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‘पुराने घर का चाँद’ (उर्दू से हिन्दी में अनूदित) में वृद्धावस्था की अभिव्यक्ति

‘पुराने घर का चाँद’ (उर्दू से हिन्दी में अनूदित) में वृद्धावस्था की अभिव्यक्ति

                                     निक्की कुमारी,

पीएचडी हिन्दी,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

                                                     Gmail: meel.nikki999@gmail.com

                                                         मोबाइल न. 8802443709

           


 

हमारे देश की संस्कृति बहुरंगी है और यहाँ अनेक भाषा परिवार के लोग रहते हैं। प्रत्येक भाषा का अपना साहित्य है और उसकी अपनी महत्ता है। किसी भी रचना के माध्यम से रचनाकार की अपने परिवेश के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त होती है। अनुवाद के माध्यम से हम विभिन्न भाषाओं में लिखित साहित्य का अध्ययन करके वहाँ के परिवेश से अवगत हो सकते हैं। अनुवाद साहित्य दो संस्कृतियों, देशों, राज्यों एवं विचारधाराओं के बीच सेतु बंध का काम करता है। अनुवाद हमें एकात्मकता एवं वैश्वीकरण की भावनाओं से ओत-प्रोत करता है। अनुवाद की मूल समस्या है कि अनुवादक अनुवाद करते समय प्राय: शब्दानुवाद करते चले जाते हैं, जबकि साहित्य में विचार की बजाय भाव, कल्पना व अनुभूति की महत्ता अधिक होती है। लेखक व अनुवादक अलग-अलग होने पर अनुवादक लेखक के भाव, विचार व अनुभूति को सहज रूप में अभिवक्त नहीं कर पाते हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘पुराने घर का चाँद’ (२०११ ई.) जो कि उर्दू से हिंदी में अनूदित है, के लेखक व अनुवादक सग़ीर रहमानी है और लेखक व अनुवादक एक ही व्यक्ति होने के कारण यह अनुवाद अधिक उम्दा व पाठकों को प्रभावित करने वाला है।

प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘पुराने घर का चाँद’ में चुन्निदा तीन कहानियों ‘मर तू बाबा’, ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओं’ और शीर्षक कहानी ‘पुराने घर का चाँद’ में कहानीकार सग़ीर रहमानी की दृष्टि भारतीय सामाजिक संरचना में आये एक बड़े भारी बदलाव की ओर गई है और वह है, परिवार में वृद्धावस्था की समस्या। वैश्विक स्तर पर वृद्धावस्था की समस्या एक विकराल रूप धारण करती जा रही है। बेहतर जीवन स्थितियों ने मनुष्य की आयु तो बढ़ायी है किन्तु उसके साथ ही बढ़ा है एकाकीपन का दंश जो उन्हें निरन्तर अपनी असहायता और निरूपायता का बोध कराता है। प्रस्तुत अनूदित कहानियों के माध्यम से हम उर्दू साहित्य में वृद्धों की स्थिति व उनकी साहित्य व समाज में उपस्थिति का विश्लेषण कर उनका मूल्यांकन कर सकते हैं। आमतौर पर हम देखते हैं कि उर्दू शायरी व गजलें भारतीय पाठकों में काफी लोकप्रिय है लेकिन अफ़सानों की पहुँच आम जनता तक अपेक्षाकृत कम है और इसका मूल कारण उर्दू भाषा ज्ञान का अभाव कहा जा सकता है। अनुवाद के माध्यम से उर्दू अफ़सानों की पहुँच भी आम जन तक सुलभ हो पाई है।

वृद्धजन आयु आधारित ऐसा सामाजिक समूह है जो देश के नीति निर्माताओं की नीतियों तथा समाजशास्त्रियों के विमर्शों में लगभग उपेक्षित है जबकि पूर्ण आयु प्राप्त करने वाला प्रत्येक व्यक्ति जीवन की अंतिम अवस्था में इस आयुवर्ग का हिस्सा बनता है। परम्परागत समाज में वृद्धजनों का परिवार तथा समाज में अत्यन्त सम्मानजनक स्थान रहा है किन्तु 21 वीं सदी के वैश्वीकरण के दौर में तेजी से बदलते सामाजिक मूल्यों के कारण बुजुर्गों को जीवन की सांध्यबेला में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रस्तुत कहानी संग्रह की कहानी ‘मर तू बाबा’ में एक वृद्ध पात्र ‘बूढ़े’ के माध्यम से वृद्धावस्थाजन्य अकेलेपन का चित्रण देखने को मिलता है। कहानी का पात्र ‘बूढ़ा’ अपनी पत्नी से बेहद प्रेम करता है लेकिन उसकी पत्नी उससे कभी प्रेम नहीं कर पाती है। बूढ़े के बेटे उससे नफरत करते हैं क्योंकि उसने उनकी माँ की हत्या की, लेकिन कोई यह नहीं देखता की हत्या क्यों व किस परिस्थिति में की गई थी। बूढ़ा पत्नी के बीमार पड़ने पर उसको दर्द में जूझते हुए देख नहीं पाता है और पत्नी के कहने पर वह उसकी हत्या तक कर देता है ताकि उसको दर्द से निजात मिले–“जब वह बीमार रहा करती, मैं उसकी देह की देख-रेख किया करता। उसके गू-मूत साफ करते हुए मुझे कभी घिन नहीं आई वह अत्यंत कष्ट में जिया करती। मुझसे उसका कष्ट नहीं देखा जाता। एक लम्बी यात्रा हमने एक साथ प्रेम और घृणा के बीच तय की थी। वह थक चुकी थी और थकती जा रही थी। उन दिनों मुझे लगा था वह बरसों-बरस लड़ती रही है। एक दिन उसने बहुत अच्छे से मुझे अपने पास बुलाया, मुझे भीतर-भीतर तक देखा। देखती रही बहुत देर तक और रोती रही फिर उसने कहा, ‘मुझे मार दो, मुझसे और नहीं सहा जाता।’ सचमुच वह बहुत कष्ट में थी। मुझे लगा, मैं उससे बहुत-बहुत प्रेम करता हूँ और तब मैंने उसकी हत्या कर दी।”1 लेकिन इसकी परिणति यह होती है कि बूढ़ा ताउम्र अपनी कोठरी से बाहर कदम रखने की हिम्मत नहीं ला पाता और अपनी औलाद की नजर में एक मुज़रिम बनकर रह जाता है।

परिवार के सदस्यों की एक-दूसरे के प्रति भावनाएँ, उतार-चढ़ाव, कभी जुड़ना और कभी बिखरना और इन सब परिस्थितियों के बीच परिवार को एक सूत्र में बाँधे रखती है ‘माँ’ और अचानक जब माँ नहीं रहती तो परिवार के लोगों पर क्या-क्या बीतती है, इन सभी परिस्थितियों को उजागर करती है प्रस्तुत कहानी ‘मर तू बाबा’। कहानी की पात्र ‘अन्ना’ जो वृद्ध की देख-रेख करती है वृद्ध से पूछती है –“तेरे बच्चे तुझे याद नहीं आते क्या, एक झलक देखने का मन नहीं करता उन्हें ?”2 वृद्ध कहता है –“बच्चे हुए तो अरमान जगा कि मुझे बाबा और मेरी पत्नी को अम्मा कहेंगे, लेकिन उनकी माँ ने उन्हें कुछ और ही कहना सिखाया।”3

व्यक्ति के जीवन की गाड़ी पति-पत्नी नामक दो पहियों पर आसानी से चलती है। वृद्धावस्था में जब इनमें से कोई एक दूसरे का साथ छोड़कर चला जाता है तब इस स्थिति में जीवित वृद्ध की अवस्था ओर दयनीय हो जाती है। जब तक पति-पत्नी दोनों जीवित रहते हैं कम से कम वे एक-दूसरे के सुख-दुःख में भागी बन जाते हैं किन्तु किसी एक के चले जाने से जीवन नीरस और बेजान बन जाता है। ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओ’ कहानी का वृद्ध व्यक्ति अपना दुःख प्रकट करते हुए कहता है–“मेरी पत्नी के मरने के बाद घर में वीरानी छा गई थी लगभग...आप शायद नहीं समझ पाएं, बुढ़ापे में पत्नी से लगाव कुछ अधिक ही हो जाता है, ऐसे में अकेलेपन का एहसास बड़ा कष्टदायक होता है...इंसान के भीतर का निजी मकान खंडहर हो जाता है...जिसके सिर्फ पास रहने का आकर्षण जीवन में बल देता हो। अचानक उसके नहीं रहने से कितना टूट जाता होगा इंसान...”4 ‘वृद्धावस्था की दस्तक’ की लेखिका सीमा दीक्षित लिखती है –“वृद्धावस्था मानव जीवन की एक ऐसी अवस्था है जो क्रमशः बूढ़ी हो रही है और वह बूढ़ी अवस्था तब नि:शक्त एवं असहाय हो जाती है, जब उसका साथी पति या पत्नी बिछुड़ जाता है। अब वह स्वयं भी मन एवं शरीर दोनों से टूट जाता है।”5

जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुँचकर वृद्ध व्यक्ति अपनी स्मृतियों के सहारे ही अपने वर्तमान समय को गुजारते चले जाते हैं। वृद्ध व्यक्ति भविष्य के सपने देखना लगभग बंद कर देते है क्योंकि उनका शरीर उनको हकीकत में बदलने में सक्षम नहीं रहता है। ‘पुराने घर का चाँद’ कहानी के वृद्ध पात्र ओमकार बाबू अपनी पत्नी के देहान्त के बाद उसको चाँद में महसूस करते हैं और चाँद को देखकर उनको बहुत शुकून मिलता है –“पत्नी चाँद में खो गई थी लेकिन ओमकार बाबू ने उसे हमेशा ही अपने पास महसूस किया। जब कोई दुःख होता, चुपके से उससे कह देते-“शिवानी इस बार बारिश नहीं हुई, गांव की फसल नष्ट हो रही है-पानी भेजो ना...”6

            मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन में किसी न किसी प्रकार की तैयारियों में लगा रहता है। कभी अपने भविष्य को सुखमय बनाने के लिए कठिन परिश्रम करता है तो कभी बच्चों के भविष्य को सुखमय बनाने के लिए। ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओ’ कहानी का वृद्ध पात्र अपनी पुत्रवधू के कहने पर स्वयं के बेटे का भविष्य सुरक्षित करने के लिए समयपूर्व अपनी नौकरी छोड़ देता है और खुद की जगह बेटे को नियुक्त करवा देता है, इस सन्दर्भ में कहानीकार लिखता है –“मेरी बहू जितनी खूबसूरत है उतनी ही समझदार भी। उसने अपने जवान पति के लिए अपने बूढ़े ससुर के सामने एक प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव मुझे पसन्द आया और मैंने वह चादर अपने बेटे को दे दी।...ऐसे में मेरा पी.एफ. भी कट गया और मुझे अपनी पेंशन का आधा हिस्सा बेचना पड़ा।”7  इतना सब करने पर भी वृद्ध पात्र की खुशी के बारे में कोई नहीं सोचता है। बुजुर्गों से सब खुशियाँ पाना चाहते हैं, उनको खुश कैसे रखे, उनकी खुशी किसमें है यह कभी भी कोई नहीं सोचता। कहानीकार लिखते हैं –“फिर मेरे पोते का जन्म हुआ तो मेरी बहू ने पुनः एक बार अपनी समझदारी का सबूत दिया और एक प्रस्ताव रखा। मुझे उसका यह प्रस्ताव भी पसंद आया और मैंने अपनी पेंशन का एक और हिस्सा बेचकर अपने पोते के नाम से बैंक में एफ. डी. करा दी।”8 इतना सब करने के बाद जब वही पोता दादा के कमरे में जाता है तो उसको हिदायत दी जाती है –“बेटे, दादा को दम्मा है...खलाब-खलाब बीमाली...अच्छे बेटे ऐसे दादा के पास नहीं जाते...”9 आज के बाजारवादी दौर में रिश्तों को नफ़े-नुकसान की तराजू में तौलने के कारण वृद्धों को अपने घर में उपेक्षा और तिरस्कार के सिवाय कुछ नहीं मिलता है।

            वर्तमान समय में बेहतर शिक्षा, रोजगार के अवसर, आधुनिक सुविधाओं तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता व निजता की चाह में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों तथा छोटे शहरों से महानगरों व विदेशों की ओर प्रवास बढ़ा है। निकट भविष्य में इस प्रवृति में अधिक वृद्धि की संभावना है। इस प्रवास के चलते परम्परागत संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है। आत्मकेंद्रित एकल परिवारों में बुजुर्गों के लिए वह स्थान नहीं रह गया है जो संयुक्त परिवारों में था। देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत हिस्सा 60 वर्ष से ऊपर के आयुवर्ग में आता है। वृद्धों की इतनी आबादी होने पर भी हम देखते हैं कि शहरों में वृद्ध बहुत कम दिखाई देते हैं। जीवन का समुचित विकास हो और प्रकृति में संतुलन बना रहे इसके लिए घर-परिवार में हर अवस्था के व्यक्ति का अपना महत्त्व होता है लेकिन आज का मनुष्य इस उपभोक्तावादी चकाचौंध में इतना खो गया है कि बुजुर्गों के अस्तित्व व घर-परिवार में उनकी उपयोगिता को बिल्कुल नकार चुका है। ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओ’ कहानी का बूढ़ा कहता है-“आपको आश्चर्य नहीं होता, अब बूढ़े कहीं नज़र नहीं आते।...कल्पना कीजिए कि दुनिया में एक भी बूढ़ा नहीं हो...या ये कि सिर्फ बच्चे हों, कैसा लगेगा तब...सिर्फ ये सोचिए कि दुनिया में अगर केवल कुत्ते ही कुत्ते हों तो कैसा लगेगा। हां, इसमें उम्र की कोई कैद नहीं...पिल्ला...जवान...बूढ़ा...हर उम्र के कुत्ते...”10 आज घर-परिवार में बुजुर्गों की उपेक्षा इस कदर बढ़ गई है कि घर के सदस्य उनको अपने किसी भी सुख-दुःख में शरीक नहीं करना चाहते “घर के खाने की मेज पर तो बूढ़े दिखते ही नहीं। क्या ये कहीं किसी दूसरी एक जगह आबाद होने लगे हैं?”11 हर अवस्था का अपना महत्त्व होता है इस सन्दर्भ में ‘वृद्धावस्था की दस्तक’ पुस्तक की लेखिका ‘सीमा दीक्षित’ लिखती है -“मनोरंजन और प्रसन्नता के लिए शिशुत्व या बाल्यावस्था तथा अनुभव एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए वृद्धावस्था आवश्यक है और इन दोनों अवस्थाओं अर्थात् बाल्यावस्था एवं वृद्धावस्था का समुचित विकास एवं ये अवस्थाएँ हमारे लिए कितनी उपयोगी हों, इसके लिए प्रौढ़ावस्था है।”12

            शहरी बुजुर्गों को बदलते सामाजिक मूल्यों ने कहीं अधिक प्रभावित किया है क्योंकि महानगरों की असामाजिकता अकेलापन से उत्पन्न अवसाद का प्रमुख कारण है। सेवानिवृत्ति के पश्चात शहरी बुजुर्गों के पास समय व्यतीत करने के लिए गाँवों की चौपालों व चौराहों की बैठकी जैसे स्थान नहीं होते हैं। महानगरीय परिवारों में लगभग सभी कार्यशील सदस्य नौकरीपेशा वाले होते हैं इसीलिए घर में उनकी उचित देखभाल नहीं हो पाती है। ‘मुझे चाँद चाहिए’ कहानी के पात्र ओमकार बाबू कहते हैं–“यहां की स्थिति अजीब है। सुबह बहू-बेटे अपने-अपने दफ्तर चले जाते हैं। पिंकी कॉलेज और डब्बू स्कूल। पूरा दिन वह तनहा कमरे की दीवारों से खामोश गुफ्तगू करते रहते हैं। रात को बहू-बेटे देर से लौटते हैं। तब तक बच्चे सो चुके होते हैं। उनके कमरे भी अलग-अलग है। उनकी मुलाकात क्षण भर के लिए सुबह नाश्ते पर ही होती है जैसे यह पूरा परिवार एक नहीं अलग-अलग हिस्सों में बंट कर अलग-अलग जिंदगियां जी रहा हो। सबकी अपनी मसरूफियत, अपने काम।”13

‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओ’ कहानी का शीर्षक भी बहुत कुछ बयाँ करता है। बूढ़ा होना अर्थात् वृद्धावस्था पूर्ण जीवन की एक अवश्यंभावी अवस्था है किन्तु समाज ने इस अवस्था को अभिशाप बना दिया है। कहानीकार इस शीर्षक के माध्यम से वृद्धावस्था से मुक्ति की बजाय इस ‘निर्मित अभिशाप’ से मुक्ति का आह्वान कर रहा है। इस कहानी का पात्र ‘बूढ़ा’ एक छत के नीचे रहने के बावजूद पूरे महीने में सिर्फ एक बार अपने बेटे से मिल पाता है और उसी एक दिन वह खुलकर हंसता है और चाहकर भी अपनी हंसी रोक नहीं पाता है क्योंकि महीने की पहली तारीख को बेटा उससे उसकी पेंशन लेने उसके कमरे में आता है। जब कहानी का नौजवान पात्र कहता है कि –“आप हंसते हैं तो अजीब लगते हैं।”14 तब वृद्ध पात्र कहता है -“दरअसल, आज महीने की पहली तारीख है ना, आज के दिन मैं अपनी हंसी छुपा नहीं पाता...वास्तव में आज मेरी अपने बेटे से मुलाकात होती है...वैसे भी आदमी को महीने में एक बार हंस ही लेना चाहिए।”15 गुलज़ार ने क्या खूब लिखा है-

‘जेब जब ख़ाली हो, फिर भी मना करते नहीं देखा

मैंने पिता से अमीर इंसान नहीं देखा|’

जिन्दगी में धन-दौलत, नाम, शोहरत सब एक तरफ और अपनों का साथ एक तरफ और उस एक पल की खुशी के लिए बूढ़ा पूरा महीना मर-मर के काटता है। वृद्ध पात्र अकेलेपन की हर सीमा को लांघ चुका था और वह कुत्ते की किस्मत को खुद से अच्छी मानता हुआ अपने कुत्ते की सबसे बड़ी खूबी बताते हुए कहता है –“इसमें यह महसूस करने की शक्ति नहीं होती कि इनकी संतान कहां पल-बढ़ रही है और किस हाल में है...”16

इसी तरह ‘मर तू बाबा’ कहानी का वृद्ध पात्र तो कभी अपनी औलाद से मिल भी नहीं पाता है। वृद्ध को ये भी नहीं पता की उसके बेटे कहाँ व किस हाल में है। कहानी की पात्र ‘अन्ना’ कहती है -“झूठ मत बोला कर, मैं जानती हूं तेरे सगेवाले हैं। शायद बड़े-बड़े बाबू हैं पर तेरे पास नहीं आना चाहते। जाकर देख ले ना एक नजर उनको। कैसे शहरी बाबू दिखते होंगे, उजले-उजले...”17 इसके प्रत्युत्तर में वृद्ध पात्र द्वारा ये कहना “बावली किसी और की बात कर रही है। मेरा सगा वाला कोई नहीं है। सब जानता हूं, तू मुझे चकित करना चाहती है...”18 उपर्युक्त संवाद किसी वेदना से कम नहीं है।

            वर्तमान में हम देखते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों को एक ‘आया’ के भरोसे छोड़ देते हैं लेकिन अपने बुजुर्गों की छत्रछाया में रखने से हिचकते हैं, जबकि बच्चों का अपने दादा-दादी और नाना-नानी के साथ एक खास रिश्ता होता है। ‘पुराने घर का चांद’ शीर्षक कहानी में लेखक लिखते हैं –“सबसे ज्यादा तरस ओमकार बाबू को यहां के बच्चों पर आता है जो ऐसे बाप की सन्तान होते हैं जो फाइलों में गुम रहते हैं और जिनकी मांएं लिपस्टिक से लुथड़ी, देर रात तक क्लबों में रक्श फरमाती रहती हैं, उन बच्चों की निगाहों में उनकी आयाओं के चेहरे ज्यादा आत्मीय होते हैं।”19 महानगरों में एकल परिवार को वरीयता देने वालों को समझना चाहिए कि परिवार के बुजुर्गों की वात्सल्य छाया में बच्चों की परवरिश ‘आया’ की तुलना में कहीं बेहतर व जिम्मेदारी युक्त हो सकती है। इससे वे बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतामुक्त होकर बेहतर कार्यनिष्पादन करते हुए तीन पीढ़ियों का कल्याण सुनिश्चित कर सकते हैं।

            ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओ’ कहानी के वृद्ध पात्र को जो शुकून अपने कुत्ते के साथ मिलता है वो उसके अपने भी नहीं दे पाते हैं। वृद्धजनों को अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए एक सहारा चाहिए और वह उनको घर के सदस्य नहीं दे पाते हैं। ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओं’ कहानी का बूढ़ा कहता है -“पहले फैशन था मगर अब तो जैसे बूढ़े हाथों और कुत्ते की बेल्ट का पुराना संबंध-सा बन गया है। जैसे दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों...”20 यह केवल उस एक वृद्ध के अकेलेपन की समस्या नहीं है बल्कि आज के समय में हर घर-परिवार के बुजुर्गों की यही स्थिति है। कहानी के प्रारम्भ से लेकर अंत तक बुजुर्ग के साथ एक नवयुवक का चित्रण हुआ है और उस नवयुवक को बुजुर्ग की स्थिति और खुद के बेटे से मिलने की बेसब्री देखकर उसपर तरस आता है लेकिन जब वह स्वयं के परिवार में झांक कर देखता है तो स्वयं के पिता को उसी बुजुर्ग की स्थिति में खड़े पाता है -“मैं जल्दी-जल्दी घर पहुँच जाना चाहता था।...पिताजी दरवाजे से बाहर निकल रहे थे। वर्षों से उनके शरीर से लिपटा ओवर कोट उनकी पहचान था लेकिन...मैंने पास पहुंचकर देखा। एक खारिशज़दा कुत्ता कुछ सूंघता हुआ उनके आगे-पीछे हो रहा था और उसकी काफी छोटी बेल्ट पिताजी ने अपने हाथ में सख्ती से पकड़ रखी थी।”21 कहानीकार को मूल चिन्ता यह है कि आज का नवयुवक बुजुर्गों के बारे में क्यों नहीं सोचता है जबकि एक न एक दिन तो हर किसी को उम्र के इस पड़ाव से होकर गुजरना है-“आप कुछ भी नहीं जानते...यही तो आश्चर्य है कि आज का युवा कुछ भी नहीं जानता...जबकि उसे जानना चाहिए किसी बूढ़े से अधिक...”22

वृद्धावस्था में जहाँ परिवार, समाज व्यक्ति को धीरे-धीरे नकारता जाता है वहीं प्रशासन भी वृद्धों की उपेक्षा करने में पीछे नहीं रहता है। शासन की निष्क्रियता के कारण भी वृद्धों में असुरक्षा का भाव पनपने लगता है। ‘मुझे बूढ़ा होने से बचाओं’ कहानी का बूढ़ा कहता है कि “कल मेरा बेटा अख़बार की एक ख़बर मेरी बहू को सुना रहा था कि हमारी सरकार बहुत जल्द बूढ़ों को कुछ ख़ास सहूलियत देने वाली है। कहीं ये बूढ़े अख़बार ही में तो एकत्र नहीं होने लगे हैं...”23 हम देखते हैं कि वृद्धों के हित में आये दिन सरकार द्वारा अनेक योजनायें बनाई जाती है यथा सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, इंदिरा गांधी वृद्ध पेंशन योजना, अटल पेंशन योजना। हाल ही में सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय द्वारा शुरू की गई ‘राष्ट्रीय वयोश्री योजना’ के अंतर्गत उम्र संबंधी बीमारियों का सामना कर रहे बीपीएल बुजुर्गों को जीवन यापन के लिए आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराये जा रहे हैं। भारतीय नागरिक जो कि 60 वर्ष की उम्र से ऊपर के हैं वे ‘प्रधानमंत्री वय वंदना योजना’ में निवेश करने के पात्र है। इसमें वरिष्ठ नागरिकों के लिए 8 फीसदी की दर से वापसी की गारंटी भी सुनिश्चित की है। इसके अलावा ‘वरिष्ठ नागरिक कल्याण कोष’, राष्ट्रीय वृद्धजन नीति के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक परिषद् का गठन किया गया। लेकिन अब सोचने वाली बात यह है कि इन योजनाओं की पहुँच कितने बुजुर्गों तक है और कितने बुजुर्ग इन योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं ?

अपने ही घरों में क्रमश: उपेक्षित और अप्रांसगिक होती जा रही पुरानी पीढ़ी आज की सर्वाधिक ज्वलंत समस्या है। हमारे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि वर्तमान व्यवस्था के समर्थन या विरोध में खड़ी ये उर्दू कहानियाँ किस हद तक वर्तमान व्यवस्था व इसमें वृद्धों की अभिव्यक्ति को चित्रित करने में सफल रही है ? प्रस्तुत कहानियों के माध्यम से वृद्धों की स्थिति व इसके लिए जिम्मेदार वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक व सांस्कृतिक तत्वों के प्रति एक राय बनेगी और यही इसका उद्देश्य है। हमें बदलते सामाजिक मूल्यों में वृद्धजनों को भौतिक उपयोगितावादी नजरिए से उनके साथ अनुपयोगी तथा बोझिल वस्तु की तरह व्यवहार की प्रवृति से बचना जरूरी है। बढ़ती वृद्ध आबादी को भविष्य में बेहतर गरिमामय जीवन जीने का अवसर मुहैया कराने के हरसंभव प्रयास होने चाहिए। इससे युवाओं में अपने भविष्य की वृद्धावस्था के प्रति निश्चितता तथा जीवन के प्रति अनुराग में वृद्धि होगी।


 

संदर्भ ग्रन्थ सूची :-                                                                                                         

  1. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), मर तू बाबा, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पृष्ठ सं. 103-104
  2. वही,...पृ. 101
  3. वही,...पृ. 101
  4. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), मुझे बूढ़ा होने से बचाओ, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पृ. 12
  5. सीमा दीक्षित, वृद्धावस्था की दस्तक, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 29
  6. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), पुराने घर का चाँद, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पृ. 156
  7. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), मुझे बूढ़ा होने से बचाओ, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई.,पेज न. 13
  8. पेज न. 13
  9. वही,...पेज न. 18
  10. वही,...पेज न. 14
  11. वही,...पेज न. 11
  12. सीमा दीक्षित, वृद्धावस्था की दस्तक, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 39
  13. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), पुराने घर का चाँद, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पेज न. 156-157
  14. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), मुझे बूढ़ा होने से बचाओ, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पेज न. 16
  15. वही,...पेज न. 16
  16. वही,...पेज न. 15
  17. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), मर तू बाबा, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पेज न. 102
  18. वही,...पेज न. 102
  19. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), पुराने घर का चाँद, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई., पेज न. 157
  20. सग़ीर रहमानी, पुराने घर का चाँद (कहनी संग्रह), मुझे बूढ़ा होने से बचाओ, ग्रन्थ लोक पब्लिकेशन, 2000 ई.,पेज न. 15
  21. वही,...पेज न. 18
  22. वही,...पेज न. 15
  23. वही,...पेज न. 11