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कथाकार काशीनाथ सिंह: नये विमर्श के आईने में

कथाकार काशीनाथ सिंह: नये विमर्श के आईने में

संतोष कुमार गुप्ता, शोध-छात्र

हिंदी विभाग, उत्तरबंग विश्वविद्यालय

मोबईल: 9832522305

 


हिंदी वांग्मय में कहानी विद्या का आगमन उतना पुराना नहीं है। जितना कि उपन्यासों, नाटकों या कविताओं आदि का रहा है। फिर भी यह विद्या पिछले कई दशकों से हिन्दी साहित्य की केन्द्रीय विद्या बनी हुई है। समय के साथ प्रत्येक वस्तु में बदलाव होता है और यह बात सर्वविदित है कि समय के हर पड़ाव में साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन लक्षित की गई हैं। वैसे तो उन्नीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में कहानी अपना दस्तक देना शुरु करती है, परन्तु मुख्य रूप से बीसवीं सदी के शुरुआत में ही हिन्दी साहित्य में मजबूती के साथ अपना कदम रख देती है और देखते-देखते अपना दायरा बढ़ा लेती है। शुरुआती दौर में जो कहानीकार आए वे आदर्श और उपदेशात्मक कहानियाँ लिखे। साथ ही साथ अनुवादित कहानियों का भी प्रचलन जोरों पर था। परन्तु हम जिस विषय की बात करने जा रहें हैं वह है- समकालीन कहानी में नए विमर्श। ‘विमर्श’ शब्द मूलत: गहन सोच-विचार, विचार-विनिमय तथा चिंतन-मनन को द्योतित करता है। भोलानाथ तिवारी के अनुसार विमर्श का अर्थ है-“तबादला-ए-ख्याल, परामर्श, मशविरा, राय-बात, विचार-विनिमय, विचार-विमर्श, सोच-विचार।”1 वहीं अँग्रेजी विश्कोश Encyclopedia Britanica में विमर्श के अंगरेजी पर्याय ‘Consultation’  का अर्थ इस प्रकार दिया गया है- “The word ‘Concious’ has been used in many different senses By origin it in an latin compound, mining ‘knowing thing together’, either because several people are privy to the knowledge or (in later usage) because several things are known simultaneously.”2 परिवर्तन संसार के अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है। जब-जब संसार में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक ढाँचे में बदलाव होता है तब-तब नये परिवेश का जन्म भी होता है और इन्हीं  प्रक्रियाओं एवं प्रभावों से रचनाकार की जीवन दृष्टि निर्मित होती है। यह हम सभी जानते हैं की साहित्य अपने युगीन परिवेश का संवाहक होता है। समकालीन परिस्थितियों को निर्मित करने में तत्कालीन परिस्थितियों का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसलिए समकालीन कहानी और उसमें निहित विविध विमर्शों के बारे में जानने से पहले समकालीन कहानी के तत्कालीन परिस्थितियों के बारे में जानना बहुत ही जरूरी हो जाता है। सन् 1962 ई. में भारत-चीन युद्ध नें भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। सन् 1965 और ‘71 में भारत-पाक युद्ध और फिर सन् 1975 की इमर्जेंसी। इस तरह देश की राजनीति में अनिश्चितता व अव्यवस्था का सुत्रपात हुआ और सात राज्यों में गैर काँग्रेसी सरकार बनी। सन् 1984 में इंदिरा गाँधी की उनके ही अंहरक्षकों द्वारा हत्या और ‘91 में नरसिम्हा राव की सरकार में उदारीकरण की नीति ने रही सही कसर पूरी कर दी।

     ‘समकालिनता’ का सीधा अर्थ ‘समसामयिकता’ से है और वही रचना समकालीन कही जा सकती है, जो अपने समय का बोध व्यक्त करे। हिन्दी कहानी के विकास को दो भागों में रेखांकित किया जाता रहा है- 1. स्वतंत्रता पूर्व की हिन्दी कहानी 2. स्वतंत्रता के बाद की हिन्दी कहानी। लेकिन हमारे विवेच्य विषय का संबंध सीधे-सीधे स्वतंत्रता के बाद की कहानियों से है।  20 वीं सदीं का 6 ठा दशक नयी कहानी आंदोलन के नाम रहा ये हम सब जानते हैं। परन्तु समकालीन हिन्दी कहानी आंदोलन की जमीन तैयार करने में नयी कहानी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सन 1960 के बाद हिन्दी कहानी में कई आंदोलनों का आगाज होता है। जिसमें समकालीन कहानी आंदोलन का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। समकालीन हिन्दी कहानी का समय लगभग सन् 1970 से माना जाता है, लेकिन इसकी भूमिका तैयार हो जाती है ‘67 ई. के नक्सलबाड़ी आंदोलन से ही।

              समकालीन हिन्दी कहानी आंदोलन में समय समय पर विभिन्न विमर्श उभर कर सामने आए हैं जिन्हें उक्त समय के कहानीकार अपनी-अपनी कहानियों में यथासंभव स्थान देने की कोशिश की है। समकालीन हिन्दी कहानियों में जब नए विमर्श की बात आती है तो स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श,युवा-विमर्श,राजनीतिक-विमर्श,सेक्स-विमर्श,बाजार-विमर्श,किन्नर-विमर्श आदि की बात आती है। परन्तु सही मायने में ये सारे विमर्श एकदम से नए हैं, ऐसी बात बिल्कुल नहीं है और न ही मानी जा सकती है। समकालीन कहानी आंदोलन के पूर्व जितने भी कहानी आंदोलन हुए उसमें इन विमर्शों की बात थोड़ी-बहुत उठकर सामने आई है और इसमें पहला नाम प्रेमचंद का आता है। इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन हाँ, ये बात सौ-प्रतिशत सही है की इन विमर्शों को प्रतिष्ठित होने का मौका समकालीन हिन्दी कहानियाँ ही प्रदान करती हैं। इस दौर की कहानियाँ समाज की चिन्ता से ऊपर उठकर व्यक्ति की चिन्ता पर जोर देती है।

पिछले कुछ दशकों में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श और आदिवासी-विमर्श की खूब चर्चा रही है और अब तो उसमें एक और विमर्श जुड़ गया है-किन्नर विमर्श। स्त्री-विमर्श एक वैश्विक फेनामिना है। दुनिया भर में स्त्रियाँ पुरुषों द्वारा सताई गईं हैं और शोषित होती रहीं हैं। वहीं दलितों का दमन तो पुराने समय से सदा ही होता आया है। परन्तु उल्लेखित तमाम विमर्शों को नए सिरे से प्रतिष्ठित करने में समकालीन कहानीकारों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है।

                        इस संदर्भ में प्रगतिशील चेतना के प्रतिबद्ध  और प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह का भी एक नाम आता है। जिन्होंने सन् 1960 ई. से कहानियों से ही लेखन-क्षेत्र में प्रवेश किया और उनकी पहली कहानी भी एक दलित स्त्री पर ही लिखी गई थी- ‘ढोला कहारिन’ जिससे सब मजाक करते थे। जैसे-जैसे कहानी के क्षेत्र में ये आगे बढ़े वैसे-वैसे समकालीन हिन्दी कहानियों में विविध नए विमर्शों से इनका भी सामना हुआ। इनकीं कहानियों में राजनीति, बजार, दलित, स्त्री, सेक्स, युवा, बुजुर्ग, भूमंडलीकरण आदि विमर्शों पर खुल कर बात हुई है। ‘कहानी सरायमोहन की’ शीर्षक कहानी में एक दलित ‘मोहन’ द्वारा बनाईं गई बाटियाँ कैसे ठाकुर और ब्राहम्ण मिल कर चट कर जाते हैं। इसके बाद मोहन से गाना सुनने की फरमाईश करते हैं और मोहन ‘बनिया’ के कहानी के माद्धयम से गाना सुनाता है- “दे दनादन, दे दनादन” और इस गाने के माद्धयम से अपनी पूरी भँरास ठाकुर और पंडित पर निकाल लेता है। इस कहानी में यह भी बात स्पष्ट होती है कि जब पेट की आग बर्दाश्त के बाहर हो तो किस तरह ऊँच-नीच का भेद परे हो जाता है, यह देखते ही बनती है।  काशीनाथ सिंह की कहानियों में राजनीति पर व्यंग्य के माद्धयम से खुलकर चोट की गई है जिसमें ‘सूचना’, ‘बायस्कोप का लल्ला’, ‘माननिय होम मिनिस्टर के नाम’ आदि कहानियों को ली जा सकती है। राजनीति में भ्रष्टाचार  किस कदर फैली है एक उदाहरण ‘माननिय होम मिनिस्टर के नाम’ कहानी से- “कानूनगो। जैसा की आप आप जानते हैं, उसके मातहत हैं 35  लेखपाल और 315 गाँव। 315  गाँव के किसान देते हैं। लगान इन लेखपालों को। और ये लेखपाल एक बार कानूनगो को। कानूनगो तहसीलदार को। तहसीलदार डिप्टी को। डिप्टी कलक्टर को। कलक्टर...बड़ा लम्बा सिलसिला है।”3

                                 कहने और सुनने में थोड़ा अजीब लगता है। परन्तु आज के समय में एक और विमर्श है जिसकी चर्चा करना बहुत जरूरी जान पड़ता है जिसकी ओर काशीनाथ सिंह की नजर भी गई है। वो है सेक्स-विमर्श। जिससे अक्सर लोग बच कर चलना चाहते हैं। सेक्स मानव-जीवन में एक सहज प्रवृति के रूप में मान्य है। शास्त्रों में भी चार पुरुषार्थ में से काम को एक पुरुषार्थ के रूप में स्वीकार किया है। डॉ. अर्जुन चव्हाण लिखते हैं- “वात्स्यायन का कामसूत्र काम कला को लेकर लिखा गया एक चर्चित ग्रंथ है, लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि जिस देश मेम कामसूत्र लिखा गया उसी देश के समाज में उसी देश के समाज में यह विषय घृणित माना गया, निषिद्ध माना गया।”4

                             काशीनाथ सिंह की कहानी ‘संकट’ जिसका पात्र राघो है और मिलिट्री का जवान है। कई महीनों बाद जब वह छुट्टी में घर आता है तो उसे पता चलता है की पत्नी ‘सौरी’ में है और एक बेटे को जन्म दिया है। परन्तु इस बात पर उसका व्यवहार बदल जाता है और कई बार पत्नी को मारता है।राघो का मानना है कि उसकी आठ दिन की छुट्टी यूंही बर्बाद हो गई और बच्चे को क्या इसी समय जन्म लेना था?

                          इसके पहले राघो का मानना था-“” औरत संसार का अर्नामेंट है। नहीं, मास्टर साहब क्या पढाते थे तुमको? फिगर आफ स्पीच? हाँ,तो औरत फिगर आफ स्पीच है।5 इस तरह इस कहानी में सेक्स की समस्या को आसानी से समझा जा सकता है। अगले विमर्श के रूप में ‘बाजार’ पर चर्चा करना बहुत जरूरी हो जाता है। बाजार हमेशा से समाज को प्रभावित करता आया है और जब काशीनाथ सिंह ‘कवन ठगवा नगरिया लूटल हो’ की रचना करते हैं तब उनकी यह चिन्ता वृहद स्तर पर उभर कर सामने आती है।  उक्त कहानी काशीनाथ सिंह की बहुचर्चित उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में समाहित है। इसमें लेखक बनारस के साथ-साथ पूरे भारत की लूटने की कथा अर्थात बाजार के द्वारा सभ्यता, सस्कृति को ग्रासने की बात करता है। नामवर सिंह लिखते हैं-“काशी सबसे पुरानी नगरी है जिसकी हजारों साल की संस्कृति है, वह संस्कृति कैसे टूट कर बाजार का शिकार बनती है, इस पर यह किताब इशारा करती है।”6 काशीनाथ सिंह जब उक्त कहानी की रचना करते हैं तो उनकी चिन्ता केवल बनारस की नहीं बल्कि पूरे देश और समाज की चिन्ता बन कर उभरती है। उनकी कहानी का पात्र कन्नी अपने पत्नी को रिमोट कंट्रोल दिखाते हुए कहता है- “देख रही हो रिमोट। दुनिया इसी से चल रही है आज। कुछ भी करने के लिए हाथ-पाँव मारने की जरूरत नहीं।”7   कहने की जरूरत नहीं कि यह रिमोट किसके हाथ में है और वह हमें कैसे चला रहा है। काशीनाथ सिंह की चिंता दुरदर्शी है जिस पर विचार करना बहुत ही आवश्यक है।

 

संदर्भ ग्रंथ-सूची:-

  1. साभार, डा. अर्जुन चव्हाण, विमर्श के विविध आयाम, वाणी प्रकाशन, पृ. संख्या-18
  2. वही, पृ. संख्या-18
  3. काशीनाथ सिंह, कहनी उपखान, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, पृ. संख्या-153
  4. अर्जुन चव्हाण, विमर्श के विविध आयाम, वाणी प्रकाशन, पृ. संख्या-87
  5. काशीनाथ सिंह, कहनी उपखान, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, पृ. संख्या-26
  6. डॉ. अमरनाथ, हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2009, पृ. संख्या-111
  7. काशीनाथ सिंह, काशी का अस्सी, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण-2006, पृ. संख्या-167