अंत्येष्टि में  शामिल सभी लोग स्नान करने के बाद शांति जल का पान करते हैं। इसके बाद अल्प मात्रा में कड़वे स्वाद के सूखे पत्ते सोकोता चबाते हैं। इसके बाद मृतात्मा के सम्मान में मदिरा पान किया जाता है। मृत्यु के दसवें दिन दस संस्कार किया जाता है तथा बारहवें या तेरहवें दिन अंतिम श्राद्ध किया जाता है। पुनर्जन्म में इस समुदाय का अटूट विश्वास है और माना जाता है कि जीवन काल में किये गए कर्मों के अनुसार आत्मा शरीर धारण करती है।


 

स्थायी पता: 103, नवकार्तिक एपार्टमेंट, जी एच – 13, सैक्टर-65, फरीदाबाद-121004

सम्प्रति:- उपनिदेशक(राजभाषा),

केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड,

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय(भारत सरकार) ,

भूजल भवन, एन एच- 4,फरीदाबाद- 121001,

मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com