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आधुनिक हिन्दी कविताओं में पारिस्थितिक चिंतन

आधुनिक  हिन्दी  कविताओं में पारिस्थितिक चिंतन

श्वेता  रस्तोगी

शोध छात्रा (कलकत्ता विश्वविद्यालय) 

फोन न. 8013281659

 


 प्रकृति   ईश्वर  का  अनमोल  वरदान  है। सृष्टि  में  व्याप्त  पेड़ - पौधे, नदियाँ,  वायु   आदि   प्रकृति  के  अभिन्न  अंग  हैं। यह  सारे  प्रकृतिक उपादान  वातावरण  में  पारिस्थितिक  संतुलन  बनाये  रखने  में  विशेष  उल्लेखनीय  हैं। औद्योगिकरण  के  विकास  और  मनुष्य  की अतिश्य  भोग  लिप्सा  ने  सृष्टि  में पारिस्थितिक असंतुलन  को  जन्म दिया   जिसके  अंतर्गत  मनुष्य  द्वारा  प्रकृति  और  पशु  –  पक्षियों  के   अनवरत  शोषण  को   देखा  जा  सकता  है।  भूमंडलीकृत   सभ्यता  के   अंतर्गत  निर्मम  होते  मनुष्य  की  यह   त्रासदी  है  कि  वह  विकास की  अंधी  दौड़  में  शामिल  होकर   प्रकृति   का  दोहन  कर  स्वयं  को विकास  का  अग्रदूत माने  जाने  के  लिये  प्रयासरत है।  बढ़ते   पूँजीवाद  और  औद्योगिकरण  ने  मनुष्य  की  चेतना  को   कुंद  कर  समाज  में  विकल्पहीन   स्थिती  को  उपजाया  है,  जिसमें  अगर  नाश  लिखा  है  तो  वो  भी  मनुष्य  का  ही। पर अज्ञानतावश  मनुष्य  स्वयं  को  शक्तिशाली   मानने  के  अहम  में  ऊँची  ईमारतों, होटल, कारखानों  तथा  अत्याधुनिक  सुख - सुविधाओं   को   एकत्र  करने  में  प्राकृतिक  सौंदर्य  को   नष्ट  कर  रहा  है।  प्राकृतिक  सौंदर्य  लुप्त  होता  जा  रहा  है  उसके  बदले  कृत्रिम  सौंदर्य  अपना आधारहीन  वर्चस्व   स्थापित   कर  रहा है।   मनुष्य  की  इसी  उपभोक्तावादी   अनर्गल   संस्कृति  के  प्रति  गहन  चिंतन   कविगुरु  रविंद्रनाथ  की  कविता  में  देखा  जा  सकता  है –

 

देश की  माटी  देश का जल

हवा देश की

देश के फल

सरस   बनें   प्रभु  सरस  बनें ।“ 1

                                 

उपभोक्तावादी  संस्कृति  ने  न  केवल  मनुष्य  की  चेतना  को  छिन्न -  भिन्न  किया  है  बल्कि  एक  ऐसी  परम्परा  विमुख  संस्कृति  को  जन्म  दिया  है  जहाँ  एक   ओर  प्राकृतिक  उपादानों  के  क्षय  हो  जाने  की  आशंका  है  तो  दूसरी  ओर  आपाधापी  से  भरी  ज़िंदगी  में  सबकुछ  खोकर  थोड़ा पा  जाने  का  एकालाप।  मनुष्य  की  इसी   आपाधापी   से   युक्त  ज़िंदगी  की  भत्सना  करते  हुये, प्रकृति  के  चरम  स्पर्श  को  महसूस  करते  हुये  अज्ञेय  ‘ हरी  घास  पर  क्षण भर’  शीर्षक  कविता में  कहतें  हैं ‌-

क्षण भर भुला  सकें  हम

नगर  की  बेचैनी  बुदकती  गड्ड -  मड्ड  अकुलाहट

और न  मानें  उसे  पलायन

क्षण भर   देख  सकें  आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली

पौधे , लता दोलतीफुल, झरे पत्तें, तितली-  फुनगें

फुनगी  पर पूँछ  उठा कर  इतराती  छोटी – सी  चिड़िया” 2

इसके  अलवा  अज्ञेय  करुणाविहिन शहरी  विसंगति को  आत्मसात  करते  हुये  कहतें  हैं -

नहीं   सुनें हम वह  नगरी  के  नागरिकों से

जिनकी  भाषा  में  अतिशय  चिकनाई  है

साबुन  की किंतु  नहीं  है करुणा”3

 

                  समकालीन  यथार्थ को  आधार  बनाकर  अनेक  कवियों  ने  अपनी  कविताओं  में  शब्द्बद्ध  किया है। समकालीन  यथार्थ  के  सम्बंध  में  एक  विशेष  महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय  यथार्थ  नदियों  के  दोहन  का  यथार्थ  है ।  कई  सभ्यतओं  और  संस्कृतिओं  का  विकास   नदियों   के  ही  तट  पर  हुआ,  आज  भी  सभ्यताओं  का  विकास  हो  रहा  है।  नदियों  की  बली  पर  पुल  बनाये  जा  रहें  हैं,  कारखानों  से  निकलने  वाले   विषाक्त  पदार्थ   नदियों  के   जल  को  दूषित  कर  रहें  हैं।  गंगा  नदी  सभ्यता  और  पवित्रता  का  द्योतक मान  पूजी  जाती  रही  है   पर   आज  उसकी  स्थिती  सोचनीय  हो  गई  है  अब   वह   मनुष्य  के  शोषण  का   ग्रास  बनती  जा   रही  है ।  नदियों  के   दूषित   और   अतिश्य  दोहन  के सम्बंध  में  त्रिलोचन  आपनी  कविता  में  उकेरते   हुये  कहते  हैं - 

“नदी ने  कहा था: मुझे  बाँधो

मनुष्य  ने  सुना और

उसे  बाँध  लिया

बाँधकर नदी  को

मनुष्य  दुह  रहा है

अब  वह  कामधेनु है।“ 4

                   

                   इस   तरह  नदी   का  कामधेनु   के  रुप में  शोषण  कर   मनुष्य  उसे   दुह  रहा  है।  बाज़ारवादी  संस्कृति  ने  कृत्रिम  सौंदर्य  को  बढ़ावा  देकर  नैसर्गिक  सौंदर्य को  खत्म कर  दिया है।  बाज़ारु  चकाचौंध  में   फँसा    व्यक्ति  धीरे - धीरे  प्रकृतिक  सौंदर्य  से  दूर  होता  जा  रहा  है।  इसका  सशक्त  प्रमाण  हम  आलोकधन्वा  की  ‘नदियाँ’  शीर्षक  कविता  में  देख  सकतें  हैं –

इच्छामती  और  मेघना

महानंदा

रावी  और   झेलम

गंगा, गोदावरी

नर्मदा  और  घाघरा

नाम  लेते  हुये  भी  तकलीफ  होती   है

उनसे  उतनी  ही   मुलाकात  होती  है

जितनी  वे  रास्ते  में  आ  जाती  हैं

और उस  समय  भी दिमाग कितना कम पास  जा  पाता है

दिमाग  तो  भरा  रहता  है

लुटेरों  के  बाज़ार  के  शोर  से । “ 5

 

 नदी  और  मनुष्य  के  दूर  होते  जा  रहे  सम्बंध  पर प्रशनाकुलता  व्यक्त  करते  हुये   कवि  अज्ञेय  ‘ बंधु  हैं  नदियाँ’ शीर्षक कविता में  आनेवाले  समय  में  दोनों  के  प्रति  आशंका  व्यक्त  करते  हुये कहतें  हैं –

बंधु है  नदियाँप्रकृति  भी  बंधु  है

और  क्या  जानें  कदाचित

बंधु

मानव  भी “6

 

   मनुष्य  द्वारा  स्थापित  बाज़ारु  कृत्रिम  सौंदर्य  को व्याख्यायित  करते  हुये  वीरेन   डंगवाल  ‘ दुश्चक्र में स्रष्टा’ शीर्षक  कविता  में  मानव द्वारा  प्राकृतिक  उपादानों   के  क्षरण और  उसके  दुष्परिणाम  तथा  आने   वाले  समय  में  धरती  किन – किन  समस्याओं  के   घटाटोप   में  अपने  अस्तित्व  पर अडिग  रह  पाएगी  इस  स्थिती  को  व्यक्त  करते  हुये  कवि कहते  हैं –

कारखाना? नहीं  निकली  कोई  नदी  पिछ्ले  चार - पाँच  सौ  सालों  से

जहाँ  तक  मैं  जानता  हूँ

न  बना  कोई  पहाड़  या  सामुद्र

एकाध  ज्वालामुखी  ज़रुर  फूटतें   दिखाई   दे   जाते हैं  कभी -  कभार

बाढ़े  तो  आई  खैर  भरपूरकाफी  भूकम्प

तूफान  खून  से  लबालब  हत्याकांड  अलबत्ता  हुये  खूब

खूब  अकालयुद्ध  एक  से  एक   तकनीकि  चमत्कार

रह  गई  सिर्फ  एक  सी  भूख  लगभग  एक  सी  फौजी  वर्दियाँ  जैसे

मनुष्य  मात्र  की  एकता  प्रमाणित  करने  के  लिये

एक  सी  हुंकार  हाहाकार ।“ 7

 

मनुष्य  की  चेतना  और  संवेदना   को  आधुनिकीकरण  ने   किस  प्रकार  सोख  लिया  है  इसका  उदाहरण  लीलाधर  मंडलोई की  कविता  में  देखा  जा  सकता  है‌  -

सूख  जाती  है  जिनके  मन  की  नदी

उन्हें  बचपन  की  नदी  याद  नहीं  आती “ 8

 

                मनुष्य  आधुनिकीकरण  के  नाम  पर  विकास के  इस  कगार  पर  खड़ा  हो  गया  है  जहाँ  विनास  और विकास में  कोई  फर्क  नहीं  रह  गया । आधुनिकता और औपचारिकता  में  हृदय  और  मस्तिष्क  का  फासला  बढ़ता  गया  और  नव   आधुनिकमानव  अपने  वैयक्तिक लक्ष्य  को पूरित  करने  हेतु  बाज़ारवादी  सभ्यता  का  गुलाम  बनकर  रह गया  है  चंद्रसेन  विराट  अपनी  कविता  में  मानव  को  सचेत करते  हुये  कहतें  हैं  -                

पहले   बाज़ार   को   वे   पढ़तें  हैं

माल  सस्ते  में  सिर  पे  मढ़तें  हैं

दास  उपभोग  का  बनाकर  वे

देश  में  उपनिवेश  गढ़तें  हैं

ये  है  वैश्वीकरण  की  पुरवाई

ये  उदारीकरण  की  उबकाई

आप  नाहक  ही  आँख  ढ़पतें  हैं

ये  खुलापन ? है  रम्य  नंगाई” 9

 

मनुष्य  की  इसी  विकल्पहीन  स्थिती  पर  संश्य किया जा सकता है की मनुष्य अब मनुष्यता की सीमा को लांघता जा रहा है| नदी,पेड़, पर्वत और अन्य  प्राकृतिक़ उपादान  जहां मानव मन को आह्लादित किया करते थे, प्रकृति की तरंगों  में एक स्नेहिल उच्छ्वास का आभास होता था वही अब मनुष्य की शोषक मानसिकता ने इन हृदयग्राही भावनाओं को शोख लिया है| मनुष्य की इसी नियति को देखते हुए आने वाले समय की दस्तक को व्यक्त  करते हुये  कवि  केदारनाथ  सिंह  का  कहना  है -

मैं वहाँ  पहुँच

और  डर  गया

मेरे  शहर  के  लोगों

यह  कितना  भयानक  है

कि  शहर  की  सारी  सीढ़ियाँ  मिलकर

जिस  महान   ऊँचाई  तक  जाती  हैं

वहाँ  कोई  नहीं  रहता” 10

 

जिस तरह से शहर मानव की शोषक मानसिकता के प्रतीक को व्यक्त करता है जिसके बल पर वह आगे बढ़कर विकास की अंधी दौड़ में शामिल तो होना चाहता है पर इसका अंत भी उस ऊंचाई पर होता है ज़हां कोई नहीं रहता| जहां मानव अपने द्वारा बनाई भौतिक सुख – सुविधा की दुनिया में स्वयं मृगतृष्णा की भांति भटकता रहता है|मनुष्य  द्वारा  प्राकृतिक  उपादानों  के  प्रति  निर्ममता  को  उकेरते  हुये  कवि   का  पुन:  कथन  है -

इस कोरे कागज पर तुम जो लिख रहे हो

उसमें पेड़ों की यातना भरी चुप्पी भी शामिल है” 11

 

                   वैश्वीकृत  सभ्यता  के  लक्ष्य   ने  मनुष्य को  इतने  क्रूर  समय  में  ढ़्केल  दिया  है  जिसके  तहत  वह एक  विनष्टकारी  संस्कृति  को  जन्म  दे  रहा  है  जहाँ  प्रकृतिक मनोरम  वातावरण  के  स्थान   पर  विषैली,  एक आयामी संस्कृति  का   वर्चस्व   स्थापित  होगा। कवि  विजेंद्र  का  कहना है-

कितना क्रूर समय  है

जो  सारे  पेड़

बेमौसम  निपात  हुये  हैं

और  अंदर  से  खोखले

तभी  सांझ  के  शांत   धुंधलके  में

सूखे  पत्तों  ने

चीखकर

मुझे  रोका” 12

 

उदय  प्रकाश  ‘रात  में  हारमोनियम’ शीर्षक  कविता  संग्रह  में पारिस्थितिक  असंतुलन के  अंतर्गत  प्राणियों  के  प्रति  सम्वेदना व्यक्त  करते  हुये  कहते  हैं-

गाओ

पंद्रह  हज़ार  विकलांग  और  अंधे  और  बीमार लोगों  की

जीने  की  करुण  और  दरिद्र  इच्छा  के  स्वागत में

गाओ,

जहरीले  कारखानोंपरमाणु  अस्त्रों  और  नक्षत्रों  के    खिलाफ

और  पर्यावरण  में

सिर्फ  ऑक्सीजन  और  संगीत” 13

 

         इस कविता में कवि भीमसेन जोशी को गाने की प्रेरणा देते हुए यह कहना चाहते है की उन विषयों को अपने गायन और सोच का लक्ष्य बनाया जाना चाहिए जिन विषयों पर कभी सोचा नहीं गया, उन घायल बच्चों के लिए गाया जाए जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी के दौरान जहरीले गैस के रिसाव के कारण अपनी जान से हाँथ धोना पड़ा| जहरीले कारखानों से निकलने वाली विनाशकारी गैसों का रिसाव किस तरह से पर्यावरण को दूषित कर रहा है किस तरह से परमाणु बम का आविष्कार कर सम्पूर्ण मानव जाति  के अस्तित्व को ही संकट में डाल रहें हैं| इस सम्पूर्ण कविता में कवि पारिस्थितिकीय विमर्श के बीज  को हम सबके मन में  रोपते हुए हमें सजग करना चाहते हैं|

                समग्रत:  कहा  जा  सकता  है  कि  रचनाशीलता  व्यक्ति  का  व्यक्तिगत  गुण  होकर  भी निर्वैयक्तिक  रुप  से  जनता की  पक्षधरता  को  प्रेषित  करता  है। अपने  इन्हीं  गुणों  को  आत्मसात  करते  हुये  उपरोक्त  रचनाकरों  ने  समय  के  बदलते  रुख  और  हवा  की  बदलती भंगीमा को  सामान्य  जन  के  समक्ष  लक्षित  करते  हुये  भविष्य  में  होने  वाले  संकटों  से  रुबरु  कराया  है।   विकास की  अंधी  दौड़  में  मनुष्य  उन्नति   के   शीर्ष  पर  पहुँच  जाना चाहता  है  पर  उसकी  यह   भंगीमा  उसे  कितना  नीचे  ढ़केल रही  है  जहाँ  कोरी  बौध्दिकता  का  तो  बोलबाला है  पर  हृदय और  सम्वेदना  का  कोमल  बिंदु  शिक्त  हो  चला  है। शायद, मनुष्य  की  इसी  नियती  को  कामायनीकार  जयशंकर  प्रसाद  ने अपने  समय  में  ही  आने  वाले  समय  को  भाँप  लिया  था जिसका  प्रमाण  कामायनी  की  इन  पंक्तियों  में  द्रष्टव्य  है -

किंतु  बढ़ता  गया  मस्तिष्क  ही  नि:शेष

छूट  कर  पीछे  गया  है  रह  हृदय  का  देश” 14

 

अत: आवश्यक  है  आने  वाले  समय  को  आज  से  बेहतर बनाने  के  लिये  मनुष्य  अपने  हृदय  को  उन्मुक्त  कर प्राकृतिक  उपादानों  के  प्रति  उदात्त  दृष्टिकोण  अपनाये।  भौतिक  सुख – सुविधाओं  के  लोभ  में  वन,  नदियों,  अन्य प्राकृतिक  उपादानों,  पशु -  पक्षियों  का  अतिश्य  दोहन  ना  करे।                 

 

संदर्भ सूची:

  1. वनजा, के, साहित्य का  पारिस्थितिक दर्शन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली – 110002,  प्रथम  संस्करण- 2011,  पृष्ठ संख्या- 44
  2. www. Kavita kosh.org
  3. वही
  4. वनजा, के, साहित्य का पारिस्थितिक दर्शन,  वाणी  प्रकाशन, नयी दिल्ली- 110002,  प्रथम  संस्करण- 2011, पृष्ठ संख्या - 48   
  5. www. Kavita kosh.org
  6. वही
  7. वही
  8. वही
  9. के. पी., प्रमीला, स्त्री  अस्मिता  और  समकालीन  कविता, समयिक  बुक्स, नई  दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण – 2011, पृष्ठ संख्या – 70
  10. सहाय, निरंजन, केदारनाथ सिंह और उनका समय, शिल्पायन पब्लिशर्स एण्ड  डिस्ट्रीब्यूटर्स,  नयी  दिल्ली- 110032 संस्करण - 2008, पृष्ठ संख्या - 24
  11. वही- पृष्ठ संख्या- 42
  12. के. पी., प्रमीला, स्त्री अस्मिता और समकालीन कविता, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली- 110002, प्रथम संस्करण- 2011, पृष्ठ संख्या – 60
  13. प्रकाश, उदय,  रात  में  हारमोनियम, नई दिल्ली – 11002, प्रथम संस्करण - 1998,  पृष्ठ  संख्या- 87
  14. www. Kavita kosh.org