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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

मानवाधिकार और भूमंडलीकरण

मानवाधिकार और भूमंडलीकरण

                                                                                                      प्रो. रणजीत कुमार सिन्हा

 


भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में राष्ट्रीय राज्य की प्रासंगिकता पर सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं तथा आर्थिक प्रबंधन से उनको परे हटाकर तमाम चीजो को बाज़ार के हवाले किया जा रहा है तो दूसरी ओरउसे धर्म से अधिकाधिक जोड़ने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में राजसत्ता के फासिस्टीकरण की वकालत करते हुए ब्रज बिहारी पांडे लिखते हैं – भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ पूँजीवाद अपने संकट के चलते मेहनतकश जनसमुदाय पर शोषण के नये-नये रूपों को थोप रहा हैं। उनके जनवादी अधिकारों पर और भी गहरे अंकुश लगाकर उनके नागरिक आजादी छीन लेने की कोशिश कर रहा है और इसलिए उसे राजसत्ता के फासिस्टीकरण की ज्यादा जरुरत महसूस हो रही है।’’1

कॉफमैंन और यंग (1996) ,हेल्ट(2000) जैसे विद्वानों की भूमंडलीकरण एवं मानवाधिकार के मध्य संबंधों में राय है कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में सम्मिलित अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने राष्ट्र –राज्य की निर्णय –क्षमता को कुंद कर दिया है। इसके अतिरिक्त भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में आरोपित व प्रोत्साहित पूँजीवाद विकास के मॉडल ने केवल आर्थिक असमानता में वृद्धि की है| बल्कि शोषित एवं वंचित वर्गो के समझ जीवन-यापन का भी संकट उत्पन्न कर दिया है। उसका मिला जुला प्रभाव मानव अधिकारों के हनन के रूप में देखा जा सकता है। विडंबना यह है कि भूमंडलीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर मानव अधिकार कानून सीधे लागू नहीं होते। ऐसे में मानव अधिकारों का विश्लेषण भूमंडलीकरण के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य हो जाता है।

जीने का अधिकार मानवाधिकार है। भूमंडलीकरण ने आर्थिक विषमता को इतना अधिक बढाया है कि अमीर तो और अधिक अमीर हो गये जबकी  गरीब इतने गरीब हो गये की वे दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं। गावों में भुखमरी ,गरीबी ,बेकारी इतनी अधिक हो गयी है की लोग अपनी जमीन से उखड़ने को विवश हो गये हैं| अलका सरावगी का उपन्यास ‘कलिकथा: वाया बाइपास’ का अमोलक कहता है – “कलकत्ते की सड़को पर भीख माँगने वाले गावं के लोग किस तरह बढ़ रहे हैं ? बंगाल के गांवों के लोगों के पास खाने को कुछ नहीं है। अपने सारे बर्तन –भांडे बेचकर ये लोग चावल खरीदकर खा चुके हैं और भूख के मारे गाँव छोड़कर कलकत्ता आ रहे हैं|”2

छेदीलाल गुप्त का ‘शहर की ओर’ उपन्यास का श्रीपात लोहार अत्यधिक परिश्रम करने के बावजूद दो रोटी का जुगाड़ नहीं का पाता है। वह कहता है “ कशक्कत करते –करते देह मसक गई है। दो टुकड़े भी नहीं जुटते हैं।”3

इस भूमंडलीय अर्थ वयवस्था में देश के गरीबो में भुखमरी की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है की वे कुत्तो सी जिन्दगी जीने को बाध्य हो गये हैं। अलका सरावगी अपने ‘एक ब्रेक के बाद’ उपन्यास में के .वी के माध्यम से कहते हैं –“ क्या आप सचमुच सोचते हैं कि हमारे देश की छब्बीस प्रतिशत यानि की तीस करोड़ लोग। इतने सारे लोगों की जिंदगी कैसे बनेगी। जो सडको पर कुत्तों जैसी ही जिन्दगी जी रहे हैं।”4

खेती करना किसानों का अधिकार है। किन्तु सरकार उद्द्योग पतियों के लिए स्पेशल इकोनॉमिक जोन(सेज) बनाकर किसानों को उसकी  धरती से उजाड़ रही है। इस हृदय –हीन व्यवस्था पर अलका सरावगी अपने ‘एक बेक के बाद’ उपन्यास के माध्यम से कहती है –“ सोचो कि एक औरत और एक आदमी अपनी जमीन इसलिए सरकार या कम्पनी को देने से इंकार करे कि उनके दो साल के मरे हुए बच्चे की देह पिछवाड़े के खेत में गड़ी है और वहाँ लगाया हुआ आम का पेड़ अब दो साल बड़ा हो गया है ,तो इसमें गलत क्या है ? कम्पनी को खदानों से अल्युमिनियम निकाल कर करोड़ो अरबो बनाने हैं ,इससे उन्हें भय क्या ? उनके बाप –दादा सौ साल से उस जमीन की हवा –पानी पर पले थे , उसे उखड़ने का हक़ वे किसी को क्यों दे ?”5

रवीन्द्र वर्मा का ‘दस बरस का भंकट’ उपन्यास में भी किसान –मजदूरों के मानवाधिकारों का हनन वर्णित है। इसमें किसान अपनी आर्थिक विपन्नता के कारण कीटनाशक पीकर आत्महत्या करते हैं| ‘दस बरस का भंवर’ में भूमंडलीकरण गाँव की बद्तर हालात का मार्मिक वर्णन इस उपन्यास में देखने को मिलता है। यहाँ किसान निरंतर आत्महत्या कर रहे हैं। कारखानों से निकले गये मजदूर भी जिन्दगी से ही निकल गये है। पूरा देश आज अमेरिकीकरण की प्रक्रिया में मानो शिजोफ्रेनिया का शिकार हो रहा था। वह ऐसा समय जिसमे देश के एक तिहाई लोग भूखे थे और एक चौथाई पिज्जा खा रहे थे। बाकी लोग पिज्ज़ा की प्रदर्शन –खिड़की में आँखे गडाए खड़े थे।

भूमंडलीकरण ने मानवाधिकारो हनन तो किया ही है ,उसने जिस रूप में हमारे सांस्कृतिक परिद्श्य को बदला है। उससे हमारे जीवन मूल्यों में भारी बदलाव आया है। मानवाधिकारों के हनन की जीवन –मूल्यों की हास की चिंता साहित्यकारों को हमेशा रही है। कमलेश्वर अपने ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में कहते हैं कि प्रत्येक युग में साहित्यकार कलमकार ही मानवीय मूल्यों की चिंता करता है।इसलिए प्रत्येक अत्याचार ,अनाचार ,शोषण ,नैतिक मूल्यों के क्षरण के विरुद्ध अपनी लेखनी को हथियार बनाकर वह उठ खड़ा होता है। इस उपन्यास का एक पात्र कहता है –“मत भूलो महमूद किसी भी दौर के अत्याचारों अनाचारों के खिलाफ खड़ा होने वाला कोई न कोई अदीब हमेशा एक नैतिक अदालत बनकर मौजूद रहता है ’’|

भूमंडलीकरण ने केवल वस्तुओं का व्यापार नहीं किया है ,बल्कि युद्धों का भी व्यापार नहीं किया है ,बल्कि युद्दो का भी व्यापार किया है।दो देशो के विरुद्ध तनाव उत्पन्न करना ,फिर उन्हें अपने हथियार बेचकर मुनाफा कमाना भूमंडलीकरण की चाल है। इस चाल के जाल में बेकसूर लोगों की बड़ी संख्या में मौत हो जाती है। बहुत सरे लोग अपंग हो जाते हैं ,बहुत लोग बेघर हो जाते हैं ,लेकिन बाज़ारवादियों को तो अपनर मुनाफे से मतलब है। कमलेश्वर कितने पाकिस्तान उपन्यास में कहते हैं-“पूरी दुनिया में मानवाधिकारों का जो हनन हो रहा है। हिंसा,हत्या,कष्ट,उत्पीड़न,यातना,बेइमानी ,बदकारी के सैलाब उमड़ रहे हैं .....लेकिन फिर भी कुछ ऐसा भी है जो सुभ है।’’6

इस सुभ को बचाने की चिंता केवल कमलेश्वर की नहीं है “किसी भी साहित्यकार की चिंता है। कदाचित सारी शब्द साधना मानव के सुभ –श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को बचाने की ही चिंता है।’’7

भारतीय साहित्य का धरोहर है मानवतावाद विश्व पटल पर भारतीय साहित्य (हिंदी साहित्य) अपनी मानवीय दृष्टि के चलते ग्रहण की गयी है। पर भूमंडली बाज़ार में मानवाधिकारो का हनन ,साम्प्रदायिकता ,लूटा भ्रष्टाचार ,स्त्री शोषण ,बाल मजदूर,किसानों की आत्महत्या ,बहुसंख्यक मानव का कुपोषण का शिकार होना ,चंद लोगों के हाथ में देश की 80% धन का होना ,मानवाधिकारों क मजाक बनता नज़र आ रहा है। आज वर्तमान समय में अस्मिता के चक्कर में हम मानवतावाद को हाशिए पर लाकर खड़े कर दिए हैं।

संदर्भ :-

  • ब्रजबिहारी पांडे-इतिहास बोध अप्रैल 2010 ,पृष्ठ -114
  • अलका सरावगी ,कलिकथा :वाया बाईपास,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली -2011 ,पृष्ठ -142-143
  • छेदीलाल गुप्त ,शहर की ओर ,इलाहाबाद कृतिका 2012,पृष्ठ-12
  • अलका सरावगी ,एक ब्रेक के बाद ,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली 2010 ,पृष्ठ 51
  • अलका सरावगी ,एक ब्रेक के बाद ,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली 2010 ,पृष्ठ 165
  • कमलेश्वर ,कितने पाकिस्तान ,राजपाल एंड सन्स,नई दिल्ली 2000 ,पृष्ठ -179
  • पुष्पपाल सिंह ,भूमंलीकरण और हिंदी उपन्यास ,राधा कृष्ण प्रकाशन ,नई दिल्ली ,पृष्ठ-266

 

 

                                      


रणजीत कुमार सिन्हा

 प्राध्यापक हिंदी विभाग ,खड़गपुर कॉलेज

इन्दा ,खड़गपुर ,पिन-721301 ,पश्चिम मिदनापुर

मोबाइल न-9434153501