Notice
जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

वेदना और मुक्ति की कहानीकार : अल्पना मिश्र

वेदना और मुक्ति की कहानीकार : अल्पना मिश्र

डॉ. मधुलिका बेन पटेल

सहायक प्रोफ़ेसर

हिन्दी विभाग

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय

 तिरुवारूर  

ben.madhulika@gmail.com


 अल्पना मिश्र के भीतर वेदना गहरे समाई है, जो उनकी कहानियों के स्त्री पात्रों में घुल कर आती है। उनके भीतर की टीस एक आकार लेती है और पाठकों के सामने ऐसा चित्र गढ़ती है, जिसकी वेदना उन्हें झकझोर देती है। लेखिका हमारे जीवन की तमाम घटनाओं को मूर्त रुप प्रदान करती हैं। स्त्री वेदना की महागाथा महादेवी वर्मा की रचनाओं में भरपूर है, अल्पना मिश्र भी स्त्रियों की टीस, दुःख और संघर्ष को अपनी कहानियों में उतारती हैं। अनगिनत दुख गहराते हैं और लेखिका लिखती चली जाती हैं। ‘उपस्थिति’ कहानी में ब्याह के बाद लड़कियों के नाम बदल दिए जाने पर वे दुःख मिश्रित व्यंग्य करती हैं। वे लिखती हैं, ‘‘काबेरी नाम था, है। माँ-बाप का दिया। शादी के बाद पूजा करवा कर मेरा नाम बदल दिया गया। सिमरन। मेरी सर्टिफिकेट नहीं बदली गई। मेरा कोई सामान नहीं बदला गया। सोफा को कुछ और नहीं कहा गया। पलंग, चादरें, साड़ी...सब कुछ का नाम वही रहा। मेरा नहीं रहा।’’ स्त्रियों की व्यथा सुनने के लिए किसके पास समय है ? उनके पति के पास भी नहीं। पति के साथ रहने वाली स्त्रियों के जीवन में कितना खालीपन है, कितनी अनचाही बातें मर्जी न रहने के बावजूद स्वीकार करनी पड़ती हैं, ‘‘पूरा नंगा होना कौन बर्दाश्त करेगा ? मुझसे भी नहीं होता। मन करता है खुद पर्दा बन जाऊँ। पर्दा पकड़ कर खड़ी हो जाऊँ। क्या करुँ कि पर्दा, पर्दा हो जाए। देवर बडे़ हैं, किसी भी वक्त इधर से निकल सकते हैं। हे प्रभु ! ऐसा कोई भी वक्त आने से पहले मैं मर क्यों न जाऊँ। लगता कि यह घड़ी भर का वक्त कैसा बड़ा होता जाता है। यह कब बीते। ढंग से उन्हें देख भी न पाती। मेरा बरजना बहुत मरियल होता। कहीं दर्द होता, कहीं कुछ चुभता, खिंचता....तो मुँह बन्द कर के सह लेती।’’

          स्त्रियों के जीवन के साथ दुःख छाया की तरह उनसे चिपटा रहता है। लेखिका इसे भली-भांति समझती हैं। छोटी बच्चियों के साथ बड़े लोगों की मनमानियों की ओर भी वे ध्यान आकर्षित करती हैं। ‘कथा के गैर जरुरी प्रदेश’ कहानी कटु यथार्थ को सामने रखती है। ‘‘पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाली लड़की, उस आदमी की बाहों की कसमसाहट से छूटकर भागी थी। स्कूल में वह आदमी गणित पढ़ाता था और यद्यपि वह लड़की उसकी उम्र का सही अंदाज नहीं लगा सकती थी, फिर भी इतना कह सकती थी कि वह उसके पापा जितना बड़ा लगता था।’’ स्कूलों में बच्चियों के प्रति शिक्षकों के अभद्र व्यवहार का खुलासा करती हैं अल्पना मिश्र। घृणा आने लगती है ऐसे लोगों पर जो छोटी बच्चियों के साथ खिलवाड़ करते हैं। समाज में शिक्षकों को माता-पिता से ऊपर का दर्जा हासिल है। वहाँ, ऐसा शिक्षक देख कर क्षोभ उत्पन्न होता है। शिक्षक के व्यवहार और उस बच्ची की छटपटाहट को लेखिका इन शब्दों में व्यक्त करती हैं, ‘‘वह अपनी कक्षा से निकलते ही लड़की को बुलाता और बात करते-करते भूल जाता कि उसे दूसरी कक्षा में जाना है। लड़की को अक्सर वह झक्की और कभी-कभी पागल तक लगता। वह लड़की जब अचानक उसके सामने पड़ जाती तो वह जोर-जोर से डाँटने लगता। वह डर जाती। उसके सहपाठी डरकर भाग जाते। वह भी भागती, पर जल्दी से वह लड़की को कंधे से पकड़ लेता और अपनी पैंट के पास उसका मुँह जबरदस्ती जोर से चिपका लेता। फिर उसके डरे हुए चेहरे को देखकर कोमल भावों से भर जाता और गालों को चूमकर कहता-शर्मीली। लड़की को यह और भी बुरा लगता। उसे अध्यापक के पैंट से पेशाब की हल्की सी बदबू आती। वह रोने लगती। रोते हुए दौड़ते हुए अपने साथियों को खोजने लगती।’’ छोटे बच्चों की इनकार के पीछे छुपे रहस्य और उनकी तकलीफों को अक्सर लोग समझने का प्रयास नहीं करते। यह वाकई चिंताजनक है। लेखिका अपनी कहानी के माध्यम से इसे सामने रखती हैं। आज स्कूलों में बच्चों के शोषण की अनेक घटनाएं सामने आती रहती हैं। वे किसी से अपनी भावनाएं व्यक्त भी नहीं कर पाते।

         अभी हाल-फिलहाल की घटनाओं को देखें तो साफ जाहिर है कि बच्चे स्कूलों में भी सुरक्षित नहीं हैं। 2 नवम्बर 2014 की एन.डी.टी.वी. इंडिया की खबर के मुताबिक बेंगलुरु के स्कूल में छह साल की बच्ची के साथ बदसलूकी के आरोप में स्कूल के प्रिंसिपल और डायरेक्टर गिरफ्तार किए गए। 23 दिसम्बर 2014 की खबर के मुताबिक दिल्ली के एक निजी स्कूल में सात साल की बच्ची के यौन शोषण के आरोप में माली को गिरफ्तार किया गया। 7 जनवरी 2015 को बेंगलुरु के बेटनरायनपुरा के एक स्कूल में 8 साल की बच्ची के साथ यौन शोषण के आरोप में फिजिकल ट्रेनर को गिरफ्तार किया गया। 4 जुलाई 2016 को नागपुर में स्कूल में यौन शोषण के मामले में एक नेता के भाई को गिरफ्तार किया गया। 17 सितम्बर 2016 को दिल्ली के नजदीक फरीदाबाद के सरकारी स्कूल के टीचर पर कई छात्राओं से छेड़छाड़ की खबर आई। इसके दो दिन बाद ही दिल्ली के प्राइवेट स्कूल में महज चार वर्ष की बच्ची के यौन शोषण का मामला सामने आया। 17 जनवरी 2017 में महाराष्ट्र के बींड जिले में शिक्षक पर छात्राओं ने यौन शोषण का आरोप लगाया। 21 मई 2017 की खबर के अनुसार पंजाब के गुरुदासपुर में एक नाबालिक लड़की ने एक स्कूल के प्रधानाचार्य पर यौन शोषण का आरोप लगाया। ये कुछ घटनाएं हैं, लेकिन पूरे देश में ऐसी खबरें आम हैं। बच्चियाँ स्कूलों में सुरक्षित नहीं हैं।

            अल्पना मिश्र की कहानी, महज कहानी नहीं जीवन है। हमारे समय की सचाई है। स्कूलों में शोषित होती बच्ची की मनः स्थिति को वे इन शब्दों में बयान करती हैं, ‘‘लड़की झुँझलाने लगी। वह हरदम गुस्साई रहती। स्कूल में उस अध्यापक को देखते ही कहीं भाग कर छिप जाती। गणित पढ़ना लड़की ने लगभग छोड़ दिया और स्कूल जाने से कतराने लगी। स्कूल न जाने के जितने बहाने लड़की बना सकती थी, बनाती। कभी पेट दर्द का बहाना बनाती, कभी स्कूल के रिक्शे से गिर जाती और चोट लगने का बहाना करते हुए घर पर ही रुक जाती। लड़की ने भरसक बहुत बहाने बनाए। स्कूल से नाम कटवाने की जिद भी की। यह भी कहा कि गणित वाले मास्टर से डर लगता है। इस जिद से समस्या की गहराई में गए बिना पिताजी ने गणित के अध्यापक को घर पर बुलाया और उन्हें लड़की के डरने की वजह से स्कूल न जाने की जिद वाली बात बताई। लड़की ने मजबूरी में अध्यापक को प्रणाम किया। अगर कोई इस छोटी सी लड़की के मन से पूछे तो यह कहेगी कि चूल्हे से चैला निकाल कर अध्यापक को पीटते-पीटते खदेड़ने की इच्छा है उसकी। पर उसकी यह इच्छा उसके ही घर में कोई मायने नहीं रखती थी।’’ लेखिका तफसील से इसकी चर्चा करती हैं ताकि बच्चों के इनकार के पीछे की असल वजह को जानने की कोशिश हो सके। ‘कथा के गैरजरुरी प्रदेश’ कहानी स्कूलों के अभद्र शिक्षकों पर प्रश्न करती है।

             उनकी एक अन्य कहानी ‘इस जहाँ में हम’ में कामकाजी औरत होने के बाद भी पति के क्रोध और उसके व्यवहार को झेलती स्त्री की सचाई उकेरी गई है। पति से बगैर पूछे मोबाइल लेना स्त्री को कटघरे में खड़ा कर देता है। लेखिका लिखती हैं, ‘‘इतने में एक धुन बजने लगी। मैं बुरी तरह हड़बड़ाई। मोबाइल उनकी गोद में था। मैं उनकी तरफ बढ़ी तो उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया। खुद फोन उठाया-हलो, मैं ए. पी. बगड़वाल बोल रहा हूँ....हाँ....हाँ, हाँ क्यों नहीं। इतना कहकर उन्होंने मोबाइल अपने पास की मेज पर रख दिया। बल्कि उन्होंने मोबाइल अपने पास की मेज पर इस तरह रखा, जैसे मुझे चैलेंज कर रहे हों कि उठाओ! उठाओ मेरे सामने! मैने उठाया। वे खड़े रहे कुछ देर तक। मुझे लगा मैं ठीक से ‘हाँ’ तक नहीं बोल पा रही हूँ। फिर उन्होंने जोर से मेज पर कुछ रखा। शायद अखबार या शायद अपना हाथ। या शायद अखबार और अपना हाथ दोनों ही। फिर बुदबुदाए-‘साला रिंग टोन है कि लगता है कान में कोई लाल मिर्च डाल रहा हो।’’

                इस वाकये से साफ है कि कई बार स्त्री कामकाजी होने के बावजूद पुरुष की दृष्टि  में निर्णय नहीं ले सकती। अक्टूबर 2009 में आरटीआई इंटरनेशनल विमन ग्लोबल हेंल्थ इम्पेरेटिव, भारतीय प्रबंधन सरकार संस्थान, बंगलुरु और इंटरनेशनल सेंटर फॉर    रिसर्च ऑन  विमन द्वारा 750 कामकाजी महिलाओं पर किए गए शोध के मुताबिक जो महिलाएं नौकरी नहीं करती थी, उन्हें नौकरी करने के बाद ज्यादा घरेलू हिंसा का दंश झेलना पड़ा। शादीशुदा महिलाओं के मामले में ये घटनाएं ज्यादा थी। एक ओर स्त्री सशक्तिकरण का नारा जोर पकड़ रहा है, वहीं अब भी महिलाओं की स्थिति में विशेष सुधार नहीं आया है। पढ़े - लिखे लोगों के बीच अभी भी पितृसत्तात्मक सोच हावी है। इस चौंकाने  वाले तथ्य को लेखिका कहानी में ढाल कर प्रस्तुत करती हैं।

           अल्पना मिश्र की स्त्रियाँ विभिन्न वर्गों से हैं। कहीं वे घरेलू स्त्री हैं, तो कहीं नौकरीपेशा, कहीं, नौकरीपेशा लोगों की पत्नियाँ। सबके अपने दुःख हैं। वे सबके दुःखों को अपनी कहानियों में उतारती हैं। ‘छावनी में बेघर’ कहानी सीमा पर तैनात जवान और उसकी पत्नी की है। जहाँ पति के सीमा पर चले जाने के बाद तमाम परेशानियों के बावजूद उसकी पत्नी को ‘सब ठीक है’ का जवाब देना पड़ता है। जवान बकरे की तरह हैं, जिनके कुरबान होने के बाद उनका परिवार बेबसी की हालत में जीवन गुजारने के लिए बाध्य हो जाता है। प्रधानमंत्री के लच्छेदार भाषण से अलग अगर आँखें खोलकर देखें तो इनका दुःख साफ दिखाई देता है। अल्पना मिश्र लिखती हैं, ‘‘फौज में पति के बाद औरतों को नौकरी नहीं दी जाती। यही। यही कि पति के बदले कुछ पैसे दिए जाते हैं। अफ़सरों को कुछ ज्यादा, जवानों को कम। वह भी किसे मिलते हैं ? जिनके घर वाले दौड़-भाग कर ले आते हैं। उन्हें ही न ?’’ जवानों के शहीद होने और तिरंगे में लिपटे शव आने के बाद पीछे रह गई पत्नी की क्या दशा होती है ? किसी ने कभी खोज-खबर लेने की कोशिश की ? अपनी कहानी में लेखिका इस भयावह स्थिति का जिक्र करती हैं, ‘‘प्रधानमंत्री लाल किले पर भाषण दे रहे हैं। देश की स्वतंत्रता को कितने वर्ष हुए, इसे सही-सही गिनने के लिए गणितज्ञ बुलाए गए है। जाने कौन लोग हैं, जो बारिश में भीगते हुए प्रधानमंत्री का भाषण सुन रहे हैं ?...एक शहीद की बहन नेताओं के आगे आत्मदाह करने की कोशिश कर रही है। उसके भाई के नाम से सरकार ने पेट्रोल पंप दिया है, जिसे कोई सरकारी करिंदा चलाता है। पैसा माँगने पर बेइज्जत करता है।’’

            कहना न होगा कि अल्पना मिश्र कहानी के माध्यम से समाज की सचाई से रुबरु कराती हैं। उनकी कहानियों में कहीं टीस है, कहीं दर्द, कहीं मुखर विद्रोह। वे बड़ी सहजता से व्यंग्य करती हैं। उनकी कहानी ‘सुनयना तेरे नैन बड़े  बेचैन’ हो या ‘भय’ अथवा ‘भीतर का वक्त’ या फिर ‘अंधेरी सुरंग में टेढ़े मेढ़े अक्षर’ या अन्य कहानियाँ सब में पितृसत्ता की मार झेलती स्त्रियाँ आती हैं। घर बार की कथा कहते-कहते लेखिका स्त्रियों के भीतर का दर्द उभार देती हैं। सरल-सहज भाषा में न कोई आडम्बर है, न उपदेश। पात्रों का संबंध जिस वर्ग से है, उस से उसकी भाषा में कहलवाने की कला उनकी कहानी में सजीवता बरकरार रखती है।