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वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और साहित्य: संदर्भ उदय प्रकाश रचित ‘पीली छतरी वाली लड़की’

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और साहित्य

संदर्भ उदय प्रकाश रचित ‘पीली छतरी वाली लड़की’

डॉ. अजीत कुमार दास

 


भारतवर्ष में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। न सिर्फ देश में बल्कि पूरी दुनिया में यह तीसरी भाषा है जो सर्वाधिक प्रयोग में लाई जाती है। हिंदी को आज पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित करने का श्रेय किसे दिया जाए, इस पर एक आम सहमति बनना मुश्किल है। लेकिन इतना तो सच है कि हिंदी आज लोगों की बड़ी प्यारी और दुलारी भाषा बनी है, इसके पीछे बहुत से कारण हैं और उन सबमें एक कारण है इसकी सरलता। यही कारण है कि आज हिंदी सिर्फ साहित्य की भाषा न होकर, तमाम माध्यमों की भाषा बनती जा रही है। बल्कि दो शब्दों में कहें तो हिंदी आज बाजार की भाषा है, जन-जन की भाषा है, आम आदमी की भाषा है। और हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बाजार की भाषा वही होती है जो आम जनता से लेकर विशिष्ट जनों के बीच प्रयोग की जाती है। फिर क्या कारण है कि बहुत सारी जगहों पर हिंदी को हेय दृ‍ष्टि से देखा जाता है। हिंदी भाषा का इस्तेमाल करने और हिंदी साहित्य का अध्ययन करने वालों को अलग दुनिया का समझा जाता है, गंवारों और देहातियों की तरह समझा जाता है और खुद हिंदी बोलने वाले, हिंदी पढ़ने वाले लोग हीन भावना के शिकार होते हैं। उनकी मानसिकता इतनी संकीर्ण क्यों हो जाती है? हिंदी साहित्य का अध्ययन और अध्यापन का कार्य करने वाले छात्र और शिक्षक एक अलग ही दुनिया में जीते हैं। इन तमाम बातों को उदय प्रकाश ने ‘पीली छतरी वाली लड़की' कहानी के माध्यम से पाठकों के सामने रखने का प्रयास किया है। उन्होंने हिंदी साहित्य का अध्ययन करने वाले तथा अध्यापन कराने वाले लोगों की वास्तविक स्थिति को हू-ब-हू प्रकट कर दिया है जैसा कि कॉलेज-विश्‍वविद्यालयों में आम तौर पर देखने को मिलता है।

उदय प्रकाश ने ‘पीली छतरी वाली लड़की' कहानी में विश्‍वविद्यालय में मौजूद हिंदी विभाग के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य से संबंधित तमाम मुद्दों को परत-दर-परत उघाड़ने का प्रयास किया है और यह बताने की कोशिश की है कि वैश्विक भाषा हिंदी की क्या स्थिति है, साथ ही साथ इस हिंदी के नाम पर मुफ्त की रोटियां तोड़ने वाले और पीढ़ियों से चले आ रहे उनके हिंदी प्रेम को आम जनों के सामने नंगा कर दिया है। कहानीकार ने विश्‍वविद्यालय में मौजूद हिंदी और हिंदी से ही करीबी संबंध रखने वाली उर्दू और संस्कृत विभाग की सच्चाई को हमारे सामने रखा है कि किस तरह हिंदी विभाग, हिंदी पढ़ने वाले बच्चे और हिंदी पढ़ाने वाले अध्यापक दूसरे अन्य विभागों से दूर गुमनामी का जीवन बिताते हैं -- "हिंदी, उर्दू और संस्कृत -- ये तीन विभाग विश्‍वविद्यालय में ऐसे थे, जिनके होने के कारणों के बारे में किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था। यहां पढ़ने वाले छात्र यहां से निकलकर किस भविष्य की ओर जाएंगे, कोई ठीक-ठीक नहीं जानता था। वे उजड्ड, पिछड़े, मिसफिट, समय की सूचनाओं से कटे, दयनीय लड़के थे और वैसे ही कैरिकेचर लगते उनके अध्यापक ! कोई पान खाता हुआ लगातार थूकता रहता, कोई बेशर्मी से सार्वजनिक रूप से अपनी जांघ की जोड़ें खुजलाता,  कोई चुटियाधारी धोती छाप रघुपतिया किसी लड़की को चिंपैंजी की तरह घूरता।

कैंपस में लड़के मजाक में उस विभाग को ‘कटपीस सेंटर' कहते थे जो लड़कियां सूरत-शक्ल और प्रतिभा से ठीक-ठाक होतीं वे दूसरे विषयों में एडमीशन पाकर विश्‍वविद्यालय की मुख्यधारा में शामिल हो जाती थीं। बची-खुची लड़कियाँ और लड़के ही वहां प्रवेश लेते, उनको देखकर ही लगता था कि ‘ड्रॉप आउट्स' हैं।’’1

विश्‍वविद्यालय में हिंदी विभाग में प्रवेश लेने वाले छात्रों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। दूसरे विषयों के विद्यार्थी उन्हें हेय और घृणा की दृष्टि से देखते हैं। जैसे लगता है कि वे लोग दूसरे ग्रहों से आए हुए प्राणी हों। उदय प्रकाश ने हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की वास्तविक स्थिति को दिखाया है। ऐसे विद्यार्थी जो किसी दूसरे विभाग के विद्यार्थियों से मेल नहीं खाते। उन्‍होंने इस विभाग में पढ़ने वाली लड़कियों का विवरण कुछ इस तरह से दिया है --"विधाता गहरे असमंजस, ऊब और थकान के हाल में रहा होगा जब उसने हिंदी डिपार्टमेंट की इन कन्याओं की रचना की। वह इस सृष्टि के किसी अन्य प्राणी को बनाना चाहता रहा होगा, मसलन नील गाय, जिराफ, हिप्पोपोटेमस, घड़ियाल, हाथी, मेढ़क, कछुए या घोड़े इत्यादि लेकिन उकताहट में आखिर में उसने इन्हें बना डाला था। वे दु:खी, कुंद, अजीब और मानवीय आकार-प्रकार के समस्त नियमों का अपवाद सिद्ध होने के लिए बनी थीं। अपने-अपने घरों से खाना बांधकर लातीं और पीरियड्स के बीच के गैप में छुपकर झुंड में ही खाती थीं। एक दिन उन सबको झुंड में पी-एच. डी. करनी थी और फिर एक दिन अलग-अलग निज घर-बार बसाना था, लेकिन ये अक्सर चहकतीं हुई हँसती थीं, ऐसे में उनकी आँखें चमकदार हो जाती थीं, दाँत निकल आते और दुपट्टे या साड़ी का पल्लू अपने मुँह की ओर लाने की कोशिश करतीं। उन्हें देखकर लगता कि जैसे अभी भी ‘उड़न खटोला, ‘अनमोल घड़ी', ‘बावरे नैन' और ‘बरसात' जैसी फिल्मों का जमाना चल रहा है। इनमें जो सबसे आधुनिक होतीं, वे पटरी से खरीदी गई सस्ती जींस की रेडीमेड पैंट के साथ कोई भी अनमैचिंग टॉप या शर्ट पहन लेतीं और तमिल फिल्मों की एक्स्ट्रा नजर आतीं या फिर अधिक-से-अधिक ‘मेरा साया' फिल्म की हीरोइन साधना, जिसके जूड़े के भीतर स्टेनलेस स्टील का गिलास औंधा छुपा होता था, और वैसे ही लड़के। राहुल हिंदी विभाग में उसी तरह था, जैसे किसी ‘टाइम मशीन’ ने उसे किसी और समय और स्पेस में पहुँचा दिया हो।’’2

ये हैं हिंदी विभाग की तस्वीर जिसमें हम अच्छी तरह से देख सकते हैं कि हिंदी विभाग में पढ़ने वाले लड़कें और लड़कियों की क्या स्थिति होती है और विभाग में किस तरह बच्चे अपने भविष्य को लेकर चिंतित होते हैं तथा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का किस तरह से प्रसार है, उसका उदय प्रकाश ने बखूबी चित्रण किया है -- "हिदी विभाग में राहुल की दोस्ती शैलेंद्र जॉर्ज और शालिगराम के साथ ही सबसे ज्यादा और सबसे पहले हुई। अपने आप ही, बिल्कुल सहजता से, वे तीनों क्लास में एक साथ, एक दूसरे के नजदीक बैठने लगे। आपस की बातचीत में यह पता चला कि बाकी छात्र किसी-न-किसी अध्यापक के या तो रिश्ते में हैं या किन्हीं अन्य कारणों से उनके निकट हैं। वे अपने-अपने भविष्य के लिए आश्‍वस्त और बेफिक्र लड़के थे। विभाग में चलने वाली राजनीति के वे ज्यादातर प्यादे थे। उनकी रुचि साहित्य या किताबों में कम और डिग्री, नियुक्ति, प्रमोशन, फेलोशिप आदि हथियाने के गुर सीखने में ज्यादा थी। वे बहुत तेजी से यह प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। उनकी जैविक आनुवांशिकता में कुछ गुणसूत्र ऐसे थे जिससे वे ये विद्या उतनी ही सरलता से सीख रहे थे, जितनी सरलता से गिलहरी पेड़ पर चढ़ना, मछली पानी में तैरना, पनडुब्बी गोता लगाना या घूस किसी दीवार में बिल बनाकर घर में घुसना सीखता है।''3

यह हिंदी विभाग की ऐसी सच्चाई है जिससे हम किसी भी तरह से इनकार नहीं कर सकते। और यह सिर्फ एक विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग की नहीं बल्कि हिंदुस्तान के तमाम विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग की कहानी है। जिस तरह से हिंदी विभाग में चाटुकारिता, भाई-भतीजावाद और चमचागिरी व्याप्त है, उससे हम किसी भी कीमत पर एक अच्छी शिक्षा-व्यवस्था की कल्पना नहीं कर सकते। इस तरह की रिश्तेदारी और चाटुकारिता हमारे देश में लंबे समय से चली आ रही है। यूनिवर्सिटी में वही लोग फर्स्‍ट क्लास या टॉप करते हैं जो किसी-न-किसी प्रोफेसर के निकट या दूर के रिश्तेदार हों, अथवा वे प्रोफेसर के चमचे हों अथवा किसी रूलिंग पार्टी के यूनियन के सदस्य हों। स्कूल, कॉलेज अथवा विश्‍वविद्यालयों में नौकरी हासिल करने के लिए भी इनकी कृपा चाहिए होती है। उदय प्रकाश ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात रखी है कि किस तरह से हिंदी विभाग में गंदी राजनीति, तिकड़मबाजी की तूती बोलती है। ऐसे में भला हम हिंदी भाषा और साहित्य के विकास की कल्पना कैसे कर सकते हैं? किसी की चाटुकारिता कर अगर कोई विद्यार्थी पी-एच. डी. की डिग्री हासिल करता है तो उसकी थीसिस किस दर्जे की होगी, किसी प्रोफेसर के संगठन में सदस्यता लेकर बिना किसी टैलेंट के अगर किसी छात्र को स्कूल-कॉलेज या विश्‍वविद्यालय का शिक्षक बना दिया जाता है तो ऐसे शिक्षक से हम एक अच्छी शिक्षा की कल्पना कैसे कर सकते हैं? ये तो वही सिखाएंगे, जो अपने गुरु के साथ करते आए हैं। फिर से चाटुकारिता और शोषण का सिलसिला कायम होगा। और यह अनवरत रूप से चलता रहेगा। ऐसे ही लोग जब चाटुकारिता और गलत राजनीति कर शिक्षक की कुर्सी पर बैठते हैं तो किस तरह अपने कारनामों से पूरे विभाग को हिला कर रख देते हैं, इसका उदय प्रकाश ने बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है -- "डॉ. राजेंद्र तिवारी का पीरियड खत्म हुआ। उन्होंने विद्यापति पढ़ाया था। पयोधर, कुच, कटि, रति, मदन जैसे शब्दों का रस ले-लेकर मिचमिची आँखों में छलकती कामुकता और लंपटता के साथ उन्होंने ‘अर्थ' समझाया था, स्त्री उनके लिए कुच, कटि, पयोधर और त्रिबली थी। लड़कियों की गर्दनें नीची थीं, बलराम पांडे, विजय पचौरी, बिमल शुक्ल, विभूति प्रसाद मिश्रा सब एक-दूसरे को कनखियों में देखकर मुस्करा रहे थे।''4

डॉ. राजेंद्र तिवारी ने अपने बहनोई के ‘कांटेक्ट' से जो कि राज्य सभा के मेंबर थे, पद्मश्री का जुगाड़ कर लिया था। लड़कियों को घूरना, लाइब्रोरी में उनकी जासूसी करना और उनके पैरेंट्स को फोन करना उनकी आदत में शामिल था।

ऐसे लोगों के हाथों में जब साहित्य और भाषा की कमान दी जाती है तो ऐसे में हम साहित्य के विकास की बात कैसे कर सकते हैं? ऐसे लोग क्या वाकई साहित्य के उद्धार के बारे में कोई कार्य करते हैं अथवा साहित्य की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार होते हैं। सरकारी पैसे जिसका इस्तेमाल हिंदी भाषा के विकास में होना चाहिए, निजी स्वार्थ हेतु खर्च होते हैं। लाखों-करोड़ों रुपये हिंदी भाषा के विकास के लिए सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है, उन रुपयों का सिर्फ कागज-कलम में रिकॉर्ड होता है लेकिन उन पैसों के इस्तेमाल से हिंदी का कितना विकास हो पाया, हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कितने रुपये खर्च हुए, इसका कोई ठोस हिसाब नहीं मिलता।

उदय प्रकाश विश्‍वविद्यालय में स्थित हिंदी विभाग के द्वारा हमारी हिंदी भाषा और साहित्य के भविष्य की बात करते हैं। जिस विभाग में हिंदी के नाम पर लूट-खसोट हो, वहाँ से हिंदी की विश्‍व-स्तरीय पहचान कैसे बनेगी। उन्होंने बहुत ही सुंदर तरीके से हिंदी विभाग की असलियत को आम पाठकों के सामने रखा है जब ‘आचार्य त्रिभुवन नारायण मिश्र का अभिवादन' समारोह का कार्यक्रम तय हुआ। इस कार्यक्रम के माध्यम से उदय प्रकाश ने हिंदी दुनिया की असलियत हमारे सामने रख दी है। कार्यक्रम के बारे में जिक्र करते हुए उदय प्रकाश कहते हैं -- "डिपार्टमेंट में कॉमनरुम के फर्नीचर को हटाकर उसे एक ऑडिटोरियम में बदल दिया गया था। चार तख्त रखकर, सफेद चादर बिछाकर सबके ऊपर चार कुर्सियां रख दी गई थीं, ये कुर्सियां विभागाध्यक्ष एस.एन मिश्रा के कमरे से लाई गई थीं। रेक्जीन और फोम वाली गद्देदार बड़ी कुर्सियां। इनके सामने फिर एक सफेद चादर के नीचे तीन मेजें छिपीं हुई थीं, जिनके ऊपर एक बड़ा-सा गुलदस्ता रखा था। पीछे दीवार पर पीले रेशम का चमकीला बैनर टंगा था, जिस पर लाल रंग की सुंदर देवनागरी में लिखा हुआ था – ‘आचार्य त्रिभुवन नारायण मिश्र का अमिनंदन'। अभिनंदन में ‘भ' की जगह ‘म' हो गया था, लेकिन आश्चर्य था, इसे कोई नहीं देख रहा था। हिंदी के अध्यापकों को प्रूफरीडिंग तक नहीं आती।''5

क्या विडंबना है हमारे देश की और ऐसे ही लोगों के ऊपर हिंदी को विश्‍वभाषा बनाने का दारोमदार है। यह कहना गलत न होगा कि जब टैलेंट और ज्ञान की जगह पर भाई-भतीजावाद और चाटुकारिता को तवज्जो दिया जाता है तब हिंदी भाषा और साहित्य का भला कैसे हो सकता है? ऐसे लोग सिर्फ बड़ी-बड़ी पोस्ट की शान बढ़ाते हैं, बुनियादी कार्य कुछ भी नहीं होता -- "शैलेंद्र जॉर्ज ने बताया कि उन चार कुर्सियों में से एक पर कुलपति अशोक कुमार अग्निहोत्री, तीसरी पर विभागाध्यक्ष एस.एन. मिश्रा, सबसे किनारे वाली बायीं ओर की चौथी कुर्सी पर पद्मश्री डॉ. राजेंद्र तिवारी और दाहिनी ओर की कुर्सी नंबर दो पर, यानी कुलपति और विभागध्यक्ष के बीच आसीन होंगे बी.एच.यू. के भूतपूर्व प्राचार्य त्रिभुवन नारायण मिश्र। रीतिकालीन कविता के उद्भट विद्वान और बिहारी की ‘सतसई' के तथाकथित सर्वश्रेष्ठ पाठ के संकलनकर्ता, देश के समस्त विश्‍वविद्यालयों और हिंदी के समस्त अखबारों में नियुक्तियों के महाबली, तिकड़मी चाणक्य। हर इंटरव्यू कमिटी के शाश्‍वत सदस्य, सैंकड़ों हिंदी संस्थानों के सलाहकार।''6

ऐसे ही लोगों के हाथों में हिंदी की बागडोर है। यही लोग हिंदी को जन-जन तक पहुँचाने तथा विदेशों में पहुँचाने का दावा करते हैं। इन्हीं लोगों के कंधों पर हिंदी अपनी वैतरणी पार करेगी, जबकि सच्चाई कुछ और ही है, क्योंकि -- "इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर हिंदी साहित्य के ये शाश्‍वत सवर्ण चापलूस लगे हैं भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की चाटुकारिता में।''7 उदय प्रकाश ने इस कहानी के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य की वास्तविक रूपरेखा हमारे सामने रखी है। जिस तरह से हिंदी भाषा को लेकर स्कूलों, कॉलेजों और विश्‍वविद्यालयों में नोंक-झोंक है उससे तो हिंदी के पूरी दुनिया में प्रसारित होने में संकट है। बावजूद इसके -- हमारे शिक्षण-संस्थानों के अलावा ऐसी बहुत सारी जगहें हैं जहाँ से हिंदी पूरी दुनिया की, आमजन की और बाजार की भाषा बनती जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को प्रसारित करने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, अनुदान दिए जा रहे हैं, तमाम शिक्षण संस्थाओं में सेमिनार, संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है, पर्चे पढ़े जा रहे हैं लेकिन ये सारे फंड सिर्फ अपनी रोटी सेंकने के लिए है, अपने प्रमोशन पाने के तरीके हैं, इससे हिंदी भाषा के विकास में जरा-सा भी फर्क नहीं पड़ता। ऐसे सेमिनारों में हिंदी भाषा और साहित्य का विकास नहीं होता बल्कि हिंदी का पोस्टमार्टम होता है जैसे कि आचार्य त्रिभुवन नारायण मिश्र के अभिनंदन समारोह में देखने को मिलता है।

हिंदी का प्रचार-प्रसार करने का ठेका सिर्फ हिंदी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने वाले लोगों के पास नहीं है। हिंदी का प्रचार-प्रसार करने का योगदान तो आमजनों को भी जाता है जो हिंदी को अपनी रोजी-रोटी का माध्यम न बनाकर अपने संवाद का माध्यम बनाते हैं। हिंदी के व्याकरण की विद्वता से दूर जो सही मायने में हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं, चाहे घर हो या बाहर, वही लोग दरअसल हिंदी भाषा को विश्‍व- स्तरीय पहचान देते हैं। और इन्हीं लोगों की वजह से आज अखबार, टेलीविजन, फिल्म, सोशल साइट्स से लेकर बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय बाजार की भाषा हिंदी बनती जा रही है। अगर इसी तरह से हिंदी का नि:स्वार्थ भाव से सभी लोगों द्वारा प्रयोग किया जाता रहा, तो वह दिन दूर नहीं है जब पूरी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा ‘हिंदी' बनेगी।


संदर्भ सूची

  1. प्रकाश, उदय, ‘पीली छतरी वाली लड़की’, संस्‍करण : 2014, वाणी प्रकाशन, नई दिल्‍ली, पृष्ठ - 26
  2. वही, पृष्ठ - 47-48
  3. वही, पृष्ठ - 53
  4. वही, पृष्ठ - 97
  5. वही, पृष्ठ - 105-106
  6. वही, पृष्ठ - 106
  7. वही, पृष्ठ - 124

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