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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

आधुनिक हिंदी एवं मराठी साहित्य के पुरोधा : एक तुलनात्मक अध्ययन

आधुनिक हिंदी एवं मराठी साहित्य के पुरोधा : एक तुलनात्मक अध्ययन

                 बेंद्रे बसवेश्वर नागोराव

                                                                                                             पीएच.डी. शोधार्थी

                          हैदराबाद विश्वविद्यालय

                            हैदराबाद, तेलंगाणा

                       मो. नं.  9490139682

                                                                                                 bashu.hcu@gmail.com

 


हिंदी एवं मराठी साहित्य में आधुनिक तत्व का प्रवेश क्रमशः भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री के पदार्पण से माना गया है। दोनों का अपने-अपने साहित्य में ऐतिहासिक स्थान है। प्रस्तुत दोनों लगभग एक ही समय में अस्तित्व में रहे। दोनों का एक दूसरे से परिचय का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी इन दोनों के साहित्य में बहुत सारे तत्व एक से दिखाई देते हैं। दोनों ने ही अपने-अपने भाषायी समुदाय में स्वदेश प्रेम जगाने का कार्य किया। इनके जीवनकाल के समय में पहला स्वाधीनता संग्राम हुआ था लेकिन इन दोनों ने इस पर बहुत कम बात की, उसमें भी इन लोगों की राय अच्छी नहीं थी। इन सभी चीजों में समानता परिलक्षित होने का कारण दोनों की एक-सी राजनितिक एवं सामाजिक स्थिति है। फिर भी इन दोनों के साहित्य में बहुत सारे तत्व एक-से दिखाई नहीं देते है।

हिंदी तथा मराठी प्रदेश में राजनीतिक दृष्टि से कुछ ज्यादा अंतर नहीं था। इन दोनों आलोचकों को अपने समय की राजनीतिक व्यवस्था ने सर्वाधिक प्रभावित किया। दोनों ने ही राजनीतिक व्यवस्था पर लिखा है। भारतेंदु में कहीं-कहीं राजनिष्ठा दिखाई देती है वहीँ विष्णुशास्त्री पूर्णतः शासन का विरोध करते है। इनके समय में राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना ‘प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ थी।

सामाजिक स्थिति में इन प्रदेशों में काफी अंतर है। समाज-सुधार आंदोलन महाराष्ट्र में कुछ पहले आरम्भ होता है। महाराष्ट्र में इसकी दो धाराएं प्रचलित थी एक जो बहुजन समाज का नेतृत्व कर रहे थे तो दूसरा ब्राह्मण वर्ग का नेतृत्व कर रहे थे। तत्कालीन महाराष्ट्रीय समाज में जो ब्राह्मण-ब्राह्मणोंत्तर का संघर्ष था, उसका प्रभाव तत्कालीन समाज-सुधार आन्दोलनों पर दिखाई देता है। हिंदी प्रदेश में इस तरह के किसी घटना का उल्लेख नहीं मिलता। जिस प्रकार हिंदी प्रदेश आर्य समाज आदि से प्रभावित है। उसी प्रकार महाराष्ट्र पर ‘प्रार्थना समाज’ एवं ‘सत्यशोधक समाज’ का ज्यादा प्रभाव दिखाई देता है। इन समाज-सुधार आंदोलनों का तत्कालीन समाज पर प्रभाव था। प्रकारांतर से उसका प्रभाव भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री पर भी पड़ा। हालांकि इन दोनों की इन समाज-सुधार आंदोलनों के प्रति अच्छी राय नहीं थी।

आर्थिक स्थिति दोनों प्रदेश की एक-सी ही थी। लेकिन पश्चिम महाराष्ट्र विशेषकर मुंबई प्रान्त की ओर खेती सुधार का प्रयास किया गया। शायद इसी वजह से आज पश्चिम महाराष्ट्र की कृषि अत्यंत समृद्ध है। अन्य क्षेत्रों में तो अंग्रेजों की व्यापारिक नीति ही हावी थी। जो कि समग्र भारत पर एक समान थी। अपने समय के आर्थिक दशाओं का चिंतन भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री अपने निबंधों में करते है। दोनों ने ही अपने प्राचीन समृद्ध भारत का स्मरण कर तत्कालीन स्थिति की काफी निंदा की।

शैक्षणिक स्थिति दोनों प्रदेशों की थोडी-सी भिन्न दिखाई देती है। कलकत्ता और मुंबई में उस समय विद्यालयों की स्थापना की गयी। दोनों ही प्रदेशों में एक ऐसा वर्ग उभरकर सामने आया जो अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर अपने देश की स्थिति को समझ रहा था। उसे शिक्षा के महत्त्व का आकलन हुआ। उन्ही शिक्षित लोगों ने देश में कई स्कूलों की स्थापना की। अतः यही कारण है कि 19 वीं शती में पूरे भारत में शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। साहित्यिक स्थिति दोनों प्रदेशों की अत्यंत भिन्न थी।

हिंदी प्रदेश में अब तक पद्य के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग किया जाता और गद्य का न के बराबर विकास हुआ था। यही वह समय था जब हिंदी गद्य ने अपना स्वरूप ग्रहण करना प्रारम्भ किया, जिससे हिंदी खड़ीबोली का विकास हुआ। लेकिन महाराष्ट्र में गद्य पहले से ही प्रचलित था। 19 वीं शती के आरम्भ से मराठी में गद्य रचनाएँ होने लगी थी। हिंदी साहित्य के लिए यह समय बहुमुखी विकास का समय था। 19 वी शती का उत्तरार्द्ध हिंदी एवं मराठी साहित्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा यही वह समय था जब साहित्य में आधुनिकता प्रवेश कर रही थी।

हिंदी साहित्य में भारतेंदु को आधुनिक हिंदी साहित्य के पुरोधा के रूप में देखा जाता है तो यही कार्य विष्णुशास्त्री मराठी साहित्य के लिए करते है। दोनों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व अत्यंत भिन्न है। दोनों का जन्म 1850 में ही हुआ तथा मृत्यु भी 35 वर्ष की आयु के भीतर। इन दोनों का जन्म एक शिक्षित परिवार में हुआ। दोनों की शिक्षा अच्छे स्कूलों में हुई। भारतेंदु बीच में ही शिक्षा छोड़ देते है लेकिन विष्णुशास्त्री बी. ए. तक की शिक्षा पूर्ण की। भारतेंदु स्वभाव से स्वछंद थे तो विष्णुशास्त्री को आजीवन अनुशासन प्रिय ही रहे। भारतेंदु को घूमना बहुत प्रिय था जबकि विष्णुशास्त्री अपने प्रदेश से कभी बाहर गए ही नहीं। उनका वृत्त अपना साहित्य ध्यास और निबंध लेखन तक ही सीमित रहा। दोनों ने ही अपने साहित्य के लिए बहुत कुछ किया। भारतेंदु नाटक, निबंध, कविता, या अन्य विधाओं में लिखते हैं। विष्णुशास्त्री विशेषकर ‘निबंध’ विधा में ही अपना लेखन कार्य किया। अतः इसी रचनात्मक एवं विचारात्मक कार्यवश उन्हें अर्थात भारतेंदु को हिंदी तथा विष्णुशास्त्री को मराठी साहित्य का युगप्रवर्तक रचनाकार माना जाता है।

आलोचना के क्षेत्र में भी भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री पुरोधा रहे। ‘नाटक’ निबंध के माध्यम से भारतेंदु तो ‘संस्कृत कविपंचक’ निबंध के माध्यम से आधुनिक आलोचना का सूत्रपात करने का श्रेय विष्णुशास्त्री को प्राप्त है। दोनों ने ही स्वभाषा, स्वदेश, स्वसंस्कृति को विशेष महत्त्व दिया। दोनों ने ही साहित्य के सैद्धांतिक पक्ष पर भी विचार किया। भारतेंदु की तुलना में विष्णुशास्त्री का आलोचनात्मक कार्य व्यापक है, फिर भी भारतेंदु का कार्य कम महत्वपूर्ण नहीं है। आलोचना के क्षेत्र में भारतेंदु कम लिखते हैं क्योंकि वे अन्य विधाओं में भी रचना कर रहे थे। इन दोनों ने भी अपने अपने आलोचनात्मक निबंधों में साहित्य का सम्बन्ध जनसामान्य से जोड़ने का प्रयास किया। विशेष कर भारतेंदु के आलोचना में यह तत्व ज्यादा दिखाई देता है। आलोचना के क्षेत्र में जितने विषयों को विष्णुशास्त्री ने छुआ उनके सामने भारतेंदु का कार्य बहुत कम है। अपने आलोचनात्मक कार्य की वजह से जितनी आलोचना विष्णुशास्त्री की हुई उतनी भारतेंदु की नहीं। लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही प्रतीत होता है, वह है स्वभाषा, स्वदेश का अभिमान। इसके अलावा दोनों में भाषा के विकास को लेकर विशेष चिंता दिखाई देती है। दोनों ने अपने निबंधों के माध्यम से भाषा की स्थिति पर विचार किया है। भारतेंदु की तुलना में विष्णुशास्त्री के भाषा विषयक विचार ज्यादा वैज्ञानिक प्रतीत होते है। अतः एक ही युग में उत्पन्न हुए उक्त दोनों युग पुरुषों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में संवाद, विवाद तथा एकालाप के तत्त्व विद्यमान है, जो उनके आलोचनात्मक कर्म से व्यक्त होते है।

भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री के आलोचात्मक कर्म में देखे गये समान और असमान तत्वों के आधार पर ही हम उसका तुलनात्मक अध्ययन कर सकते है। आलोचनात्मक कर्म का विवेचन करते हुए भी उनके समान एवं असमान तत्वों पर कमावेश मात्रा में ध्यान दिलाने का प्रयास किया गया है, फिर भी कुछ मुख्य बिन्दुओ को यहाँ पर उद्धृत किया जाएंगा, आधुनिक मराठी वाङ्मयाचा इतिहास भाग एक में व. कृ. वऱ्हाडपांडे अपने तुलनात्मक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए लिखा है कि बंगाली गद्म में प्रभु बंकिमचन्द्र चटर्जी तथा आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता भारतेंदु हरिश्चंद्र इन दोनों के साहित्य में स्वधर्म, स्वदेश एवं स्वभाषा का अभिमान है, वहीं चिपलूणकर के साहित्य में अधिक ओजपूर्ण तथा आक्रामक रूप लेते हुए दिखाई देता हैं।

भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री के आलोचनात्मक कर्म में अनेक समान एवं असमान बिंदु परिलक्षित होते है जो इस प्रकार है -

भारतेंदु के साहित्य क्षेत्र में पदार्पण के समय हिंदी के गद्य रूप निर्माण की अवस्था में था तो विष्णुशास्त्री के साहित्य क्षेत्र में प्रवेश तक मराठी गद्य अपने विकसित रूप में था, परन्तु उसमे शैली विशेष के निर्माण की अवस्था थी।

 भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री कों क्रमशः हिंदी और मराठी साहित्य में युग-प्रवर्तक का श्रेय दिया जाता है। दोनों ने ही अपने साहित्य के माध्यम से आधुनिक प्रवृत्तियों का सूत्रपात किया।

भारतेंदु के ‘नाटक’ निबंध से आधुनिक हिंदी आलोचना का तो विष्णुशास्त्री चिपलूणकर के ‘संस्कृत कविपंचक’ से आधुनिक मराठी समीक्षा का सूत्रपात माना जाता है।

भारतेंदु के ‘नाटक’ निबंध पर भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र का प्रभाव दिखाई देता है तो विष्णुशास्त्री के समग्र आलोचना दृष्टि पर पाश्चात्य विचारों का अधिक प्रभाव है।

भारतेंदु के आलोचना के केंद्र में नाटक है तो विष्णुशास्त्री के आलोचना के केंद्र में कविता है फिर भी दोनों ने अन्य विधाओं की रचनाओं की भी आलोचना की है।

भारतेंदु अपने निबंध में ‘जातीय संगीत’ में लोकगीत एवं जनसामान्य को महत्व देते है तो विष्णुशास्त्री भी ‘नाटक को खेला जाना चाहिए या नहीं ?’ निबंध प्राचीन लोककला तमाशा आदि को विशेष महत्व दिया।

विष्णुशास्त्री की तुलना में भारतेंदु का आलोचना कर्म काफी कम है। 

भारतेंदु एवं विष्णुशास्त्री दोनों के ही आलोचना कर्म पर समकालीन समाज-सुधार आंदोलनों का प्रभाव दिखाई देता है।

भारतेंदु निबन्ध के अलावा अन्य विधाओं में भी रचनाएँ की जबकि विष्णुशास्त्री का सम्पूर्ण साहित्य-कर्म सिर्फ गद्य में ही है, उसमें भी निबंध में ही।

भारतेंदु के साहित्य के प्रभाव से साहित्यिककारों अर्थात भारतेंदु मंडली का निर्माण हुआ। विष्णुशास्त्री अपनी पत्रिका ‘निबन्धमाला’ के माध्यम से उस समय के युवकों को प्रभावित किया जो साहित्य क्षेत्र के अलावा भी राजनीति, इतिहास, समाज-सुधार क्षेत्र से सम्बंधित थे। इन्ही युवकों ने इस प्रदेश का बहुत दिनों तक सामाजिक एवं राजनितिक नेतृत्व किया।

भारतेंदु के आलोचनात्मक निबंधों में भावुकता दिखाई देती है। विष्णुशास्त्री की रचनाओं में बौद्धिकता एवं तर्क कौशल ज्यादा दिखाई देता है।

भारतेंदु की आलोचना दृष्टि भारतीय चिंतन से अधिक प्रभावित थी तो विष्णुशास्त्री की आलोचना दृष्टि पर पाश्चात्य चिंतन का ज्यादा प्रभाव है।

सैद्धांतिक आलोचना में भारतेंदु ने ‘नाटक’ विधा का विस्तृत तात्विक परिचय दिया। विष्णुशास्त्री ने ‘कविता’ पर समीक्षात्मक लिखा, नाटक पर भी लिखा लेकिन वह सैध्दांतिक कम व्यावहारिक ज्यादा है।

दोनों ने ही अपने निबंधों में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया। दोनों ने इसका उपयोग अपने प्रतिपक्षियों के उपहास के लिए किया। इसीलिए रामविलास शर्मा भारतेंदु को व्यंग्यात्मक आलोचना का सूत्रपात कर्ता मानते हैं।

गद्य के विविध रूपों से भारतेंदु ने भाषा की विविध शैलियों का अविष्कार किया विष्णुशास्त्री सिर्फ निबंध लिखने से उनको यह अवसर प्राप्त नहीं हुआ।

परवर्ती आलोचकों ने भारतेंदु की भाषा शैली को ‘जातीय शैली’ तो विष्णुशास्त्री की भाषा शैली को ‘सृजनशील शैली’ के रूप में स्वीकृत किया।

दोनों का ही आलोचनात्मक कर्म पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सफल होता है।

भारतेंदु ने अपने साहित्य के माध्यम से ‘स्वदेशी भावना’ को जागृत करने का प्रयास किया, तो विष्णुशास्त्री ने अपने साहित्यिक कर्म से ‘स्वदेश भावना’ के साथ-साथ ‘स्वत्व’ की भावना को भी जगाने का प्रयास किया।

 

 

सन्दर्भ एवं सहायक ग्रन्थ

  1. भारतीय समीक्षा, डॉ. नगेन्द्र, उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी, लखनऊ प्र. सं. 1975
  2. भारतेन्दुकालीन हिंदी-साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, डॉ. कमला कानोडिया, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी प्र. सं. 1971
  3. भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ, रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली प्र. 1984
  4. भारतेंदु समग्र, स. हेमंत शर्मा, हिंदी प्रचारक पब्लिकेशन, वाराणसी पं. सं. 2002
  5. मराठी समीक्षेची वाटचाल, गो.म. कुलकर्णी, स्नेहवर्धन पब्लिशिंग हाऊस, पुणे प्र. 1998
  6. निबंधमाला (भाग 1,2), सं. कृ.ब. मांडे, वरदा प्रकाशन, पुणे 1888
  7. विष्णुशास्त्री चिपलूणकर, य.दि. फडके, नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली द्वि. आ. 2006
  8. विष्णुपदी (प्रथम खंड), सं. श्री.ना. बनहट्टी, सुविचार प्रकाशन मंडल, पुणे द्वि. आ. 1974