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फणीश्वरनाथ रेणु की कविताओं में व्यंग्य और विडंबना

फणीश्वरनाथ रेणु की कविताओं में व्यंग्य और विडंबना

लल्टू कुमार

शोधार्थी, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय,

Mob – 9868330823

 


रेणु की कविताओं में व्यंग्य और विडंबना को जानने से पहले, व्यंग्य और विडंबना के मूल अर्थ को जान लेना जरूरी है। डॉ. हरदेव बाहरी के अनुसार व्यंग्य के दो मूल अर्थ होते है। पहला – शब्द की व्यंजना शक्ति द्वारा निकला अर्थ अर्थात् गूढ़ार्थ, दूसरा – ताना। उसी तरह विडंबना के पांच मूल अर्थ होते है – 1.नकल करना, 2.चिढ़ाना, 3.निंदा करना, 4.छलना, 5.उपहास का विषय।

रेणु का रचनासंसार व्यंग्य और विडंबनाओं से भरा पड़ा है। उनकी कविताओं में भी व्यंग्य और विडंबना का अर्थपूर्ण प्रयोग मिलता है। मैं सिर्फ रेणु की कविताओं में व्यंग्य और विडंबना की तलाश तथा उनकी सार्थकता को लेकर अपना विचार रखूंगा।

रेणु की कविताओं में ‘व्यंग्य और विडंबना’ का प्रमुख स्थान है। उनकी कविताओं में ज्यादातर राजनीतिक व्यंग्य और विडंबना दिखलाई पड़ता है। रेणु एक सामाजिक - राजनीतिक कार्यकर्ता थे। और उन्हीं मूल्यों को लेकर साहित्य संसार में आये थे। उनकी कविताओं में भी वे मूल्य अपने उसी तेवर और तीक्ष्णता के साथ मौजूद है जिस तरह उनके कथा साहित्य में दिखलाई पड़ता है।

रेणु की कविता ‘अपने जिले की मिट्टी से’ में यह विडंबना देखिये जो उनके जीवन में गहरे धसी हुई मालूम पड़ती है –

मरी मिट्टी कि जिसमें –

हजारों युवतियों ने मांग के सिंदूर बोए

बहनों ने अस्मत और ईमान बोए

उगा जिस दिन हमारे देश का आजाद पौधा

उसी दिन मर गई मिट्टी

कहो यह व्यंग्य कैसा?”  (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं.-23)

 

यहां रेणु पाठकों का ध्यान उस सच्चाई की तरफ खींचना चाहते है जिसकी आड़ में इतना बड़ा जन-संहार करवाया जा रहा है। दोस्तों! यह बहुत बड़ी विडंबना है कि जहाँ कल तक जिसके कंधे-से-कंधा मिलाकर इस गुलामी के खिलाफ लड़ रहे थे, आज उन्हीं के खून के प्यासे हो चले है| आखिर हमें क्या हो गया है? जो अपने ही भाइयों के खिलाफ़ तलवार खींचे बैठे है। ये पंक्तियां इसी विडंबना पूर्ण सच्चाई पर से पर्दा उठाती है।

इसी कविता में देश के तथाकथित ‘राष्ट्र भक्तों’ पर जो तीखा व्यंग्य है उसे देखिए –

बला से जलजला आए

बवंडर-बिजलियां-तूफां हजारों जुल्म ढाएं

अगर जिंदी रही तू

फिर न परवा है किसी की

नहीं है सिर पे गो-के स्याह-टोपी

नहीं हूं प्राण हिंदूतो हुआ क्या?

घुमाता हूं नहीं मैं रोज डंडे-लाठियां तो!

सुनाता हूं नहीं –

गांधी-जवाहर, पूज्यजन को गलियां तो!

सिर्फ हिंदीरहा मैं

सिर्फ जिंदी रही तू

और हमने सब किया अब तक ! (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं.-22)

 

यहां रेणु का संकेत स्पष्ट हैं कि जो लोग ‘राष्ट्रभक्त’ होने का ढ़िंढ़ोरा पीटते है, वे लोग ‘राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर कौन सा कुकृत्य कर रहे है। क्या ‘राष्ट्रभक्ति’ का मतलब यही है?  जो पूरे देश में हर-गली चौराहे-नूक्कड़ो पर हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लोगों को आपस में बांटकर करवाया जा रहा है?

‘इमर्जेंसी’ नामक कविता में रेणु अस्पताल के इमर्जेंसी वार्ड के बहाने इतिहास का ‘काला समय’ अर्थात् ‘इमर्जेंसी’ का भंडाफोड़ करते है। इस कविता में रेणु ‘इमर्जेंसी’ के कारण परेशान लोगों की जिंदगी को लेकर इमर्जेंसी की हालात पर तीखा व्यंग्य करते हुए लिखते है –

ईथरकी गंध में

ऊंघती जिंदगी

रोज का यह सवाल, कहिए! अब कैसे है?

रोज का यह जवाब – ठीक हूं! सिर्फ कमजोरी

थोड़ी खांसी और तनिक-सा... यहां पर ...मीठा-मीठा दर्द!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं.-38)

इस कविता में रेणु इमर्जेंसी की आड़ में इंदिरा के शासन व्यवस्था की भयावहता का पर्दाफास करते हैं –

हर वार्ड में बारहों मास

हर रात रोती काली बिल्ली

हर दिन

प्रयोगशाला से बाहर फेंकी हुई

रक्तरंजित सुफेद

खरगोश की लाश

सैलाइन और रक्त की

बोतलों में कैद जिंदगी!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं.-37/38)

 

‘इमर्जेंसी’ की आड़ में जो खूनी खेल इंदिरा खेल रही थी वह एक विडंबना पूर्ण स्थिति है। जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही जनता के सर पे बैठ कर ऐसा तांडव कर रहा हो इससे बढ़कर दुखद और बिडंबनापूर्ण किसी देश कि जनता के लिए और क्या हो सकती है?

‘एक संभाव्य भूमिका’ में रेणु तत्कालीन जीते हुए प्रतिनिधियों अर्थात् कांग्रेसियों पर जो व्यंग्य वाण छोड़ते है वो देखिये

आपने दस वर्ष हमें और दिए                                      

बड़ी अनुकंपा की

हम नतशिर है!

हममें तो आस्था है! कृतज्ञ होते

हमें डर नहीं लगता कि उखड़ न जाएं कहीं!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं.-57)

इसी में आगे लिखते है –

बुद्ध :ईसा:दूर हैं

जिसका थपेड़ा हमको न लगे वह

कैसा इतिहास है?

ठीक है!

आपका जो गांधीयनसत्य है

उसका क्या यही सात-आठ वर्ष पहले

गांधी पहचानते थे?” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं.- 58)

 

जिस तरह से नेता लोग चुनाव जीतने के बाद जनता को धन्यावाद देते है। और 5 साल तक उनकी सेवा करने का वादा करते है। उसके बाद 5 साल में एक बार भी क्षेत्र में नजर नहीं आते। ये पंक्तियां आनायास ही उसकी तरफ हमारा ध्यान खिंच ले जाती है। आगे की पंक्तियों में बुद्ध और ईसा के जीवन मूल्यों का जिस तरह से अंत होता है उसकी तरफ संकेत है। अंत में रेणु जनता के सेवकों अर्थात् कांग्रेसियों से उनके ‘गांधीयन’ सत्य के बारे में पूछते है? कहना न होगा कि जिस तरह से गांधी के मूल्यों की हत्या ये नेता लोग आनेवाले दिनों में किये हैं वह इन पंक्तियों के सहारे स्मरण हो आती है। यह वर्तमान गांधीवादियों पर तीखा व्यंग्य है। इस कविता में रेणु ने बुद्ध और ईसा के जीवन मूल्यों की विडंबना पूर्ण परिणति की तरफ भी संकेत किया है

‘मालिक! आज माफ करो!’ कविता में रेणु खेतिहर मजदूर की आर्थिक और सामाजिक दशा का वर्णन करते है। इस कविता में एक मजदूर के माध्यम से रेणु संभ्रात वर्ग की स्त्रियों कि लोलुपता को लेकर मिथकों के जरिये तीखा व्यंग्य करते है।

बाबा रामचंदर

भगवान थे

हमदास है; सेवक हैं

हमारी स्त्रियां सोने के हिरण

की खाल खिंचवाकर

नहीं मंगवाएंगी।” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 64)

इसी कविता में मजदूर की विंडबना पूर्ण जीवन-स्थिति का भी वर्णन मिलता है

दो – जीवा हैं

बेचारी के मन में

मछली-भात खाने की साध है।

डेढ़ सेर चावल घर में है

पिछवाड़े में कद्दू!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 64)

 

‘सुंदरियो!’ कविता में रेणु आदिवासी समाज की सभ्यता-संस्कृति की तरफ संकेत करते हुए सभ्य समाज के पुरुषों की काम-वासना को लेकर तीखा व्यंग्य करते है –

सुंदरियों, जी खोलकर

हंसकर मत मोतियों

की वर्षा करना

काम-पीड़ित इस भले आदमी को

विष-भरी हंसी से जलाओ!

यों, आदमी यह अच्छा है

नाच देखना

सीखना चाहता है!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 67)

 

‘यों, आदमी यह अच्छा है/ नाच देखना/ सीखना चाहता है!’ इन पंक्तियों के अर्थ स्पष्ट है। कवि उस व्यक्ति की अच्छाई के मुखौटे का पर्दाफाश करते हैं।

‘मेरा मीत सनीचर!’कविता में ग्रामीण-जीवन की विडंबना पूर्ण स्थिति का वर्णन देखिए –

नाटक से फिर बात दीन-दुनिया की ओर मुड़ी तो

उसके मुखड़े पर छन-भर मायूसी फैल गई थी

लंबी सांस छोड़ बोला था, सब फांकी1है यार

सभी चीज़ में यहां मिलावट. खांटी2कहीं नहीं है

कुछ भी नहीं पियोर3 प्यार भी खोटा ही चलता है

गांवों में भी अब विलायती मुर्गी बोल रही है!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 74)

  

  1. धोखा 2. शुद्ध 3. प्योर

इसकी अंतिम पंक्ति ‘गांवों में भी अब विलायती मुर्गी बोल रही है’ एक व्यंग्यात्मक पंक्ति है। इसके जरिये रेणु विदेशी लड़कियों से गांव के जमींदार लोग जो शादी किये हैं उसकी तरफ संकेत करते है।

‘खड्गहस्त’ कविता में रेणु समाज के शोषक वर्ग को ललकारते हुए उस पर व्यंग्य वाण छोड़ते है –“रक्खो अपना धरम-नियम अब

अर्थशास्त्र, कानून ग़लत सब

डोल रही है नींव तुम्हारी

वर्ग हमारा जाग चुका अब

हमें बसाना है फिर से अपना उजड़ा संसार

दे दो हमें अन्न मुट्ठी-भर औ थोड़ा-सा प्यार!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 87)

यहां दे दो हमें अन्न मुट्ठी-भर औ थोड़ा-सा प्यार!’  पंक्ति का व्यंग्य स्पष्ट है।

 

इस कविता में सर्वहारा वर्ग की विंडबना-पूर्ण जीवन स्थिति को उजागर करने वाली कुछ पंक्तियां देखिए –

“श्रम-बल और दिमाग खपावें

तुम भोगो, हम भिक्षा पावें

जाति-धर्म-धन के पचड़े में

प्यार नहीं हम करने पावें

मुंह की रोटी, मन की रानी, छिन बने सरदार!” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 87)

 

यहां रेणु सर्वहारा वर्ग की जीवन दशा की तरफ संकेत करते है। वह दिन-रात मेहनत करता है, फिर भी उनके जीवन की सच्चाई यही है कि – उसे दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होता। उसे जाति-धर्म के बंधनों में इस कदर जकड़ दिया गया है कि वह उस बंधन को तोड़ने में असमर्थ है। यह एक विडंबना पूर्ण सच्चाई है जिसने उनके जीवन को नरक बना के छोड़ दिया है।

‘मिनिस्टर मंगरू’ कविता में देश के भ्रष्टाचारी नेताओं की स्थिति को बतलाया गया है। कांग्रेस का टिकट पाकर किस तरह के लोग चुनाव जीतकर मंत्री हो गये है यह कविता उस सच्चाई की तरफ संकेत करती है। और यही सच्चाई इस राजनीति तंत्र की विडंबना है|

‘मंगरू मियां के नए जोगीड़े’ कविता में रेणु कांग्रेसी नेताओं पर तीखा व्यंग्य करते हैं। और नेताओं के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की तरफ संकेत भी करते है।

एक रात में महल बनाया, दूसरे दिन फुलवारी

तीसरी रात में मोटर मारा, जिनगी सुफल हमारी

जोगीजी एक बात में, जोगी जी एक बात में,

जोगीजी भेद बताना, जोगी जी कैसे-कैसे?” (कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 96)

 

यह पूरी कविता कांग्रेसी नेताओं पर व्यंग्य है और राजनीतिक तंत्र की विडंबनाओं से भरा पड़ा है। इन पंक्तियों में देश की विडंवना पूर्ण स्थिति को देखिए –

कांग्रेस का टिकट कटाया बनकर खद्दरधारी

मोरंग की सीमा पर हमने रात में पलथी मारी

जोगीजी स-र-र

गांव-गांव में किला बनाया, मुखिया-मुखिया मेरे सिपाही

चीनी और किरासन मेरे, होगी जीत हमारी

जोगीजी सर-र-र.......(कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 96/97)

 

इसी कविता में व्यंग्य की ये पंक्तियां देखिये –

खादी पहनो, चांदी काटो, रहे हाथ में झोली

दिन दहाड़े करो डकैती, बोल सुराजी बोली

जोगीजी सर-र-र.......(कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 98)

 

पंडित जवाहरलाल नेहरू के शासन व्यवस्था के विडंबना पूर्ण हालात की तरफ ये पंक्तिया संकेत करती है। इसी कविता में आगे नेहरू और पटेल पर व्यंग्य देखिए –

भूखी नंगी जनता रोवे – जनता रोवे

नेहरू रोपत पियाज

जमींदरवन के पीठ ठोकि के पोंसे

पटेल सरदार।(कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 100)

 

शासन व्यवस्था की लचर स्थिति पर ये व्यंग्य भी देखिए –

पूंजी-पतियन के पांचों अंगुलियां – पांचो अंगुलियां

नेशनल घी में आज

महंगी के चक्की में पिसल मुलुकवा

मिल मालिकन के राज।(कवि रेणु कहे, पृष्ठ सं. – 100)

 

नेहरू और उनके मंत्री मंडल के सदस्य किस तरह मील-मालिकों और पूंजीपतियों के इशारे पर काम करते थे यह कविता उसकी तरफ संकेत करती है। यह एक तीखा व्यंग्य है। और आज के समय में प्रासंगिक भी है।

रेणु की कविताओं को पढ़ते वक्त ऐसा मालूम पड़ता है कि वह आज के सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों में भी उतनी ही सटीक बैठती है। जितनी अपने समय में थी।