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‘बस्ती’ में हम, हमारे भीतर बस्ती, कितना बसती हैं (इंतजार हुसैन के ‘बस्ती’ उपन्यास के संदर्भ में)

 ‘बस्ती’ में हम, हमारे भीतर बस्ती, कितना बसती हैं

(इंतजार हुसैन के ‘बस्ती’ उपन्यास के संदर्भ में)

पूजा मदान

पीएच. डी. हिन्दी शोधार्थी

गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय

 


व्यक्ति से ही समाज बनता है और समाज से ही व्यक्ति का निर्माण होता है। हम जिस समाज में रहते हैं वह एक बस्ती रूपी समाज है। जब व्यक्तियों में एक-दूसरे के प्रति समता और प्रेम का भाव होता है तो एक छोटी सी बस्ती भी विस्तृत होने लगती है। यदि एक दूसरे के प्रति ईर्षा, द्वेष की भावना लोगों में हो तो एक बड़ी विस्तृत बस्ती भी संकुचित होने लगती है। कुछ इसी प्रकार के चित्रों के माध्यम से इंतजार हुसैन अपने उपन्यास ‘बस्ती’ से बस्ती को व्याख्यायित करते हैं। ‘बस्ती’ उपन्यास के माध्यम से इंतजार हुसैन ने एक ऐसा जगत रचने की कोशिश की है जो सामान्यतः उपन्यासों की बस्ती से बिलकुल भिन्न है। बस्ती में हम नहीं बल्कि हमारे भीतर ‘बस्ती’ बसती है। आज के समय में बस्ती हमारे मन, हृदय से हर समय हर रोज दूर होती जा रही है। आखिर ऐसा क्या कारण है कि हम अपने द्वारा बसाई हुई बस्ती से निरंतर बाहर होते जा रहे है ? एक-दूसरे के प्रति अलगाव क्यों बढ़ता जा रहा है ? किन कारणों और परिस्थितियों के चलते किसी अन्य स्थान पर जाकर मजबूरन जीवन जीना पड़ता है ? अगर इन सभी चीजों पर गौर किया जाए तो हम अपने सम्मुख पाते हैं कि बस्ती में न तो हम बसते हैं और न ही बस्ती हमारे भीतर बसती है। विभाजन, विस्थापन और सांप्रदायिकता ने व्यक्ति हृदय को बदलकर रख दिया है। अब वे भावनाएँ और संवेदनाएँ नहीं रही जो एक इंसान की दूसरे के प्रति रहती थी। साफ तौर पर कहा जाए तो आज के दौर में इंसानियत खत्म होती जा रही है।

उपन्यास की भाव शैली भारत और पाकिस्तान की संवेदनशील कथा वस्तु को हमारे समक्ष रखती है। इंतजार हुसैन ने बस्ती में केवल भारत-पाकिस्तान का विभाजन ही नहीं दर्शाया है अपितु उन्होंने दो समुदायों (हिन्दू-मुस्लिम) के बंटवारे को दिखाया है जिनके जीवन का विकास समावेशी रूप से 5 शताब्दियों से चला आ रहा था। इंतजार हुसैन यह भली भांति जानते हैं कि मजहब के नाम पर एक दूसरे को छोटा बड़ा कहना विभाजन के बाद की स्थिति है। इंतजार हुसैन उतने ही संवेदनशील थे जितनी बस्ती की कथा वस्तु। यही कारण है कि बस्ती में इंतजार हुसैन अपनी जड़ों की ओर वापसी के संकेत देते हैं बल्कि हिन्दी साहित्य में ठीक इसके विपरित मोहभंग की स्थिति चलती है और साम्प्रदायिकता का जन्म होता है। इंतजार हुसैन के बस्ती में अपनी संस्कृति और अस्मिता को बचाने की जद्दोजहद निरंतर चलती है। इस जद्दोजहद की निरंतरता में सांस्कृतिक मिथक, जातक कथाएँ और लोक कथाएँ आधार बनकर सामने आती हैं। उपन्यास में तत्कालीन राजसत्ता की काली छाया को नकारा नहीं जा सकता और एक बौद्धिक तबका भी यहाँ शांत नजर आता है। इंतजार हुसैन अपने उपन्यास बस्ती में कुछ इसी तरह के देश विभाजन और व्यक्ति विभाजन को दिखाने का प्रयास करते हैं। इसमें समय और स्थान विशेष की मुख्य भूमिका रही है जो किसी भी उपन्यास की महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है।  उपन्यास का पूरा कथानक वर्तमान और फ्लेशबैक की पद्धति में ही दिखाया गया है।

सन् 1947 में जब देश आजाद हुआ था तभी धीरे-धीरे लोगों में विभाजन के बीज पनपने लगे और देश का बंटवारा हो गया। इस विभाजन के कारण कितने साम्प्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों में कितने हजारों-लाखों बच्चे, बुजुर्ग और महिलायें शिकार बनी। एक देश या एक बस्ती देखते ही देखते दो देशों में बंटकर रह गया। अपने घर से दूर होने के कारण बुजुर्ग किस तरह से अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रहे हैं और अपनी कब्रें अपनी ही धरती पर बनवाने की मांग करते हैं। यह विभाजन दो देशों का नहीं बल्कि दो संस्कृतियों और सभ्यताओं का विभाजन है।

इंतजार हुसैन ने भी विभाजन के इस दंश को भोगा तथा महसूसा था। ऐसे में उनका ‘बस्ती’ लिखना बड़ा ही क्रांतिकारी प्रतीत होता है। स्मृति तथा स्वप्न के बीच में यह बस्ती है। इसके सभी पात्र दोनों के मध्य झूल रहे हैं। उपन्यास की शुरुआत लेखक के बचपन से होती है। बचपन जितना मीठा होता है उतने ही सवालों से भरा रहता है। पंचतन्त्र और लोक से संबंधित ढेरों कहानियाँ बचपन की स्मृति के माध्यम से ही जिन्दा रहती हैं। भगत जी बच्चों की जिज्ञासाओं के अनुसार कहानी सुनाते है- “शेष ने धरती में एक छेद देखा। वा में सटक गया। धरती तले पहुँच के फन फैलाया और धरती को फन पे टिका लिया। कछवे ने देखा तो वा को चिंता हुई....वा ने शेष की पूंछ तले जाके सहारा दिया। ....शेष जी कछवे की पीठ पे टिके हुए है। जब कछवा हिले है तो शेषजी हिलते है। जब शेषजी हिलते है तो धरती हिले है और भूचाल आवे है।”1  बाल-मन की मनोवृतियाँ कितनी प्रफुल्लित करने वाली होती है। उनके प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अनेकों कथा-कहानियों को माध्यम बनाया जाता है। लेकिन फिर भी बच्चों की जिज्ञासाओं का कभी अंत नही होता क्योंकि जिज्ञासाएँ अंतहीन होती है। हाथी पहले उड़ा करते थे ...| इस तरह के ऐसे ढेरों प्रश्न बच्चों की सहज मनोवृति का परिचय देते प्रतीत होते हैं।

उपन्यास में बार-बार जंगल का आना उन सभी यादों का आना हैं जो विभाजन के कारण बिछुड़ गई है। समय बदलता है, स्थान बदलता है और लोग बदलते हैं। लेकिन व्यक्ति की यादें ही उसके साथ रहती है। अपनी यादों के सहारे ही वह अपने बीते अच्छे-बुरे दिनों को याद करता है। यह जंगल हर जगह अलग-अलग अर्थों में प्रकट हुआ है। कभी यादों के रूप में, कभी बस्ती के रूप में, तो कभी लोगों के रूप में। लेखक ने यादों का बड़ा पुंज यहाँ पर प्रस्तुत किया है- “यादे एक के साथ दूसरी, दूसरी के साथ तीसरी उलझी हुई, जैसे आदमी जंगल में चल रहा हो। मेरी यादें मेरा जंगल हैं। आखिर यह जंगल शुरू कहाँ से होता है ? ....मैं कहाँ से शुरू होता हूँ ?”2 अपनी यादों के माध्यम से वह (कौन) अपने स्व (अस्तित्व) की तलाश कर रहा है कि आखिर मैं कहाँ से शुरू होता हूँ अर्थात मेरी जड़ें कहाँ से शुरू और कहाँ पर खत्म होती है। कुछ इसी तरह की पहचान मुक्तिबोध भी अपनी कविता ‘अँधेरे में’ दिखाते हैं। उनकी कविता की प्रत्येक पंक्ति आज के हर उस व्यक्ति को जगाती है जो अपने ही पहचान को लेकर दिन रात अंधेरों में चक्कर लगाता रहता है।

उपन्यास की सारी घटनाएँ विभाजन के कारण ही घटती है। इस विभाजन ने लोगों को अपनी ही बस्ती और देश से अलग कर दिया है। चारों तरफ साम्प्रदायिक हिंसा, लूटमार बढ़ गई है। इस साम्प्रदायिकता ने लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। लाखों-करोड़ों लोगों को अपने ही घरों से बेघर होना पड़ा। इंतजार हुसैन बस्ती के कुछ ऐसे ही रंग रूप को दिखाते हैं- “जब सुबह हुई तो बस्ती का रंग ही और था।...कोई कोई दुकान खुली थी, बाक़ी सब बन्द। कुछ घरों में ताले पड़ गये थे, कुछ में पड़ रहे थे।....लोग जा रहे थे, नगर खाली हो रहा था। नगर दो तरह से खाली हुआ..  कुछ नगर से निकल गये, कुछ दुनिया से गुजर गये।”3 वर्तमान समय में भी ढेरों ऐसी घटनाएँ घट रही है जिनमें धर्म, जाति, आरक्षण को प्रमुख मुद्दा बनाया जाता है। इस तरह के ये दंगे यूँ ही नहीं प्रज्वलित होते बल्कि इनके पीछे एक बड़ी राजनीतिक प्रक्रिया चल रही होती है।

उपन्यास में लेखक ने सभी घटनाओं के चलते प्रेम के प्रसंग को भी बड़ी सजीवता से चित्रित किया है। प्रेम की लहर का बार-बार उठना मानवीय स्वभाव की सहज मनोवृत्ति का प्रतीक है। जाकिर और साबिरा द्वारा प्रेम की कब्रों का निर्मित किया जाना उनके निश्चल प्रेम को प्रस्तुत करता है। उनका यह प्रेम आदि से अंत (विभाजन से पूर्व और विभाजन के पश्चात् ) तक बना रहता है। दोनों के निश्चल प्रेम को लेखक ने कुछ इस तरह से चित्रित किया है-“उसने अपना पाँव बढ़ाया और साबिरा की कब्र में खिसका दिया। फिर दिल-ही- दिल में कायल हुआ की सब्बो सच कहती है। और अपना पाँव देर तक उस नर्म-गर्म कब्र में रखे रहा।”4  लेखक ने दोनों के प्रेम की शुरुआत मिट्टी में कब्र बनाने के खेल के माध्यम से की है। कब्र बनाते हुए दोनों के हृदय में प्रेम का संचार होता है। उनके इस प्रेम के प्रतीक लैला-मजनू बनते हैं।

इंतजार हुसैन ने युवा पुनर्वास और वृद्धों के पुनर्वास के दो आधार बताये है। युवाओं के पुनर्वास को राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना के रूप में दिखाया गया है। जबकि वृद्धों का पुनर्वास ऐसी प्रक्रिया में नए राष्ट्र का निर्माण करना नहीं बल्कि अपने पुराने राष्ट्र का खंडित होना है। अफ़जल के माध्यम से दिखाया भी गया है कि अपने देश को छोड़ने का कितना बड़ा आघात अम्मी के हृदय पर पड़ता है- “कोयल की आवाज़ अम्मी ने सुनी तो अजब तरह चौंकी, “ऐ है। कोयल बोल रही है। फिर बिलकुल चुप हो गई। कान कोयल की आवाज़ पर लगे हुए। और फिर मैंने देखा कि उनकी आँखें भीगने लगी है।”5  अम्मी का कोयल की आवाज सुनकर भावुक होना अपनी बस्ती के प्रति लगाव को दिखाता है। यह सिर्फ़ एक कोयल का बोलना मात्र नहीं है बल्कि कोयल के माध्यम से हजारों स्मृतियों का बोलना है।

              लेखक उपन्यास के माध्यम से कहते हैं कि पूरी मानवता बैठिकाना हो चुकी है। अर्थात् लोगों में मानवीय मूल्यों का अन्त हो गया है। भाई-भाई के खून का प्यासा बना हुआ है, खून सफ़ेद हो गया है अर्थात् रिश्ते बैरंगे हो चुके हैं। उपन्यास में फ़क़ीर(पात्र) ने एक कथा को आधार बनाकर दिखाया है कि किस तरह जमीन-जायदाद को लेकर भाई-भाई के खून का प्यासा बना हुआ है- “जब दौलत का बँटवारा करने बैठे तो बाप की वसीयत को भूल गये और अपने अपने हक से ज्यादा माँगने लगे। इस पर झगडा हुआ।.....बड़े ने गुस्सेली आँखों से छोटे को देखा और बददुआ के लहजे में कहा कि तू कछुआ है। छोटे ने नफरत से बड़े को देखा और बददुआ के लहजे में कहा कि तू बदमस्त हाथी है।...तब से दोनों गुस्से में दीवाने हो रहे हैं और लड़ रहे हैं।”6  भारत-पाकिस्तान विभाजन के पश्चात् सम्पूर्ण मानवता शून्य में चली गई है। हिन्दू-मुस्लिम जो कल तक भाई-भाई थे और एक ही बस्ती रूपी घर में अपने  सारे त्यौहार रल-मिलकर मनाते थे। इस बंटवारे से एक दूसरे के दुश्मन बनकर बैठ गये जो अमानवीयता का सबसे बड़ा उदाहरण पेश करता है।

यह उपन्यास आज के आधुनिक राष्ट्रवादी समाज के समकक्ष खड़ा होता है। उपन्यास के युवा पात्रों (अफजाल, इरफान, जाकिर, जब्बार) के समान ही आज का युवा वर्ग अपने कल्पित राष्ट्र की मांग करता है। युवा वर्ग इंकलाब और जंग को ही अपने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपनाता है क्योंकि उनका मानना है कि जब तक क्रांति होगी तब तक एक आदर्श समाज, राष्ट्र या फिर बस्ती निर्मित नहीं की जा सकती। उपन्यास में भी जंग की यह स्थिति स्पष्ट देखी जा सकती है- “नए ज़मानों की जंगों का एक नुकसान यह है कि वे इमारतों को महान नहीं बनने देती। ऊँची-ऊँची इमारतें पुरानी नहीं होने पातीं कि कोई जंग छिड़ जाती  है।”7

शिल्प की दृष्टि से यदि हम उपन्यास को देखें तो भाषा अत्यंत कलिष्ट दिखलाई पड़ती है किन्तु आजादी पूर्व के भारत की हिन्दुस्तानी भाषा की महक यह जरूर याद दिलाता है। उर्दू के साथ ही लोक की बोली का भी प्रयोग उपन्यासकार ने बखूबी से किया है। भाषा में प्रतीकात्मक और बिम्बात्मक शैली सम्पूर्ण उपन्यास को एक नया स्वरूप प्रदान करती है। जैसे- बंदरो का मरना, चूहों का मरना, बाढ़ का आना, जंगल का आना आदि प्रयोग स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।   

अतः इंतजार हुसैन का यह उपन्यास हमें हर पल हर क्षण सोचने पर मजबूर करता है कि यह विभाजन दो देशों या राष्ट्रों के निर्माण की प्रक्रिया का था या फिर लोगों के हृदय और भावनाओं का विभाजन। इससे ज्ञात होता है कि बस्ती में हम और हमारे भीतर बस्ती कितना बसती है।

 

 

संदर्भ सूची:-

  1. र. हुसैन इंतजार तथा अनु.नम्रता वर्मन,अब्दुल मुगनी, बस्ती, राधा कृष्ण प्रकाशन दिल्ली, संस्करण-1982, पृष्ठ संख्या-10
  2. वही पृष्ठ संख्या-14
  3. वही पृष्ठ संख्या-17
  4. वही पृष्ठ संख्या-31
  5. वही पृष्ठ संख्या-92
  6. वही पृष्ठ संख्या-160
  7. वही पृष्ठ संख्या-152