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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

मौत के आंकड़े

मौत के आंकड़े

जयति जैन "नूतन"

 


मौत के आंकड़े इतने भयानक है कि हर साल लाखों लोग काल के मुंह में समा रहे हैं, कभी किसी दुर्घटना में तो कभी दहेज़ , आत्महत्या  तो कभी भूख, गरीबी के चलते और यदि छोटी सी भी बिमारी हो  जाए और इलाज़ ना मिल सके तो समझिये और मौत के आंकड़ों में इज़ाफ़ा! यह आकड़े रिपोर्ट के अनुसार तैयार हुए हैं, हर साल रिसर्च चलती रहती है और नए आकड़े सामने आते है, आज आपके सामने वह गंभीर मुद्दे हैं या यूँ कहें वह मौत के आंकड़े हैं, जो बताते हैं कि पूर्ण रूप से संपन्न होने में भारत को कई साल लग जायेगे, शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मे शिशुओं मे से एक वर्ष या इससे कम उम्र मे मर गयेशिशुओं की संख्या है, 2004..05 में देश में मातृ मृत्यु दर: एमएमआर: 254 प्रतिएक लाख थी जो 2011...13 में घटकर 167 हो गयी।

 


1) आदिवासी बच्चों में कुपोषण

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन यहां कुपोषित बच्चों की तादाद अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने बाने के लिए किसी खतरे की घंटी से कमनहीं है. यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार देश के साढ़े पांच करोड़ बच्चे यानी पांच साल से कम उम्र के लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं. महाराष्ट्र में कुपोषण से हुई 600 आदिवासी बच्चोंकी मौत की खबर पर मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने चिंता जतायी है.

पिछले कुई महीनों में ही जिले के 254 बच्चे कुपोषण के शिकार बने और इसी दौरान कुपोषण 195 गर्भस्थ शिशुओं की मौत का कारण बना. ये आंकड़े सरकार ने ही जारी किए हैंजबकि स्वयंसेवी संगठनों का दावा है कि सिर्फ मोखाड़ा तालुका में कुपोषण से 600 से ज्यादा बच्चों की जान गई है. मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस मानते हैं कि पालघर जिले मेंजव्हार और मोखाड़ा कुपोषण से बुरी तरह प्रभावित है. यहां 30 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं

2) इंसेफ्लाइटिस

इंसेफ्लाइटिस की वजह से तीन दशकों में पूर्वी उत्तर प्रदेश में 50 हज़ार बच्चे मर चुके हैं. बच्चे विकलांग हो गए और यह सिलसिला लगातार जारी है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया एवं संत कबीर नगर समेत आठ ज़िलों में जापानी इंसेफ्लाइटिस महामारी की तरह फैल गया है, जिसका शिकार अधिकतरबच्चे हो रहे हैं. बिहार के छपरा, सीवान और गोपालगंज जैसे सीमावर्ती ज़िलों में भी यह रोग फैला हुआ है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में हालत अत्यंत गंभीर है. केंद्र और राज्य सरकार,दोनों ही यह मानने को तैयार नहीं हैं कि यह बीमारी जापानी इंसेफ्लाइटिस है. बच्चे अंधाधुंध मर रहे हैं, पर बीमारी को नकारने की सरकारी कोशिशें जारी हैं. आंकड़े दबाए जा रहेहैं और मरने वालों की संख्या ग़लत बताई जा रही है. पिछले तीन दशकों में केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही 50 हज़ार बच्चे मर चुके हैं. इससे अधिक बच्चे विकलांग हो गए, नस्लेंख़राब हो रही हैं और यह घातक सिलसिला लगातार जारी है. हर रोज़ औसतन सौ बच्चे मर रहे हैं, लेकिन सरकार कहती है कि इस साल अब तक 219 बच्चे ही मरे हैं. आपआंकड़े देखें तो हैरत में पड़ जाएंगे, 2005 में अकेले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 15 सौ बच्चे मरे थे. आ़खिर सरकार बच्चों की बेतहाशा हो रही मौतों को स्वीकारक्यों नहीं करती और इसके बरक्स फर्ज़ी आंकड़े क्यों गढ़ रही है? सरकारी आंकड़े कहते हैं कि 20 वर्षों में 6500 से अधिक बच्चे मरे. जबकि इस दरम्यान अकेले गोरखपुर स्थितबीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ही 8500 बच्चों की मौत हुई. झूठ की बुनियाद पर गढ़ा गया यह सरकारी आंकड़ा भी कितना भयावह है यह देखिए. आधिकारिक तौर पर1978 में इस बीमारी से मरने वाले बच्चों की संख्या 1072 थी, जो 2005 में डेढ़ हज़ार के ऊपर पहुंच गई. यह संख्या क्रमशः बढ़ती ही गई है, तबसे लेकर आज वर्ष 2010 तकयदि बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अलावा अन्य अस्पतालों और छोटे-बड़े नर्सिंग होमों में हुई मौतों का हिसाब किया जाए तो मरने वाले बच्चों का आंकड़ा भयावहहोगा. लंदन स्थित हेल्थ प्रोटेक्शन एजेंसी सेंटर की रिपोर्ट भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के फर्ज़ी आंकड़ों पर तमाचे की तरह है. सेंटर की रिपोर्ट कहती है कि जुलाई2005 से लेकर अब तक यानी महज़ पांच साल में उत्तरी भारत (पूर्वी उत्तर प्रदेश) और इससे सटे नेपाल के तराई इलाक़े में जापानी इंसेफ्लाइटिस से पांच हज़ार लोगों की मौतहो चुकी है. एक लाख से अधिक लोग इससे आक्रांत हुए हैं. तथ्य यह है कि इस साल यानी 2010 में जनवरी से लेकर सितंबर के दरम्यान अकेले गोरखपुर बीआरडी मेडिकलकॉलेज अस्पताल में ही 338 बच्चे जापानी इंसेफ्लाइटिस की चपेट में आकर मारे गए. पूर्वी उत्तर प्रदेश के अन्य प्रभावित ज़िलों या बिहार के प्रभावित ज़िलों में मरने वालों कीतादाद के बारे में तो स़िर्फ कल्पना की जा सकती है.

3) सड़क दुघर्टना                                         

देश में होने वाली सड़क दुघर्टनाओं का भयावह सच हमें आपके सामने यही बात कहने को विवश कर रहा है कि रोज जब आप अपने बच्चे को स्कूल के लिए भेजते हैं तो अनजानेमें ही उसकी जिंदगी दांव पर लग जाती है,आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में स्कूल आने और जाने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मौतों में हर साल इजाफा होता जा रहा है. दुखद बात ये है कि दुघर्टनाओंका कारण दूसरे की गलती ही सामने आता है.

वर्ष 2000 से 2012 तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में उत्तर प्रदेश टॉप पांच सबसे असुरक्षित राज्यों में शामिल है. नंबर एक पर महाराष्ट्र है, जहां इस दौरान करीब 52,073स्कूली बच्चों की मौत हुई. वहीं 48,993 के आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश दूसरे नंबर पर है.उत्तर प्रदेश में इसी दौरान 40,160 बच्चों ने अपनी जान गंवाई, जबकि आंधप्रदेश में 22,089 और तमिलनाडु में 19078 बच्चों की दुर्घटना में मौत हो गई.

देश में रोजाना तकरीबन 2 करोड़ 70 लाख स्कूली बच्चे करीब 5 लाख बसों से स्कूल जाते हैं. इस दौरान उनकी जान पर लगातार खतरा बना रहता है. 2002 से 2012 के बीचएक दशक के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि भारत में सड़क दुघर्टना में होने वाली स्कूली बच्चों की मौतों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है.

 

4) टी.बी से बच्चों की मौत

 टी.बी से बच्चों की मौत का आंकड़ा भारत में सबसे अधिक है. ‘लैंसेट’ की एक रिसर्च में कहा गया है कि साल 2015 में टी.बी से 55,000 से अधिक  बच्चों की मौत हुई.

एक आंकड़े के अनुसार, साल 2015 में दुनिया भर में 10 लाख से अधिक बच्चे टी.बी से प्रभावित थे. बच्चों में टी.बी का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता हैक्योंकि इसमें कुछ बेहद संवेदनशील जांच होती है और इस बीमारी का कोई तय लक्षण नहीं है. कम उम्र के बच्चों में इस बीमारी के गंभीर रूप में होने की आशंका ज्यादा होती है, हालांकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की इस बीमारी के कारण मौत की दर काकोई अनुमानित आंकड़ा नहीं है.

ब्रिटेन में शेफील्ड विश्वविद्यालय के पेटे डोड ने कहा कि हमारा अनुमान है कि 2015 में 217 देशों में 14 साल की उम्र तक 239,000 बच्चों की मौत टी.बी कीवजह से हुई. इनमें से 80 फीसदी बच्चे पांच साल से कम उम्र के थे. इस आयु के बच्चों की मौत की 10 प्रमुख वजहों में टी.बी भी शामिल रहा.’’ आंकड़े के अनुसार जिन बच्चों की मौत हुई उनमें 96 फीसदी से अधिक बच्चों का इस बीमारी का उपचार नहीं हुआ. सबसे ज्यादा मौतें भारत, नाइजीरिया, चीन,इंडोनेशिया और कांगो में हुई.

5) निमोनिया, डायरिया से बच्चों की मौत

निमोनिया और डायरिया आज की तारीख में भले ही गंभीर बीमारियों की श्रेणी में न हों, लेकिन इन दोनों बीमारियों से दुनिया भर में बच्चों की सर्वाधिक मौतें भारत में होती है।

निमोनिया एंड डायरिया,2015 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत द्वारा टीकाकरण अभियान में तेजी लाने के बावजूद निमोनिया और डायरिया से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों कीसर्वाधिक मौतें हो रही हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 में भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 297,114 बच्चों की मौत निमोनिया तथा डायरिया से हुई रिपोर्ट में कहा गया है कि,इन दोनों बीमारियों से नाईजीरिया में 210,557, पाकिस्तान में 103,760, कांगो में 78,422 तथा अंगोला में 54,548 बच्चों की मौत हुई, जिनकी उम्र  पांच वर्षसे कम थी,दोनों बीमारियों से पांच वर्ष से कम उम्र के सर्वाधिक बच्चों की मौत के मामले में 15 देशों की सूची में 22,394 मौतों के साथ तंजानिया सबसे निचले पायदान पर है।

इस रिपोर्ट को जॉन्स हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में इंटरनेशनल वैक्सिन एक्सेस सेंटर (आईवीएसी) द्वारा जारी किया गया है रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 मेंसहस्राब्दि विकास व बच्चों की मौत को कम करने के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में वैश्विक प्रयास किए गए हैं, लेकिन फिर भी दुनियाभर में लगभग 59 लाख बच्चे पांचवां साल पूराकरने के पहले ही काल के गाल में समा जाएंगे।

रिपोर्ट में कहा गया है, इन 59 लाख बच्चों में से 16 फीसदी मौत के लिए निमोनिया, जबकि नौ फीसदी मौत के लिए डायरिया जिम्मेदार होगा।आईवीएसी के कार्यकारी निदेशक ओब्रायन ने कहा कि टीकों को लाना, उनका प्रचार-प्रसार करना और कम से कम छह महीनों तक शिशु को मां का दूध पिलाने से निमोनिया से लड़ने में सहायता मिल सकती है।

6) नवजातों की मौत

राज्यसरकार ने 2016-17 में बच्चों के पोषण से जुड़ी योजनाओं पर करीब 1200 करोड़ रुपये खर्च किए। ये योजनाएं वो हैं जिनसे राज्य में नवजात से लेकर 5 साल तक के बच्चोंके स्वास्थ्य पोषण को सुधारा जाता है ताकि राज्य में शिशु मृत्यु दर और खासतौरपर नवजात मृत्यु दर को कम किया जा सके।सरकार का बजट और इरादा तो कमजोर नहींदिखता लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि इस बजट को खर्च करने का आधार माने जाने वाले आंकड़ों को लेकर खुद सरकार अंधेरे में है। राज्य में जन्म के तुरंत बाद से लेकर 11महीने के भीतर मारे जाने वाले बच्चों की वास्तविक संख्या कितनी है, ये दावे के साथ कोई नहीं कह सकता।रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की ओर से जारी होने वाले सैम्पलरजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) बुलेटिन के मुताबिक 2015-16 में राज्य में कुल 84335 नवजातों की मौत हुई, जिनमें से 3482 की मौत जयपुर में हुई।राज्य सरकार केस्वास्थ्य विभाग और एनएचएम के मुताबिक ये आंकड़ा प्रोविजनल है और वास्तविकता से कहीं ज्यादा है। राज्य सरकार का अपना आंकड़ा कहता है कि 2015-16 में प्रदेश मेंकुल 18328 नवजातों की ही मौत हुई और इनमें से 2500 केस जयपुर के थे।लेकिन अधिकारी इस आंकड़े के सही होने का भी दावा नहीं करते। उनका कहना है कि फील्ड मेंरिपोर्टिंग की दिक्कतों के कारण राज्य सरकार के पास जो आंकड़े हैं वो वास्तविकता से काफी कम हैं। ऐसे में सही आंकड़ा क्या है...कोई नहीं जानता।

 

 

रानीपुर झांसी उ.प्र, युवा लेखिका, सामाजिक चिन्तक