Notice
जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

मेहरुन्निसा परवेज़ के कथा साहित्य में स्त्री जीवन का यथार्थ

मेहरुन्निसा परवेज़ के कथा साहित्य में स्त्री जीवन का यथार्थ

काजल

एम.फिल. शोधार्थी

हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग

महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

ईमेल- Kajal.sharma472@gmail.com


शोध सार

सिमोन द बुवार की प्रसिद्ध पंक्ति ‘स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है’ स्त्री जीवन को व्याख्यायित करने में सक्षम है। समाज में स्त्री का जीवन एक सपाट राह जैसा नहीं है उसमें कई उतार चढ़ाव है। स्त्री एक साथ कई ज़िंदगियों को न केवल जीती है बल्कि कई स्तर पर स्वयं से भी जूझती है। स्त्री के जीवन का दूसरा नाम ही संघर्ष है अगर यह कहा जाये तो गलत नहीं होगा। अपने परिवार से लेकर सामाजिक संस्थाओं, मान्यताओं, परंपरा, रीति-रिवाज, धर्म इत्यादि सभी जगह स्त्री का जीवन संघर्ष से गुजरता है । अपने प्रत्येक सम्बन्धों में वह स्वतंत्र इकाई न होकर अन्य से संबन्धित ही रहती है एवं अपनी आकांक्षाओं, सपनों, अधिकारों से समझौता करती है। साहित्य में स्त्री के इसी संघर्ष, भावनाओं, सम्बन्धों में स्त्री के रूप इत्यादि का चित्रण हुआ है। मेहरुन्निसा परवेज़ हिंदी लेखिकाओं में अपने नारी केन्द्रित लेखन को लेकर एक चर्चित नाम है। स्त्री परिवेश को उद्घाटित करती इनकी रचनाएँ भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति को बखूबी रेखांकित करती हैं। इनकी रचनाओं में प्रस्तुत स्त्री के विविध पक्षों के माध्यम से हम भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति को समझ सकते हैं।

की वर्ड: स्त्री जीवन, कथा साहित्य, समाज, मेहरुन्निसा परवेज़, अस्मिता, स्वतंत्र

शोध प्रविधि: शोध आलेख में आलोचनात्मक एवं विश्लेष्णात्मक शोध प्रविधि का प्रयोग किया गया है।

 


प्रस्तावना

 

स्त्री जिसे आधी आबादी कहा जाता है, अपने अधिकारों अपनी अस्मिता के लिए सदियों से संघर्षरत रही हैं। हमारा समाज पुरुषवादी समाज रहा है अर्थात यहाँ सत्ता के केंद्र में पुरुष है, जिसके कारण समाज की प्रत्येक इकाई चाहे वह घर, परिवार हो या मान्यताएँ, रिवाज़ इनमें स्त्री को किसी प्रकार की स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं है। स्त्री को सम्पूर्ण जीवन किसी न किसी पुरुष के संबंध के इर्द-गिर्द ही रखा जाता है अर्थात वह केवल स्त्री नहीं होगी वह या तो माँ होगी या बेटी, बहन, पत्नी, बहू इत्यादि। अर्थात हमारा समाज स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता को स्वीकार नहीं करता।

साहित्य में स्त्री जीवन से संबन्धित विविध  पहलुओं को पुरुष एवं स्त्री लेखिकाओं ने उठाया। पुरुषों ने जहां समाज में स्त्री जीवन को सम्बन्धों एवं सामाजिक स्थिति के आधार पर साहित्य में स्त्री जीवन को उतारा वहीं लेखिकाओं ने अपने अनुभव के आधार पर स्त्री जीवन को साहित्य में उद्घाटित किया।

सहानुभूति एवं स्वानुभूति के धरातल पर साहित्य में स्त्री जीवन के चित्रण को देखा जाये तो लेखिकाओं का स्वानुभूति आधारित लेखन स्त्री जीवन को मुखर रूप में हमारे समक्ष रखता है लेखिकाओं का अनुभवजनित साहित्य स्त्री जीवन को अधिक सशक्त रूप में सभी के समक्ष रखता है। साहित्य में लेखिकाओं ने स्त्री जीवन के विविध पहलुओं के रेखांकित किया है। स्त्री जीवन पर आधारित सैकड़ों कहानियाँ, उपन्यास, इत्यादि लिखे जा चुके हैं और आज भी लिखे जा रहे हैं।

मेहरुन्निसा परवेज़ हिंदी लेखिकाओं में अपने नारी केन्द्रित लेखन को लेकर एक चर्चित नाम है। स्त्री परिवेश को उद्घाटित करती इनकी रचनाएँ भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति को बखूबी रेखांकित करती हैं। इनकी रचनाओं में प्रस्तुत स्त्री के विविध पक्षों के माध्यम से हम भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति को समझ सकते हैं। भारतीय समाज जहाँ स्त्री विविध सामाजिक संस्थाओं, संबंधों जैसे घर, परिवार, सम्बन्ध, विवाह इत्यादि में ही अपना जीवन जीती है इसी परिवेश में उसकी स्वतन्त्र अस्मिता, उसके अधिकार, इच्छाओं का दमन होता है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिवेश में स्त्री के इस दमन, स्त्री की आवाज़, स्त्री के अधिकारों को लेकर सृजन क्षेत्रों में कार्य हुआ।

मेहरुन्निसा ने अपने व्यापक जीवन अनुभव को ही अपनी रचनाओं का आधार बनाया है। इनके विचार पाठकों पर विशिष्ट एवं अमिट प्रभाव डालते हैं। मेहरुन्निसा समाज की विषमताओं, विसंगतियों से भली-भांति परिचित है। मेहरुन्निसा परवेज़ थोथे यथार्थ आदर्शवाद से मुंह मोड़ लेती है और यथार्थ की पहचान बनाने के लिए संवेदनाओं के ठोस और नए आयाम भी प्रस्तुत करती हैं। दीपिका रानी ने उनके कथा साहित्य में अभिव्यक्त यथार्थवादी चेतना को स्पष्ट किया है कि- “मेहरुन्निसा परवेज़ कथा लेखिकाओं में एक सशक्त हस्ताक्षर माना जाता है। समांतर कहानी-आंदोलन से चर्चित हुई मेहरुन्निसा परवेज़ की कथा भूमि अपेक्षाकृत व्यापक है। रोज़मर्रा की घटनाओं, घर परिवार की विडंबनाओं और नारी जीवन की पीड़ा के अलावा उन्होने अपने समय की विसंगतियों और कुरूपताओं को भी उनकी यथार्थता के साथ आँका है और महिला कथा-लेखन की सीमित रचना वस्तु का पर्याप्त विस्तार भी किया है।”[1]

मेहरुन्निसा परवेज़ के कथा साहित्य में स्त्री जीवन किसी एक वर्ग से संबंधित नहीं है बल्कि उनके कथा साहित्य में स्त्री जीवन के उनके पक्ष उद्घाटित हुए है। मेहरुन्निसा परवेज़ ने अपने रचनाओं के कथ्य के माध्यम से कहीं बदलते हुए परिवेश में नर-नारी के बनते बिगड़ते रिश्तों की व्याख्या की है तो कहीं परम्पराओं, रूढ़ियों के प्रति विद्रोह का चित्रण किया है। लक्ष्मण सहाय उनके नारी विषयक दृष्टिकोण के संदर्भ में लिखते हैं कि- “मेहरुन्निसा परवेज़ सजग नारी है। वे नारी की समस्या, मन की पीड़ा, घर-परिवार और समाज में स्थिति-परिस्थिति से परिचित है। उन्होंने जो भोगा है, देखा है, उसी को ईमानदारी एवं सच्चाई के साथ कथा-साहित्य में चित्रित वर्णित किया है। यह प्रत्यक्ष, तटस्थ अनुभव और अनुभूतिजन्य है, जिसे उन्होंने बेखौफ कथा साहित्य में लिखा है।”[2]

मेहरुन्निसा परवेज़ के कथा साहित्य में नारी-पात्र प्रधान है। उनके कथा साहित्य में एक बात जो उभर कर सामने आती है वह यह कि नारी के जीवन में पुरुष का होना आवश्यक है। उसके सहारे के बिना स्त्री के अस्तित्व की कल्पना भी कठिन है। यदि भौतिक रूप से वह आत्मनिर्भर भी हो तो मानसिक रूप से किसी पुरुष के अस्तित्व से सुरक्षित होना उनकी मानसिकता का संस्कार है। नारी पात्रों के बारे में उनका विचार है कि-

“एक चिड़िया जिसने आपके घर में घोसला बना लिया है, आपको रोज़ परेशान करती है। ची-ची कर आपको उत्तेजित करती है। आप बैचेन हो जाते हैं और आप उसका घोसला धुरे पर फेंक देते हैं। दूसरे दिन आप देखते हैं कि चिड़िया नए सिरे से तिनके बीनकर घोंसला बनाने लगती है। यह कितनी बड़ी शक्ति है इसके भीतर। जीवन के प्रति कितना बड़ा लालच कितना बड़ा मोह है। आप रोज़ देखते होंगे कि मननुशया की एक झोपड़ी उजड़ जाती है तो वह कितना विलाप करता है, दफ्तरों के चक्कर काटता है, पर चिड़ियाँ कुछ नहीं करती। एक शब्द नहीं और घोसला बुनने लगती है। मैंने हमेशा इस चिड़ियाँ से प्रेरणा ली, बार-बार टूटकर फिर खड़े होने की शिद्दत से कोशिश की। यही आत्मबल मैंने अपने पात्रों को देना चाहा।”[3]

सभी वर्गों की भारतीय नारी की जिस पारिवारिक समस्या ने मेहरुन्निसा परवेज़ को सबसे अधिक मथा है। वह है विवाहोपरांत परिवार में नारी की विवशता। श्रीमति मेहरुन्निसा परवेज़ ने अपने कथा साहित्य के माध्यम से परिवार में नारी की रात-दिन की विवशताओं, समस्याओं के विविध पहलुओं का अत्यंत भावुक चित्रण किया है। डॉ. अनीता जाधव उनके कहानी पात्रों के विषय में कहती है- “उनकी कहानीयों के पात्र कहीं जीवन के प्रति संघर्ष करते हैं तो कहीं निराशा और विषमताओं में घिरकर टूटते-बिखरते हुए दिखाई देते हैं। उनकी कहानियों के पात्र कहीं जीवन के प्रति संघर्ष करते हैं तो कहीं निराशा और विषमताओं में घिरकर टूटते-बिखरते हुए दिखाई देते हैं।”[4]

मेहरुन्निसा परवेज़ ने नारी की उन सभी समस्याओं को अपने कथा साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया है, जो मूक और लाचार बन चार दीवारों में सिसक-ससकार रह जाती थी। लेखिका ने विवाहपूर्व नारी की दशा से लेकर स्त्री जीवन में सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तरों, अनाम भावनाओं एवं अंछूएए प्रसंगों को अपने कथा साहित्य के माध्यम से वाणी दी है। इसके अलावा अपने कथा साहित्य के माध्यम से प्रेम सम्बन्धों में जो जबरदस्त परवर्तन आया है, वहाँ स्त्री के भिन्न-भिन्न स्वरूपों पर इन्होंने लिखा है। इन्होंने अपने कथा साहित्य में विधवा समस्याओं, विधवा नारी के शोषण, विधवा-विवाह, वेश्या समस्याएँ आदि विषयों पर भी स्त्री चरित्रों को अनेक रूपों में उद्घाटित किया है।

मेहरुन्निसा परवेज़ की कहानियों में परिवेश मुखर होकर सामने आता है। कहानियों के पात्र पाठकों को सहजता से प्रभावित करते हैं। डॉ. मालती आदवानी के अनुसार “इनकी कहानियों में परिवेश बहुत जीवंत होकर उभरता है। वातावरण की पकड़ और कथ्य की सजीवता के कारण कहानियाँ सीधे-सीधे पाठक के अंतर में उतरती चली जाती है। भाषा का चुनाव देशकाल, परिस्थिति के अनुसार और पात्र के आधार पर होने के कारण पाठक का परिचय उस कथ्य से सहज हो जाता है, जो लेखिका को अभिप्रेत है। इन सभी विशेषताओं के कारण उनकी कहानी की अलग पहचान है।”[5]

मेहरुन्निसा की कहानियाँ समाज के सभी वर्गों का चित्रण करती है परंतु विशेष तौर पर मेहरुन्निसा जी की कहानियों में निम्न मध्यवर्ग एवं गरीब परिवारों का चित्रण मुख्य रूप से हुआ है। “वे निम्न मध्यवर्गीय व गरीब परिवार की समस्याओं को अपनी कहानी में बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती हैं।”[6]

मेहरुन्निसा परवेज़ संवेदनाओं को पिरोने वाली कहानीकार है। इनकी कहानियाँ मानवीय संवेदना के साथ जीवन संघर्ष को बखूबी पाठकों के समक्ष रखती हैं। डॉ. मीना जोशी के अनुसार “मानवीय जीवन से जुड़े बड़े ही नाज़ुक प्रश्नों को मेहरुन्निसा ने बड़े ही कुशलता से प्रस्तुत किया है। महिला होने के नाते उन्होंने कभी अपने रूप को कहानियों पर हावी नहीं होने दिया। उनकी कहानियों का कथ्य मुख्यतः जीवन संघर्ष से जुड़ा है। मध्य वर्ग एवं मुख्यतः निम्न वर्ग के अस्तित्वगत जीवन संघर्ष का चित्रण और उनमें आंचलिकता का पूट मेहरुन्निसा जी की विशेषता है।”[7]

मेहरुन्निसा परवेज़ ने अपने कथा साहित्य में स्त्री-जीवन की समस्याओं का विस्तृत विवेचन-विश्लेषण किया है। महेंद्र रघुवंशी के अनुसार- “मेहरुन्निसा परवेज़ की नारियां समय आने पर अपने पति को भी त्याग सकती हैं, समाज की परम्पराओं को तोड़ सकती है। पति और परिवार से विद्रोह करती हैं, क्योंकि अब हमारे समाज में नारियों ने जीवन का असली रूप देख लिया है। अब वह पुरुष पर आश्रित नहीं है। उसने जीने की राह ढूंढ ली है, जो अपना सब समर्पित कर देती है, उसे ही बेघर कर दिया जाता है। इसलिए वह चाहती है उसका अपना स्वतंत्र घर हो।” [8]

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखें तो मेहरुन्निसा परवेज़ के कथा साहित्य में हमें स्त्री जीवन के विविध पक्ष देखने को मिलते हैं। मेहरुन्निसा परवेज़ दाम्पत्य जीवन, सम्बन्धों में स्त्री, मध्य एवं निम्नवर्ग में स्त्री, सामाजिक संस्थाओं में स्त्री जीवन को बखूबी रेखांकित करती हैं। 

 

 

 

सन्दर्भ सूची

  1. नलावड़े, डॉ. मनोहर, ‘मेहरुन्निसा परवेज़ का कथा साहित्य’, चंद्रलोक प्रकाशन, कानपुर, 2014
  2. मेहरुन्निसा परवेज़ की लोकप्रिय कहानियाँ, 2017, दिल्ली, प्रभात प्रकाशन
  3. जाधव, डॉ. अनीता, 2012, ‘मेहरुन्निसा परवेज़ की कहानियाँ: एक अध्ययन’, कानपुर, चंद्रलोक प्रकाशन
  4. जैन, अरविंद, 2013, ‘औरत अस्तित्व और अस्मिता’, नयी दिल्ली, राजकमल प्रकाशन
  5. कस्तवार, रेखा, 2009, ‘स्त्री चिंतन की चुनौतियाँ’, नयी दिल्ली, राजकमल प्रकाशन
  6. शर्मा, क्षमा, 2012, ‘स्त्रीत्ववादी विमर्श: समाज और साहित्य’, नयी दिल्ली, राजकमल प्रकाशन
  7. यादव, राजेन्द्र (सपा॰), 2011, ‘अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्य’, नयी दिल्ली, राजकमल प्रकाशन
  8. सिंह, वी॰ एन॰, जनमेजय सिंह, 2010, ‘आधुनिकता एवं नारी सशक्तिकरण’, जयपुर, रावत पब्लिकेशन
  9. देशपांडे, डॉ॰ वैशाली, 2007, ‘स्त्रीवाद और महिला उपन्यासकार’, कानपुर, विकास प्रकाशन
  10. अनामिका, 1999, ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’, दिल्ली, सारांश प्रकाशन
  11. देसाई, नीरा, ऊषा ठक्कर, 2011, ‘भारतीय समाज में महिलाएं’, इंडिया, नेशनल बुक ट्रस्ट
  12. खेतान, डॉ॰ प्रभा, 2008, ‘स्त्री उपेक्षिता’, नई दिल्ली, हिन्द पॉकेट बुक्स

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

[1] रानी, दीपिका, ‘हिन्दी कहानी और मुस्लिम समाज’, पृष्ठ 55

[2] सहाय, लक्ष्मण, ‘मेहरुन्निसा परवेज़ की लोकप्रिय कहानियाँ’, पृष्ठ संख्या 6

[3] परवेज़, मेहरुन्निसा, ‘एक और सैलाब’ (आमुख)

[4] जाधव, डॉ. अनीता, ‘मेहरुन्निसा परवेज़ की कहानियाँ: एक अध्ययन’, पृष्ठ संख्या 46

[5] आदवानी, डॉ. मालती, ‘लेखिकाओं की नवें दशक की हिन्दी कहनियों में पारिवारिक संबंध’, प्राककथन से

[6] शर्मा, डॉ. मंजु, ‘साठोत्तरी महिला कहानीकार’, पृष्ठ संख्या 96

[7] जोशी, डॉ. मीना, ‘प्रतिनिधि महिला कहानिकारों में चित्रित नारी’, पृष्ठ संख्या 44

[8] गर्ग, मृदुला, ‘प्रथम दशक के महिला लेखन में स्त्री विमर्श’, पृष्ठ संख्या 105