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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

रोहिंग्या प्रवासीय समस्या का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विवेचनात्मक विश्लेषण

 रोहिंग्या प्रवासीय समस्या का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विवेचनात्मक विश्लेषण

(म्यांमार के विशेष संदर्भ में)

 

दिनेश कुमार

शोध-अध्येता (पीएच०डी)

पाश्चात्य इतिहास विभाग

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

मो. 8574963266

Email: dkglko98@gmail.com

 


शोध-सार:

देश की सीमाओं के भीतर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाना कहीं से अवैध या गैर-कानूनी नहीं माना जाता है। देश की अर्थव्यवस्था के विकास में भी इसका बेहद योगदान है, जिसे शायद ही कभी आँका जाता है। बस जरूरी यह है जिस भी देश में रह रहे है वहाँ की शांति एवं सद्भाव के साथ खिलवाड़ न किया जाय। इतिहास गवाह रहा है कि विस्थापन की त्रासदी से धरती के बहुत कम ही इलाके बचे हैं। दुनियाभर में प्रवासन और पलायन का इतिहास बहुत पुराना है। रोजगार हासिल करने और बेहतर जीवन की उम्मीदों के चलते पूरी दुनिया में देश की सीमा से बाहर और सीमा के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर रहने और वहाँ बस जाने की परंपरा बहुत पुरानी है। अस्सी और नब्बे के दशक में प्रतिभा संपन्न लोगों का देश से पलायन करने पर गहरी चिंता जतायी गयी थी। हालांकि, नयी सहस्राब्दी में हालात कुछ बदले और पलायन एक चिंता के विषय के तौर पर बदल कर ‘अवसर’ के रूप में सामने आया। कुछ अपवाद को छोड़ दें, तो प्रवासी होने का दंश अक्सर किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ता है। वर्तमान समय में रोहिंग्या मुस्लिमों की प्रवासन की समस्या कुछ अलग ही प्रकार की वैश्विक समस्या बन कर उभरी है। इस शोध-पत्र के माध्यम से रोहिंग्या समुदाय के प्रवासन के कारणों, सम्बंधित परिणामों का विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है। सम्बंधित समस्या के सुधार के उपाय भी सुझाये गए हैं।  

मुख्य शब्द:

रोहिंग्या, प्रवासन, वैश्विक, शरणार्थी, सीमावर्ती, बहुसंख्यक , बौद्ध।

उद्देश्य:

          प्रस्तुत शोध-पत्र के माध्यम से रोहिंग्या मुस्लिमों का अध्ययन किया जायेगा। रोहिंग्या प्रवासीय समस्या के साथ ही सम्भावित उपायों को भी सुझाने का प्रयास किया गया है।

शोध-प्रविधि: 

प्रस्तुत शोध-पत्र व्याख्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक प्रकार का है। तथ्यों के लिए प्रकाशित शोध ग्रंथों, सम्बंधित पुस्तकों के साथ ही प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है। इसमें तथ्यों की विवेचना करते हुए उनके वैचारिक विश्लेषण को व्याख्यायित करने का प्रयास किया गया है।  तथ्यों के लिए समसामयिक दैनिक समाचार पत्रों का भी सहारा लिया गया है।

 


भूमिका:

म्यांमार की 33 लाख आबादी में से रखाइन प्रांत में रोहिंग्याओं की आबादी करीब 10 लाख से अधिक मानी जाती है। आम तौर पर मान्यता है कि यह आनुवांशिक रूप से मिश्र जाति के लोग हैं। इनकी वंशावली बाहरी देशों (अरबी, तुर्की, फारसी, पठान, मुगल) और स्थानीय बंगाली व रखाइन प्रांत से जोड़ी जाती है। यहां तक कि अगर भाषायी आधार पर देखा जाए, तो यह दक्षिण पूर्वी बंगाल में बोली जाने वाली बोली चटगवाईं भी बोलते हैं। वर्तमान में रोहिंग्या सिर्फ म्यांमार में ही नहीं बसे हैं बल्कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, बंग्लादेश, मलेशिया और थाइलैण्ड में भी रह रहे हैं।

            म्यांमार बौद्ध संस्कृति वाला देश है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया में सबसे प्रताड़ित समुदायों में से रोहिंग्या समुदाय को माना है। रोहिंग्या जो कि मुस्लिम बाहुल्य स्थानीय समुदाय का करीब दस लाख आबादी म्यांमार के रखाइन प्रांत में रहती है, जिसे वर्तमान में अराकान नाम से जाना जाता है। म्यांमार की जनगणना के अनुसार यहाँ 90% बौद्ध, 6% ईसाई और 4% रोहिंग्या के अलावा अन्य मुस्लिम रहते है।1 बौद्ध नीतियों एवं संस्कृति का पालन करने वाले म्यांमार का दावा है कि रोहिंग्या मुस्लिमों की वजह से बौद्ध संस्कृति एवं यहाँ का समाज संकटमय स्थिति में है। रोहिंग्या समुदाय के अधिकतर लोगों की प्रवृत्ति उग्रवादी एवं हिंसात्मक है। इसका कारण है म्यांमार के पड़ोसी देश अधिकतर मुस्लिम बाहुल्य हैं जैसे- बांग्लादेश, मलेशिया, इण्डोनेशिया आदि। इन देशों के माध्यम से इन्हें किसी कार्य को करने के लिए मानो एक प्रकार का इन्हें पुनर्बलन सा मिलता है। और किसी प्रकार की हिंसात्मक कार्य को करने से डरते भी नही हैं बिना उसका परिणाम सोंचे। इसी कारण रोहिंग्या म्यांमार का इस्लामीकरण करना चाहते हैं। म्यांमार सरकार इनके लिए प्रयुक्त किये जाने वाले शब्द रोहिंग्या पर आपत्ति जताती रहती है क्योंकि उसका मानना है कि यह बंग्लादेश के मूल निवासी हैं, जो ब्रिटिश काल एवं 1971 के बंग्लादेश युद्ध के दौरान म्यांमार में अवैध तरीके से घुस आये हैं। म्यांमार में वर्तमान समय में लगभग 135 स्थानीय समुदाय हैं जिनमें रोहिंग्या समुदय भी एक समुदाय है।

अंग्रेजों ने 1824 से म्यांमार पर शासन किया है। उस समय म्यांमार को बर्मा नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश सरकार ने अपने सारे उपनिवेशों की तरह यहाँ के भी प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना प्रारम्भ किया। यहाँ चावल एवं गन्ने की खेती अच्छी होती थी, जिसको उगाने के लिए कामगार मजदूरों की आवश्यकता पड़ती थी। चावल की खेती से मुनाफा कमाने के लिए दूसरे देशों से मजदूरों को यहाँ लाया गया। 17 वीं शताब्दी में रोहिंग्या भी इसी नीति के परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप के हिस्से (अब बंग्लादेश) से म्यांमार को भेजे गए थे। इनका उद्देश्य म्यांमार जाकर मजदूरी प्राप्त कर दो जून की  रोटी एवं कपड़ा की व्यवस्था करना था। 1871 की जनगणना का आकलन करने पर पता चला है कि इनकी आबादी में तीन गुन की वृद्धि हो गई है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय रोहिंग्याओं ने ब्रिटेन का साथ दिया जबकि शेष बर्मा के राष्ट्रवादी लोगों ने जापान का साथ दिया था। इसी के परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने इन्हें मदद देने के बदले में अलग से जमीन देने का वायदा किया था।2 युद्ध के बाद अंग्रेजों ने रोहिंग्या समुदाय के लोगों को बड़े-बड़े ओहदे दिये गए लेकिन अलग से जमीन देकर राज्य बनाने का वादा पूरा नहीं किया गया। 1948 में जब अंग्रेजों ने बर्मा को आजाद किया तो वहाँ के स्थानीय जातीय समुदायों में आपसी हितों के टकाराओं को लेकर जातीय हिंसा उत्पन्न हुई जिनमें रोहिंग्या भी थे।

            1948 में जब देश को आजादी मिली, तब बनाए गए संविधान में उन्हें नागरिक का दर्जा दिया गया था। 1962 में यहाँ सैन्य शासन लागू हो गया। सैन्य अधिकारी जनरल नी विन ने सत्ता अपने हाँथ में ले ली तभी से इनके हालात गम्भीर हो गए। उधर 1971 में बांग्लादेश की आजादी की जंग प्रारम्भ हो गई तब लाखों बांग्लादेशी म्यांमार भागने पर मजबूर हुए, जिनमें कुछ घुसपैठियों के रूप में भारत की ओर भी रूख किया जो आज भी भारत में रह रहे हैं। घुसपैठ की समस्या से त्रस्त आकर म्यांमार सरकार ने नागा मिन नामक अभियान अवैध रूप से रह रहे शरणार्थियों को बाहर करने के उद्देश्य से चलाया था। रोहिंग्या समुदाय के लोग बंग्लादेशी शरणार्थियों से काफी मिलते जुलते थे जिसके कारण इन पर भी उपद्रव हुए। परिणामस्वरूप वह बांग्लादेश भागने पर मजबूर हुए। बंग्लादेश सरकार ने अस्थाई कैम्प लगाकर सन्युक्त राष्ट्र संघ से इनकी सहायता के लिए मदद की गुहार की थी।

            इसके परिणामस्वरूप जुलाई 1978 में बंग्लादेश और म्यांमार के मध्य एक समझौता हुआ जिसमे लगभग 2 लाख शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजना तय हुआ। यह शरणार्थी वापस जाना नहीं चाहते थे इनके विरोध करने के बावजूद भी बंग्लादेशी सरकार के द्वारा इन्हें म्यांमार भेजा गया। म्यांमार की सेना तथा इन शरणार्थियों के मध्य आपस में तनातनी बनी रहती है। जुलाई 1991 में म्यांमार सरकार ने रोहिंग्याओं के उपद्रव किये जाने पर म्यांमार की शांति भंग होने पर इनके खिलाफ अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए ‘आपरेशन प्यी (साफ और सुंदर राष्ट्र)’ प्रारम्भ किया। इस अभियान के माध्यम से यह जांच-पड़ताल करना था कि वह यहाँ के नागरिक हैं या अवैध अप्रवासी हैं। इस अभियान के चलते लगभग 2.5 लाख रोहिंग्या शरणार्थी बंग्लादेश भागे। यहीं से मौजूदा रोहिंग्या शरणार्थी संकट की शुरुआत हुई जिसके परिणामस्वरूप लखों की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी बेघर हो गए।           

            सन् 1977 में म्यांमार सेना ने नागरिकों का पंजीकरण अभियान चलाया जिसमें रोहिंग्या को अवैध नागरिक माना गया। म्यांमार का नागरिक कानून 1982 में लागू हुआ। इस कानून के माध्यम से सिर्फ वही लोग म्यांमार के नागरिक माने गए जो 1823 में ब्रिटिश सरकार के आने से पूर्व यहाँ के किसी न किसी स्थानीय जाति के सदस्य थे।

रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या का समाधान होना चाहिए। यह बताने से पहले रोहिंग्या समस्या के पैदा होने के कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है। 2012 में एक घटना हुई जो बाद में दिन पर दिन तूल पकड़ती गई। कहा जाता है कि एक बौद्ध महिला का इन्होंने बलात्कार किया जिसके पश्चात उसकी हत्या कर दी गई। म्यांमार के लिए जो बौद्ध होने का दावा करता है, जिसके लिए यह घटना बहुत ही शर्मनाक थी। जिसकी प्रतिक्रिया में स्थानीय बौद्ध चकमा और रोहिंग्या मुसलमानों में हिंसक घटनाएं हुई थी। रोहिंग्या मुस्लिमों के एक वर्ग ने अपने आप को अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) के रूप में संगठित कर लिया है। इस संगठन को बाहरी इस्लामिक देशों से गुप्त रूप से आर्थिक सहायता भी दी जाती है, जिसका प्रयोग वह हिंसात्मक घटनाओं को मात देने के लिए औजारों की तस्करी में करते हैं। यह बात यही नहीं रुकती इन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए इसे आतंकवादी संगठन लस्कर-ए-तैय्यबा से जोड़ लिया है।

हमारे अनुसार रोहिंग्या मुस्लिमों की समस्या दूसरों की वजह से नहीं बल्कि उन्होंने स्वयं ही समस्या का आवाहन किया है, जिसका परिणाम सभी रोहिंग्या को भुगतना पड़ रहा है। बेचारी निर्दोष महिलाएं और अबोध बालकों का क्या दोष था? रोहिंग्याओं के प्रति की गई कार्यवाही से आंग सान सू की का वैश्विक स्तर पर विरोध किया गया है यहाँ तक कि कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा उनको दिये गए नोबल पुरस्कार को भी वापस लेने की बात कही गई है। इनका अह आरोप था कि रोहिंग्याओं पर सेना द्वारा की जा रही ज्यादती पर आंग सान सू की कोई विरोध नही कर रही हैं और रोहिंग्याओं को किसी प्रकार कि सुरक्षा सुविधा भी उपलब्ध नहीं करा पा रहीं हैं ।

हम म्यांमार से रोहिंग्या के अचानक इतनी बड़ी संख्या में पलायन क्यों हो रहा है। इनके पलायन के कारणों में हमारा विचार है कि म्यांमार चकमा बौद्ध बाहुल्य देश है, जिसका मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूँ । बौद्ध शांति एवं अहिंसा में विश्वास करते हैं। इनकी संस्कृति भी रोहिंग्या संस्कृति से बिल्कुल भिन्न है, जो इसमें बाधक है। म्यांमार पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है जहाँ बौद्धिस्ट और अन्य प्रकृति प्रेमी आते रहते हैं, जिसके लिए यह बाधक हैं। इसके अलावा इन्होंने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआई और विभिन्न आतंकी संगठनों में भी इन्होंने अपनी पैठ बना ली है, जो म्यांमार के लिए ही नहीं पड़ोसी देशों के लिए भी खतरा बना हुआ है।                                                                                             

परिणाम एवं विवेचना: 

रोहिंग्या मुसलमानों का मामला जून में नृशंस जनसंहार और लूटपाट की एक कार्यवाही के बाद दुनिया में ध्यान का केन्द्र बना किन्तु यह कोई अस्थाई विषय नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से विश्व के सबसे अत्याचारग्रस्त अल्पसंख्यक बताए जाने वाले रोहिग्या मुसलमानों के अतिरिक्त शायद दुनिया का कोई भी अल्पसंख्यक इस विषम स्थिति का शिकार नहीं हुआ।3 जिस देश में वह शताब्दियों से आबाद हैं वह उन्हें अपना नागरिक स्वीकार करने और मूलभूत अधिकार देने को तैयार नहीं है बल्कि व्यवहारिक रूप से जातीय सफाए के प्रयास में हैं। म्यांमार के राष्ट्रपति थीन सेन का आदेश कि हम अपनी ही जाति के लोगों की ज़िम्मेदारी ले सकते हैं किन्तु अपने देश में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रविष्ट होने वाले रोहिग्या मुसलमानों की ज़िम्मेदारी स्वीकार करना हमारे लिए असंभव है जो हमारी जाति से संबंध नहीं रखते। यह बयान उन्होंने कुछ दिन पूर्व संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्ली के उस बयान के उत्तर में दिया जो उन्होंने रख़ाइन में बहुसंख्यक आबादी के हाथों जनसंहार और लूटपाट का निशाना बनने वाले रोहिग्या मुसलमानों की स्थिति की समीक्षा लेने के बाद किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में मानवाधिकार आयुक्त की आशंकाओं के उत्तर में राष्ट्रपति थीन सेन ने आठ लाख मुसलमानों के विषय का “समाधान” यह पेश किया कि यदि कोई तीसरा देश उन्हें स्वीकार करे तो मैं उन्हें वहां भेज दूंगा, यह है वह चीज़ जो हमारी नज़र में विषय का समाधान है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या लाखों रोहिग्या मुसलमान राष्ट्रपति थीन सेन के क्षेत्र में रातों रात प्रविष्ट हो गये हैं जिन्हें देश से निकाल बाहर करना ही उनके अनुसार विषय का एकमात्र समाधान है या इन लोगों का कोई इतिहास या अतीत थी है? उनका अतीत क्या है और उनके पूर्वज कौन थे और अराकान में यह लोग कब से आबाद हैं। इन प्रश्नों का प्रमाणित उत्तर करना, विषय को समझने के लिए अतिआवश्यक है। रोहिग्या शब्द कहाँ से निकला? इस बारे में रोहिग्या इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह शब्द अरबी के शब्द ‘रहमा’ अर्थात ‘दया’ से लिया गया है और आठवीं शताब्दी ईसवी में जो अरब मुसलमान इस क्षेत्र में आये थे, उन्हें यह नाम दिया गया था जो बाद में स्थानीय प्रभाव के कारण रोहिग्या बन गया किन्तु दूसरे इतिहासकारों का मानना है कि इसका स्रोत अफ़ग़ानिस्तान का रूहा स्थान है और उनका कहना है कि अरब मुसलमानों की पीढ़ियां अराकान के तटवर्ती क्षेत्र में आबाद हैं जबकि रोहिग्या अफ़ग़ानिस्तान के रूहा क्षेत्र से आने वाली मुसलमान धर्म के है। इसके मुक़ाबले में बर्मी इतिहासकारों का दावा है कि रोहिग्या शब्द बीसवीं शताब्दी के मध्य अर्थात 1950 के दशक से पहले कभी प्रयोग नहीं हुआ और इसका उद्देश्य वह बंगाली मुसलमान हैं, जो अपना घर बार छोड़कर अराकान में आबाद हुए। राष्ट्रपति थीन सेन और उनके समर्थक इस दावे को आधार बनाकर रोहिग्या मुसलमानों को नागरिक अधिकार देने से इन्कार कर रहे हैं किन्तु यह दावा सही नहीं है कि रोहिग्या शब्द का प्रयोग अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रयोग होने का ठोस प्रमाण मौजूद हैं। बर्मा में अरब मुसलमानों के प्रविष्ट होने और रहने पर सभी एकमत हैं। उनकी बस्तियां अराकीन के मध्यवर्ती क्षेत्रों में हैं, जबकि रोहिग्या मुसलमानों की अधिकांश आबादी बांग्लादेश के चटगांव डिविजन से मिली अराकान के सीमावर्ती क्षेत्र मायो में आबाद है। अराकान में बंगाली मुसलमानों के बसने के प्रथम प्रमाण पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के चौथे दशक से मिलते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा पर जापान के क़ब्ज़े के बाद आराकान में बौद्धमत के अनुयाई रख़ाइन और रोहिंग्या मुसलमानों के मध्य रक्तरंजित झड़पें हुईं। रख़ाइन की जनता जापानियों की सहायता कर रही थी और रोहिंग्या अंग्रेज़ों के समर्थक थे इसीलिए जापान ने भी रोहिंग्या मुसलमानों पर जम कर अत्याचार किया। 4 जनवरी 1948 में बर्मा स्वतंत्र हो गया।4 द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1948 में कुछ रोहिंग्या मुसलमानों ने अराकान को एक मुस्लिम देश बनाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आरंभ किया। वर्ष 1962 में जनरल नी विंग की सैन्य क्रांति तक यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। जनरल नी विंग की सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर सैन्य कार्यवाही की जिसके कारण कई लाख मुसलमानों ने वर्तमान बांग्लादेश में शरण ली। उनमें से बहुत से लोगों ने बाद में कराची का रूख़ किया और उन लोगों ने पाकिस्तान की नागरिकता लेकर पाकिस्तान को अपना देश मान लिया। मलेशिया में भी पच्चीस से तीस हज़ार रोहिंग्या मुसलमान आबाद हैं। बर्मा के लोगों ने लंबे संघर्ष के बाद तानाशाह से मुक्ति प्राप्त कर ली है और देश में लोकतंत्र की बेल पड़ गयी है। वर्ष 2012 के चुनाव में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समर्थक आन सांग सू की की पार्टी की सफलता के बावजूद रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिक के दरवाज़े बंद हैं और उन पर निरंतर अत्याचार जारी हैं, जो लोकतंत्र के बारे में सू के बयानों से पूर्ण रूप से विरोधाभास रखता है। अब भी विश्व जनमत के मन में यह प्रश्न उठता है कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के बाद क्या रोहिंग्या मुसलमानों को उनका अधिकार मिल पायेगा?

निष्कर्ष:

          दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा शरणार्थियों ने भारत में शरण ली हुई है। इसको लेकर सन्युक्त राष्ट्र ने भारत की प्रशसा भी कर चुका है।  इसके बावजूद यहाँ कोई ठोस शरणार्थी कानून नही हैं। मौजूदा समय में रोहिंग्या दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा समुदाय है, जिसके पास किसी देश की नागरिकता नहीं है। नागरिकता के बिना इन्हें चिकित्सा, रोजगार, शिक्षा और स्थाई आवास जैसे मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है। रोहिंग्या लोगों में अशिक्षा 80% है। उन्हें अपनी मर्जी से पूजा-अर्चना अपने त्योहार , शादी यहाँ तक कि स्वच्छंद तरीके से घूम भी नहीं सकते हैं। यह किसी भी प्रकार की सम्पत्ति भी नहीं खरीद सकते है। यह एक वर्तमान समय में बहुत बड़ा मानवीय कलंक ही कहा जा सकता है। इसी अभाव के कारण इनका सरकारी तंत्र के प्रति रोष व्याप्त है, जो इन्हें कहीं न कहीं अमानवीय कार्यों कि ओर जबरन धकेलती है, जो गलत है। सम्बंधित देश को इनके लिए अलग से विशेष कानून बनाकर इनके उत्थान के लिए प्रयत्न करना चाहिए ताकि यह भी आम व्यक्तियों की तरह अपना जीवन जी सकें। कहावत कही जाती है कि ताली एक तरफ से नहीं बजती है, जो कि सत्य है। म्यांमार में सेना ने इन पर जब अत्याचार किया तो जवाबी कर्यवाही इनके द्वारा कि गई, जिसका परिणाम ज्यादातर अबोध बालकों एवं महिलाओं हो बनना पड़ा। रोहिंग्या अपनी जान जोखिम में डालकर एक देश से दूसरे देश को निरंतर पलायन कर रहे हैं।5 रोहिंग्याओं को भी अमानवीय कृत्य त्यागने होंगे और अगर अपने अधिकारों की माँग कर रहे हैं, तो इनको संवैधानिक तरीकों को अपनाना होगा। जहाँ भी यह रहते हैं, वहाँ की संस्कृति एवं सभ्यता तथा शांति के साथ सामंजस्य बनाकर रहें। सुधार धीरे-धीरे ही लाया जा सकता है। 


संदर्भ:

  1. इण्डिया टुडे पत्रिका, अक्टूबर 2017, पृ० 40-44.
  2. दैनिक जागरण, लखनऊ नगर संस्करण, मुद्दा, 24 सितम्बर 2017, पृ० 15.
  3. वही
  4. https://hi.wikipedia.org/म्यांमार.
  5. राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ नगर संस्करण, 14 नवंबर 2017, पृ० 15.