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वर्चस्ववादी मानसिकता को गौण बनाती अपराजिता स्त्री का चरित्र- धनिया

वर्चस्ववादी  मानसिकता को गौण बनाती अपराजिता स्त्री का चरित्र – धनिया

संदर्भ-प्रेमचंद कथा-साहित्य

डॉ विमलेश शर्मा

सहायक आचार्य, हिन्दी

राजकीय कन्या महाविद्यालय,अजमेर

Vimlesh27@gmail.com

 


हिन्दी में प्रेमचंद जब  कथा-साहित्य में अवतीर्ण हुए उस समय साहित्य पाश्चात्य बयार से प्रभावित हो रहा था। पाश्चात्य उपन्यासों के प्रभाव से ही उन्होंने जीवन के यथार्थ को कहानीकला में रूपायित किया और चेतना को व्यापक बनाकर उसकी स्थायी भीतरी शक्तियों को समझने का प्रयास भी किया। कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रेमचंद के कृतित्व में  जो जीवन संपर्क और सहानुभूति है, कल्पना की मनोरमता के साथ-साथ ग्रामीण महिला स्वभाव का सूक्ष्म विश्लेषण और वैचित्र्य है, उसी के कारण वे आधुनिक कथा साहित्य के सिरमौर कहे जाते हैं। सार्थक और कालजयी रचनाएँ कभी भी इकहरे पाठ वाली नहीं हुआ करती। अपने चार दशकों के रचनाकाल में कलम के इस सिपाही ने  ज़िन्दग़ी के पथरीले रास्तों में अनुभवों की विपुल पूँजी कमाई, उसी का निवेश उन्होंने पूरे मनोयोग और जीवंतता के साथ अपनी रचनाओं में भी किया। उनका मानना था कि ‘हम उस महान सत्ता के सूक्ष्मांश हैं, जो समस्त संसार में व्याप्त है। अंश में पूर्ण के गुणों का होना लाजिमी है, इसीलिए कीर्ति और सम्मान, आत्मोन्नति और ज्ञान की ओर हमारी स्वाभाविक रूचि है।’ इस वक्तव्य की सहजता स्पष्ट तौर पर उनकी रचनाओं में झलकती है। सरलता और सहजता बड़ी मुश्किल से अर्जित की जाती है और लेखन में यह साधना से ही

आ पाती है। उनका कथा-साहित्य सार्थक और सारगर्भित रचनाशीलता का साक्ष्य रहा है। उनका मानना था कि यहाँ तो बस सरलता में सरलता पैदा कीजिए, यही कमाल है।

कथा-साहित्य की व्यापकता में प्रेमचंद का ग्राम्य समाज से स्नेह सहज ही परिलक्षित होता है। उन्होंने ग्रामीण समाज की शक्ति और दुर्बलताओं का, उनके सामाजिक, नैतिक और शारीरिक स्वभाव एवं विशेषताओं का, उनकी रूचि,आदर्श, भावना तथा चारित्रिक उत्थान,पतन आदि का जितना मनौवेज्ञानिक विश्लेषण किया है, उतना अन्य किसी आधुनिक कथाकार ने नहीं। स्त्री की बात करें तो उसका मनोविज्ञान पक्ष अधिक जटिल है। उनकी कहानियों में ग्रामीण परिवेश और स्त्री मनोविज्ञान भी परत दर परत खुलता दिखाई देता है। स्त्री कब प्रेम करती है, कब द्वेष से भर उठती है, कब पश्चाताप व आत्मग्लानि से भर उठती है, प्रेम में वह कितनी द्रवीभूत हो उठती है, क्रोध व प्रतिशोध के समय वह किस प्रकार चण्डी का रूप धारण कर लेती है, लज्जा मनोभाव में  वह कितनी कोमल मना होती है और गर्वोन्मत्त हो कितनी गौरवमयी और उज्ज्वल; उसका जितना ज्ञान प्रेमचंद को था उतना कदाचित् ही अन्य किसी लेखक को। उनके सुमन, धनिया, झुनिया, सिलिया आदि ग्रामीण महिलाओं के चरित्र इस तथ्य को स्वयं रेखांकित करते हैं। स्त्री मुद्दों पर वे अपने एक वक्तव्य में कहते हैं कि, ‘प्यूरिटव मनोवृत्ति जैसे इस ताक में रहती है कि, किसका पाँव फिसले और वह तालियाँ बजाए। प्यूरटिनिज्म और अनुदारता दो पर्याय जैसे हो गये हैं और जहाँ सेक्स का प्रश्न आ जाता है, वहाँ तो वह नंगी तलवार, बारूद का ढ़ेर है। यहाँ वह किसी तरह की नर्मी नहीं कर सकता। भोग उसकी दृष्टि में सबसे बड़ा पाप है। चोरी करके हम समाज में रह सकते हैं, उसी शान और अकड़ के साथ,किंतु भोग अक्षम्य अपराध है। उसके लिए कोई प्रायश्चित नहीं। पुरूषों के लिए तो चाहे किसी तरह क्षमा सुलभ भी हो जाए, किंतु स्त्रियों के लिए क्षमा के द्वार बंद हैं और उन पर अलीगढ़ वाला बारह लीवर का ताला पड़ा हुआ है। इसी का यह प्रसाद है कि हमारी बहनें और स्त्रियाँ आये दिन तीर्थ स्थानों में लाकर छोड़ दी जाती है।’ अपने इन्हीं विचारों को वे कथा-साहित्य में सम्पूर्ण वास्तविकताओं के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं।

शोषक और शोषित की करूण गाथा लेकर जिस ग्रामीण परिवेश का चित्रण प्रेमचंद करते हैं, वह वाकई बेजोड़ है। किसान जीवन भर खटता है और उसकी स्त्री हर सांस उसका ब्याज़ चुकाती है। वे बताते हैं कि साहूकारी और ज़मींदारों के बीच स्त्री की क्या बिसात, परन्तु इस गौणता को भी वे व्यापक और विशद रूप प्रदान कर साहित्य की प्रगतिवादी दीठ के सृजक बन जाते हैं। इसी सर्जना में वे ऐसे ग्रामीण स्त्री पात्रों की रचना करते हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में पुरूषों से भी पर्याप्त आगे निकल जाते हैं। हाँ इस निर्मिति में वे आदर्श का भरपूर सहारा लेते हैं। पुरूष चाहे शराबी हो, अकर्मण्य हो, किसानी से जी चुरा रहा हो या असत् कर्मों में लिप्त हो परन्तु स्त्री सदैव मानवीय गुणों से लबरेज़ और आदर्श व्यक्तित्व की स्वामिनी ही होगी ऐसा प्रेमचंद का मानना था। कुछ पात्रों को देखें तो, ‘चमत्कार’ की चम्पा चन्द्रप्रकाश को आचार का पाठ पढ़ाकर अपना अनुव्रती बनाती है। ‘सुहाग का शव’ की सुभद्रा अपने अनेकनिष्ठ बहके पति को कर्त्तव्य बोध कराकर पश्चाताप की अग्नि में धधकाकर उसे कुंदन बनाती है। वहीं ‘स्त्री पुरूष’ की आशा, ‘भूत’ की मंगला, ‘गोदान’ की धनिया आदि ग्रामीण महिला पात्रों के चरित्रों में  वह सामर्थ्य है , जो पुरूषों से अधिक  मानवीय औक कई स्थलों पर तो अतिमानवीय हो जाते हैं।

ग्रामीण समाज में स्त्री की दशा को चित्रित करते हुए उसकी भूमिका की दिशा का निर्धारण करने में भी प्रेमचंद पीछे नहीं रहते। ग्रामीण महिला में दिव्य गुणों की स्थापना के लिए  प्रेमचंद उसे पूर्ण शिक्षित देखना चाहते हैं। इसके अभाव में उसके श्रम का कोई मोल नहीं है, ऐसा प्रेमचंद का कहना है। यहीं नहीं वे शिक्षा के साथ-साथ कानूनी अधिकार दिलाने के भी पक्षधर हैं। “मैं नहीं कहता देवियों को विद्या की ज़रूरत नहीं है। है, और पुरूषों से कहीं अधिक है। स्त्री की विद्या और अधिकार हिंसा और विध्वंस में नहीं, सृष्टि और पालन में हैं।”(गोदान-प्रेमचंद,पृ.-165)

ग्रामीण स्त्री की स्वतंत्रता के संबंध में वे सुधारवादी दृष्टिकोण रखते थे। वे जानते थे कि तत्कालीन समाज परदा, वेश्यावृत्ति, बाल-विवाह, वैधव्य आदि कुरीतियों से ग्रस्त था। इसी कारण वे सेवासदन और गोदान में स्त्री जीवन की इन्हीं समस्याओं को रेखांकित करते हैं।  ग्रामीण समाज में महिला का जीवन कितना अभिशप्त, पूर्वाग्रही और कठिन रहा है इसका उदाहरण गोदान की धनिया है जो आजीवन अधखाये और अर्धनग्न रहकर परिवार के हित के लिए स्व-व्यक्तित्व का बलिदान कर देती है।

ग्राम्य समाज की वास्तविक स्थिति के प्रथम सूक्ष्मदर्शी कथाकार अगर कोई थे तो मुंशी प्रेमचंद। ग्राम्य संस्कृति के सभी वर्गों और उनसे संबंधित सभी संदर्भों का व्यापक और यथार्थ चित्रण उनकी कहानियों में मिलता है। गाँवों की अनपढ़, अक्ख़ड़, अंधमर्यादावादिनी और धर्म तथा समाज के स्वयंभू कर्ताधारों के शोषण चक्र का शिकार बनी रहने वाली ग्रामीण महिलाएँ उनके कथासूत्रों की विधायिनी हैं।  उनकी आरम्भिक कहानियों में ग्रामीण स्त्रियों की चरित्र आदर्शवाद के लिहाफ़ में लिपटा दिखाई देता है । प्रारम्भिक कहानियों में वे घर की चहारदीवारी और अपनी दासता में बुरी तरह जकड़ी हुई हैं। इन कहानियों में  वे प्रायः यथार्थ की भाव-भूमि पर खड़ी रहकर भी सदैव आदर्शवादी और मर्यादावादी थीं। उनकी जागरूकता उनकी मर्यादा में सोयी पड़ी थीं। परवर्ती कहानियों में वे अपेक्षाकृत अधिक मुखरित और स्पष्टवादिनी हुईं हैं। उन्हें स्थान-स्थान पर कहानी का नायकत्व मिला है और उनके व्यक्तित्व के किनारे-किनारे कहानी की घटनाएँ तथा अन्य पात्र घूमते दृष्टिगोचर हुएं हैं।

विकासकाल तक आते-आते ग्रामीण महिलाओं का जीवन-दर्शन बहुत ही परिवर्तित और क्रान्तिकारी हो गया है। विद्रोह की एक सफल चेतना उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट दिखाई देने लगती है। अनेक वे धारणाएँ जो वेदो,पुराणों और स्मृतियों में अमिट थीं, प्रेमचंद के कथा-साहित्य में टूटती नज़र आती है। स्मृतियों और ब्राह्मण ग्रंथों पर नज़र डालें तो वे चीख-चीख कर ना केवल यह कहती नज़र आती हैं कि विदुषी व स्वसम्मान के प्रति जागरूक स्त्रियाँ अपवाद मात्र हैं। मनु-स्मृति ने तो स्त्रियों को झूठ से उत्पन्न होने वाली कहा है। स्त्री के प्रति यह दोयम व्यवहार सदियों की उपज का नतीजा है, प्रेमचंद इसी खरपतवार पर कथा-साहित्य की कैंची चलाते हैं। उनकी कहानियों, उपन्यासों के अनेक स्त्री-चरित्र बहुत अधिक मुखर रूप से तो नहीं पर हाँ स्त्री अस्तित्व की सजगता और आत्मस्वातंत्र्य की बयार में बहते नज़र आते हैं। उदाहरण स्वरूप ही देखें तो, ‘शंखनाद’ कहानी में छोटे भाई द्वारा नहीं कमाने पर वितानी की पत्नी स्पष्ट शब्दों में कहती है, “अब समझाने-बुझाने से काम नहीं चलेगा। सहते-सहते हमारा कलेजा पक गया।”(शंखनाद-प्रेम-पूर्णिया-प्रेमचंद,पृ.29) सुंदर-असुंदर जैसी अवधारणाएँ हमारे समाज में सदा से जीवित रही है, पर प्रेमचंद के कथा-पात्र इसको चुनौती देते हैं।  ‘आभूषण’ कहानी की मंगला के सुंदर नहीं होने पर पति उसका आदर-सम्मान नहीं करता, उससे प्रेम नहीं करता और इसी कारण वह घर छोड़कर चली जाती है। ईश्वर को ललकारती हुई वह कहती है-“मैं ईश्वर के दरबार में पूछूँगी कि तुमने मुझे सुंदरती क्यों नहीं दी, बदसूरत क्यों बनाया।”(आभूषण-प्रेम-प्रसून, प्रेमचंद,पृ-116) यही वे स्थल हैं जहाँ ग्रामीण स्त्री का व्यक्तित्व पुरूष की बराबरी में आ जाता है और पुरूष के अत्याचार, शोषण व उसकी निरंकुशता से  ऊबकर स्त्री क्रांति के स्वर में अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और निजत्व की घोषणा करती है। यहाँ वह वर्जीनिया वुल्फ़ की ही भाँति मानो कह उठती है, ‘मेरे मस्तिष्क की स्वतंत्रता  पर पाबंदी लगाने के लिए न कोई दरवाज़ा, न ताला है और न कोई कुंडी।’

जिसकी आत्मा जितनी विशाल है, वह उतना ही बड़ा महापुरूष है, मानने वाले प्रेमचंद स्त्री को उसकी चारित्रिक, लैंगिक विशेषताओं और मानवीय गुणों के साथ चित्रित करते हैं। ‘ब्रह्म का स्वांग’ नामक कहानी की ग्राम्य महिला वृन्दा इतनी सरल और भोली-भाली है कि उसकी मर्यादावादी और आदर्श व्यवहार पर उसके साम्यवादी पति खीझते हुए सदैव दुःखी रहते हैं। लेकिन जब वृंदा एकाएक सच्चे रूप में साम्यवादी बन जाती है, तब भी पति महोदय और जलभुन उठते हैं फिर वृन्दा सोचती है कि अब वह क्या करे? वह पुरूष के इस खोखलेपन पर कुपित होकर सोचती है-“यह घर अब मुझे कारागार लगता है किंतु मैं निराश नहीं हूँ।”(ब्रह्म का स्वांग,प्रेम पचीसी-प्रेमचंद, पृ.68) प्रतिरोध के यही चैतन्य स्वर विध्वंस कहानी में भी सुनाई देते हैं।  इस कहानी में भाड़ का काम करने वाली विधवा , वृद्धा , संतानहीन भुनगी अपने शोषक ज़मींदार से अपने संघर्ष में प्राण दे देती है, लेकिन कहती रहती है-“ क्यों छोड़कर निकल जाएं। बारह साल खेत जोतने से असामी भी काश्तकार हो जाता है। मैं तो इस झौंपड़ी में बूढ़ी हो गयी। मेरे सास-ससुर और उनके बाप-दादे इसी झौंपड़ी में रहे। अब इसे जमराज को छोड़कर और कोई मुझसे नहीं ले सकता।” (विध्वंस,प्रेम पचीसी,पृ.-200)

प्रतिरोध के साथ-साथ प्रेमचंद के कथा-साहित्य में कुछ ऐसी ग्रामीण महिलाओं का चरित्र भी देखने में आया है जिन्होंने अपने पथ-भ्रष्ट पतियों को कर्म-मार्ग पर ला खड़ा किया है। अपने उजड़ते हुए घरों को भी बचाया है तथा अपने उच्च चरित्र से बार-बार अन्य वर्ग को आकर्षित किया है। अनेक स्त्री चरित्र हैं जो सामंती मानसिकता को करारा जवाब दे अपने चरित्र और आत्मसम्मान की रक्षा करती है पर गोदान की धनिया प्रेमचंद साहित्य की अन्यतम उपलब्धि है। इस विचार से लगभग सभी समालोचक भी सहमत हैं अतः प्रस्तुत आलेख में धनिया के माध्यम से ग्रामीण स्त्री संवेदना को अनेक स्तरों पर उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।  धनिया प्रेमचंद के दलित समाज विषयक सम्पूर्ण आत्ममंथन की मूल संवेदना है, जिसका प्रेमचंद साहित्य में आद्योपांत,आलोडन होता रहा है। वह निजी सजीवता,तीव्रता, विक्षुब्धता एवं व्यापकता की सर्वोत्कृष्टता के कारण अमर हो गयी है। धनिया लेखक के लेखन की उग्रपक्ष की प्रसारिका है। अपने इस रूप में वह किसी पाठक की घृणा का पात्र न बनकर उसकी श्रृद्धा का विषय बन जाती है, क्योंकि उसके इसी रूप में भारतीय ग्रामीण महिला की आत्मा वास करती है।  पति को जलपान कराने के उसके आग्रह में उसके गार्हस्थिक जीवन की मधुरिमा टपकती है। स्त्री परिवार में उम्र भर खटती रहती है। अपने जीवन का कतरा-कतरा गृहस्थी में होम कर देती है, यही बात धनिया का चरित्र भी प्रदर्शित करता है।  धनिया का संभ्रान्त शरीर जीवन-संघर्ष में घिस-पिस जाता है और छत्तीस वर्ष की अवस्था में ही उसकी जो दशा हो जाती है, उसे प्रेमचंद यूँ लिखते हैं-“ सारे बाल पक गए, चेहरे पर झुर्रिया पड़ गयीं, सारी देह ढल गयी, सुंदर गेहुँआ रंग साँवला हो गया और आँखों से अब कम दिखने लगा था। ”(गोदान-प्रेमचंद, पृ.2) समाज के ठेकेदार व्यवहारकुशलता को स्त्री का प्रमुख गुण मानते हैं परन्तु धनिया व्यवहारकुशल नहीं है। अपनी इस व्यवहार शून्यता और स्पष्टवादिता ने ही अनेक बार पुलिस के पिशाचों और बिरादरी के भूतों से उसकी रक्षा की है। वह अपने पति होरी जैसी व्यवहारकुशल बनना भी नहीं चाहती है। अपने बीस वर्षों के वैवाहिक जीवन में  उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया है कि- “चाहे कितनी भी कतर-ब्यौंत करो , कितना भी पेट-तन काटो, चाहे एक-एक कौड़ी को दाँत से पकड़ो मगर लगान बेवाक होना मुश्किल है।”(गोदान-प्रेमचंद, पृ.51) परन्तु तमाम वैपरीत्य के बावज़ूद वह हार नहीं मानती। वह विपत्तियों के आगे घुटने टेक कर लक्ष्य भ्रष्ट होने वाली महिला नहीं है। जीवन व्यापी अभाव ही उसकी सबसे बड़ी धरोहर है। उसकी छः संतानों में से तीन ही जीवित है। पर खुद को इस दुख में तसल्ली देती है कि दवा-दारू होती तो बचा पाते। नियति के आगे हर पात्र अवश है पर यही नियति पठार सा धीरज भी सिखाती है।

धनिया का अपना शरीर ही उसके शोषित जीवन की करूण गाथा स्पष्ट कर देने के लिए पर्याप्त है। उसको निर्धन बनाए रखने वाली परिस्थितियों से धनिया का मन बराबर विद्रोह अवश्य करता है, लेकिन उनसे बच निकलने का मार्ग उसे नहीं सूझता। वह जहाँ कहीं से भी इन शोषक परिस्थितियों से भाग निकलना चाहती है,उधर ही समाज के क्रूर भेड़िये, उसे जीवित निगल जाने के लिए उद्यत दिखाई देते हैं।  प्रेमचंद की दृष्टि में उसे वहाँ उदासीन रहकर ही कुछ सुख मिल सकता है। गोदान का अनेक स्थलों का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि धनिया के चरित्र में सहन शक्ति तथा तथाकथित स्त्रियोचित गुणों की अपेक्षा विद्रोह की भावना ही अधिक है। कई स्थलों पर ऐसा भी लगता है कि मानो वह केवल और केवल विद्रोह की ही साक्षात् मूर्ति है। वह पति से, समाज से, समाज के ठेकेदारों से, ज़मींदारों से, गरीबों का शोषण करने वालों से और उससे भी अधिक अपनी निर्धनता से विद्रोह करती है। उसका संघर्ष अन्याय-अत्याचारों से लड़ने का मानवीय संघर्ष है।  वह अपनी अवस्था पर जलती- भुनती है। पति पर क्रुद्ध होती है। जो नहीं कहना चाहिए उसे कहकर  पति से पिटती भी है, फिर भी तमाम प्रतिरोधी मानसिकता के बीच भी अपने सुगृहिणी के कर्त्तव्य से कभी विमुख नहीं होती।

धनिया त्यागमयी मालकिन है।  अपना संभ्रांत वैभव , जो कुछ भी उसके पास था , सभी देवरों के लालन-पालन में व्यय कर दी है। जब वे ही देवर उस पर लांछन लगाते हैं तो समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता उस पर फिर हावी होती दिखाई देती है। इस पर उसका यह कहन स्वाभाविक प्रतिक्रिया सा जान पड़ता है-“डाड़ी जारों के पीछे हम बरबाद हो गये, सारी ज़िन्दग़ी हमनें मिट्टी में मिला दी, पालपोसकर खड़ा किया और अब हम बेईमान हैं?”(गोदान-प्रेमचंद-पृ.46) धनिया के व्यक्तित्व में उसकी ईमानदार निर्भीकता ही है जिसके आवेग में वह कह उठती है-“हमने रूपये दबा लिए, बीच खेत में दबा लिए। डंके की चोट कहती हूँ , मैंने हंडेभर अशर्फियाँ छिपा ली। हीरा और सोभा और संसार को जो करना हो कर लें।”(गोदान-पृ.47) यहीं प्रतिरोध उस समय मुख़र हो जाता है जब  गाँव के मुखिया, पुलिस दारोगा से मिलकर होरी से रूपये ऐंठना चाहते हैं, वह उस समय नागिन सी फुफकार कर बोलती है-“ये रूपये कहाँ लिए जा रहा है ,बता! भला चाहता है तो सब रूपये लौटा दे। घर के परानी रात-दिन मरें, दाने-दाने को तरसें, लत्ता भा पहनने को मयस्सर ना हो और तू अंजुरी भर रूपये लेकर चला है इज्ज़त बचाने। ऐसी बड़ी है तेरी इज्ज़त।”(गोदान-पृ.117)

धनिया का चरित्र-चित्रण लेखक ने इतना सजीव और जीवंत किया है कि इस विश्लेषण से लगता है कि हम धनिया के चरित्र को पढ़ नहीं रहे हैं, अपितु हमारी आँखों के सामने वह साक्षात् खड़ी है। उसकी निडरता और बेबाकीपन हमें आकर्षित करता है-“ पहना दो मेरे हाथ में हथकड़ियाँ। देख लिया  तुम्हारा न्याय, और तुम्हारे अक्ल की दौड़। गरीबों का गला काटना दूसरी बात है। दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात है।”(गोदान-पृ.118) कर्म पर विश्वास रखने वाली और स्वाभिमानिनी धनिया होरी की ज्यादती का विरोध कर कह देती है-“तू समझता होगा, मैं इसे रोटी कपड़ा देता हूँ। आज से अपना घर संभाल।.....इससे अच्छा खाऊँगी-पहनूँगी। इच्छा हो तो देख ले।”(गोदान-पृ.-188)

धनिया का यह कोप , क्रोध  उसके शोषित स्वाभिमान की फुंकार है। उसे जब क्रोध आता है वह चंडी हो जाती है। धनिया स्त्री होकर भी पुरूष है। परन्तु पुरूष की स्पष्टवादिता, कठोरता और निर्भीकता को अपनाकर भी उसने स्त्री सुलभ दया,प्रेम, वात्सल्य, सेवा एवं सहिष्णुता को नहीं त्यागा। उसके चरित्र में कठोर व कोमल भावों का अद्भुत समन्वय प्रेमचंद की स्त्री दृष्टि का ही परिचायक है। यहाँ फिर वर्जीनिया वुल्फ़ याद आती हैं कि-‘पुरूष बस इसलिए योग्य हैं क्योंकि वे स्त्री नहीं है।’

जाति या समाज के ठेकेदारों के प्रति धनिया का जो आक्रोश है वह किसी वाद, प्रतिवाद से प्रेरित नहीं है, ना ही वह किसी राजनीति या समाजवाद से प्रेरित है। उसका विद्रोह एक शोषित, साहसी और आर्थिक दृष्टि से परकटी स्त्री का अपना विद्रोह है। मातृत्व धनिया के चरित्र की उपलब्धि है, बस इसी गुण के कारण उसका तथाकथित नारीत्व शेष है, अन्यथा वह पुरूष बन गई होती। वह कठोर होती है तो बस परिस्थितियों के भय से, किंतु मातृ हृदय के दैवीय गुण अचानक उसे नवनीत तुल्य कोमल बना देते हैं। गर्भवती झुनिया के घर में प्रविष्ट होने पर वह उसके साथ जो व्यवहार दिखाती है, उससे उसके मातृत्व की समस्त गरिमा को सहज ही समझा जा सकता है। “वही साध्वी धनिया इस पापिष्ठा को गले लगाए , उसके आँसु पोंछ रही थी और उसके तप्त हृदय को अपने कोमल शब्दों से शांत कर रही थी, जैसे कोई चिड़िया अपने बच्चों को परों में छिपाए बैठी हो।”(गोदान-पृ.112) यों तो धनिया का चरित्र एक सशक्त अपराजिता स्त्री का चरित्र है। समाज, धर्म और जाति-बिरादरी का आडम्बर खड़ा करके  उसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता । लेकिन भारतीय रूढ़िवादी कृषक की पत्नी होने के कारण उसे भी जीवन की विवशताओं से पराजय का मुँह देखना पड़ा है। परिस्थितियों से लड़ने की अपूर्व क्षमता उसके चरित्र में है। सच्चरित्रता उसकी एक और बड़ी विशेषता है। धोखा देना वह नहीं जानती। प्राण, प्रण से रिश्तों का निर्वहन उसकी खूबी है। निर्धन, विवशता और लाचारी के जीवन को जीते हुए भी आत्मसम्मान से लबरेज़ है। उसके जीवन का सार है- पैदा होना, जी तोड़ मेहनत करना और फिर अतृप्त रहकर ही मर जाना। परिश्रम करते-करते पगला जाना पर गाय रखने की इच्छा को पूरी नहीं कर पाना। उसकी लाचारगी की पराकाष्ठा है कि पति के गोदान के लिए उसके पास न गाय है, न बछिया है, न पैसा। केवल सूतली बेचकर  कमाये हुए बीस आने हैं, और साथ में है उसकी वह हार्दिक वेदना, जिसमें उसका मातृत्व सिमटकर एकान्वित हो गया है। निश्चय ही वर्चस्ववादी ताकतों को धता बताती धनिया प्रेमचंद साहित्य की सर्वोत्तम सर्जना है,जो हिंदी साहित्य में स्त्री अस्मिता का आगाज़ कर उसे गौरव प्रदान करने का भी सामर्थ्य रखती है।