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मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में सामाजिक मूल्य

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में सामाजिक मूल्य

चरंजीलाल
शोधार्थी हिंदी-विभाग,
पंजाब विश्वविद्यालय,
चंडीगढ़
मोबाइल न. 9041470841

 


मनुष्य योनी सर्वश्रेष्ट योनी है। मनुष्येतर प्राणियों को केवल मात्र भोग योनी कहा गया है, परंतु शास्त्रों में मानव को कर्म योनी एवं भोग योनी दोनों दर्शाया गया है। मनुष्य को कर्त्तव्य अकर्त्तव्य का बोध है यही बोध इसे पशुत्व से पृथक कर मानव तत्व तक पहुंचाता है। इसलिए मूल्यों का संबंध पूर्णतया मानव से ही है। दार्शनिक दृष्टिकोण से ‘मूल्य’ चिरंजीवी हैं, तथा विश्वास और प्रेम के धरातल पर स्थित है। नैतिकता से ओत-प्रोत जीवन ही एक अच्छे समाज की आधार शिला है। इसलिए भारतीय ऋषि मुनियों ने शुभ संकल्प, सामाजिक सहयोग, दया, क्षमा, प्रेम, अहिंसा, तथा जनकल्याण की भावना को निरंतर प्रोत्साहित किया है।

मानव एक सामाजिक है। इसलिए वह समाज में रहना ही पसंद करता है। समाज ने मनुष्य जीवन को सुव्यवस्थित बनाने के लिए कतिपय नियमों की संरचना की है। इन्हीं नियमों के मूलभाव को ही मूल्य कहते हैं। मानव तथा समाज अधिकांशतः इन मानव मूल्यों के माध्यम से जीवन यापन करता है। मनुष्य में मानव मूल्य विकसित करने के दो साधन हैं। पहला है, घर की परम्परा जिससे बालक मूल्यों को जानने लगता है और दूसरा है, विद्यालय की शिक्षा। शिक्षा का लक्ष्य मानव में अंतरनिहित सभी शक्तियों का उपयुक्त एवं अधिकाधिक विकास करना है। यह विकास मूल्यों के आधार पर ही होना चाहिए, तभी इसे उपयुक्त कहा जायेगा। उपयुक्त व्यक्तित्व का विकास ही मनुष्य को सभ्य और सुसंस्कृत बनाता है। शिक्षा इसकी आधारशिला है। वह मानव में ऐसा विवेक जागृत करती है, जिससे वह औचित्य और अनौचित्य का निर्णय कर पाता है। अन्यथा बहुत सी मानसिक शक्तियां औचित्य की सीमा का उलंघन करने के कारण पशुत्व को प्राप्त होती है। शिक्षा के महान उपाय द्वारा उन शक्तियों का उचित नियमन, नियंत्रण और उदात्तीकरण करके ही उसके व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनाती है। अतः शिक्षा मानव मूल्य अनुस्यूत करने का उत्कृष्ट साधन है। मानव मूल्य जीवन को सुसंस्कृत बनाने के लिए आवश्यक एवं सहायक है। मानव मूल्य न केवल आत्म मूल्यांकन में ही सहायता करते हैं, अपितु आत्म संचालन में भी सहायता करते हैं। मूल्यों से वंचित एक शिक्षित मनुष्य जो अपने विचार रखता है, उनको कभी उपयुक्त शिक्षा में क्रियाशील नहीं कर सकता है। अतः मानव मूल्य का जीवन से घनिष्ट और शाश्वत संबंध है।

‘मूल्य’ शब्द संस्कृत की ‘मूल’ धातु के साथ ‘यत’ प्रत्यय लगाने से व्युत्पन्न हुआ है, जिसका कोशगत अर्थ ‘ जड़ से उखाड़ने योग्य, खरीदने योग्य, कीमत, मजदूरी, वेतन, लाभ तथा पूंजी होता है।1

हिंदी का ‘मूल्य’ शब्द अंग्रेजी के ‘वेल्यु’ के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है, जिसका अभिप्राय मूल्य, कीमत, उपयोगिता, महत्व, बल, मूल्य निर्धारण करना तथा महत्व देना होता है।2

‘मूल्य’ शब्द मूलतः अर्थशास्त्र का शब्द है जिसमें इसका अर्थ अ. प्रचलित मूल्य अर्थात किसी वस्तु की मानवीय आवश्यकता अथवा इच्छा पूर्ति की क्षमता, आ. विनिमय दर अथवा अन्य वस्तुओं के विनिमय द्वारा प्राप्त किसी वस्तु मान के लिए किया जाता है, जैसे आधुनिक समय में मुद्रा के रूप में और वस्तु के रूप में जाना जाता है।3 इस अर्थ में मूल्य से अभिप्राय किसी वस्तु की कीमत से होता है।

मूल्य शब्द के अध्ययन से यह सिद्ध हो जाता है कि मूल्य कोई पदार्थ जगत की वस्तु नहीं है अपितु हृदय की अमूर्तधारणा है। इसे तो केवल समझा एवं अनुभव किया जा सकता है। इसे समझने और अनुभव करने के लिए हमें कोई बोधक आधार बनाना पड़ता है व् स्वरूप देना पड़ता है।

“मूल्य उस गुण समवाय का नाम है जो किसी पदार्थ को अपने लिए, प्रमाण के लिए अथवा अपने परिवेश के लिए सार्थकता का निर्धारण करता है। पदार्थ का गुण होने के कारण मूल्य की सत्ता वस्तुपरक है किन्तु प्रभात्र सापेक्ष होने के कारण वह व्यक्तिपरक है।”4 इस परिभाषा में विश्लिषित किया गया है कि पदार्थ को सार्थकता और प्रबल इच्छा ही मूल्य का आधार है।

“मूल्य अपने आप में एक धारणा है, जो किसी धारक वस्तु निर्धारित होती है तथा मनुष्य को सुखानुभूति स्वयं तुष्टि का विषय बनती है। अतएव वैयक्तिक अनुभूति और धारणा वस्तु, मूल्य के अनिवार्य अंग हैं। जो वस्तु मानव मन में प्रसाद, प्रेरणा, सार्थकता, आपूर्ति तथा परितोष की अनुभूति करने में सक्षम होती है, वही मूल्यवान प्रतीत होने लगती है।”5 इस परिभाषा से स्पष्ट है कि मूल्य का रहस्य अथवा आधार वस्तु द्वारा मानव को अधिक से अधिक आनंद प्रदान करने में ही है।

“जन साधारण में मूल्य शब्द का प्रयोग सामान्यतः धन और अर्थ के लिए ही किया जाता है।”6 साधारणतः वस्तु को प्राप्त करने के लिए जो किसी रूप में कीमत चुकाते हैं, वही मूल्य है।

“आदर्श हिंदी शब्दकोश” में ‘समाज’ शब्द की व्याख्या इस प्रकार दी गई है, मनुष्य का संगठित समूह, संघ, सभा तथा समुदाय।7

“वृहद हिंदी कोश” में ‘समाज’ शब्द से अभिप्राय मिलना, एकत्र होना, समूह, संघ, दल, सभा, समिति, आधिक्य, समान कार्य करने वाला समूह, विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संघटित संस्था, ग्रहों का योग, हाथी, इत्यादि रूपों में अंकित है।8

मैकराइवर और पेज ने समाज की परिभाषा इस प्रकार दी है – समाज रीतियों, कार्य विधियों अधिकार व् पारस्परिक सहायता, अनेक समूहों तथा उनके विभाजनों, मानव व्यवहार के नियंत्रण तथा स्वतंत्र की व्यवस्था है। इस सदैव परिवर्तन होने वाली तथा जटिल व्यवस्था को ही समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का जाल है और सदैव परिवर्तित होता रहता है।9

किसी भी व्यक्ति, परिवार अथवा समाज के भिन्न-भिन्न जीवन व्यापारों में या सामाजिक संबंधो में मानवता की दृष्टि सेज प्रेरणा प्रदान करने वाले आदर्शों को समष्टि को सामाजिक मूल्य कहते हैं। सामाजिक मूल्यों से अभिप्राय समाज के ऐसे मानक लक्ष्यों अथवा आदर्शों से है जिनका एक समूह के सदस्यों के लिए कुछ विशेष अर्थ होता है। यह विश्वास किया जाता है कि व्यक्तिगत मनोवृतियों का निर्माण करने तथा मानवीय व्यवहारों की सुसंगठित संरचना में मूल्यों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

श्री राधा कृष्ण मुखर्जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द सोशल स्ट्रक्चर ऑफ वेल्यूज’ में स्पष्ट इंगित किया है कि प्रत्येक समाज में कुछ ऐसे आदर्श नियम होते हैं जिनकी सहायता से व्यक्ति अपनी प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति करता है यही आदर्श मूल्य जब समूह के सदस्यों द्वारा आस्था के रूप में स्वीकृति पा जाते हैं तब यही मूल्यों के रूप में स्थापित हो जाते हैं। प्रत्येक समाज को जीवंत रखने के लिए यह अनिवार्य है कि वह व्यक्ति और उसके व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले सर्वोच्च मूल्यों को नियमबद्ध रूप से पूर्ति करता रहे। यह सभी मूल्य विभिन्न समूहों की प्रकृति तथा उनके पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट करते हैं।10

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में सामाजिक मूल्य :

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। व्यक्ति और समाज का अटूट संबंध रहा है। समाज के बिना व्यक्ति अधूरा है और व्यक्ति के बिना समाज। समाज मानव जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है संस्था है। सामाजिक दृष्टि से मूल्यों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है वैयक्ति एवं सामाजिक मूल्य। वही वैयक्तिक मूल्य मान्य हैं जो समाज के विरोधी न हों क्योंकि मनुष्य अपने बृहत्तर प्रवेश में समाज एवं राष्ट्र से जुडा हुआ है। अतः व्यक्ति व्यक्ति का समष्टि रूप ही समाज है और वही समुदाय की सृष्टा है।

साकेत में “ हम जो समष्टि के लिए व्यष्टि बलिदानी ”11 की धारणा इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि गुप्त जी ने व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व दिया है। भारतीय संस्कृती से सम्बंधित सामाजिक जीवन का वर्णन प्राय गुप्त जी की सभी रचनाओं में मिलता है। गुप्त जी सामाजिक जीवन के लिए मर्यादा को अनिवार्य मानते हैं और मर्यादा ही उनके आदर्श समाज का मेरुदंड है।

साकेत में राम का एक निम्न कथन देखिये :

                                                            जितने प्रवाह बहें अवश्य बहें ये 

                                                            निज मर्यादा में किंतु सदैव रहें ये।12

गुप्त जी के राम विश्व में मर्यादा की प्रतिष्ठापना हेतु ही अवतरित हुए हैं :

                                                            मैं आया जिससे बनी रहे मर्यादा

                                                            बच जाये प्रलय से, मिटे न जीवन सादा।13

वर्ण-व्यवस्था : गुप्त जी का विचार है कि कोई व्यक्ति वर्ण-व्यवस्था की स्थिति में उसी समय तक रहती है या उसे रखा जा सकता है जब तक कि वह अपने आदर्श को नहीं छोड़ता। ब्राह्मण कुल में उत्पन्न यदि वह अत्याचारी एवं आततायी है, तो समाज जी दृष्टि में वह भी वध्य है –

                                                            द्विजता तक आततायिनी

                                                            वध में है कब दोष दायिनी।14

गुप्त जी का मानना है कि जब चारों वर्णों के लोग जब स्वतंत्र रूप में अपने-अपने कर्त्तव्यों का पालन करेंगे तभी संसारिक जीवन सुखी हो सकेगा –

                                                            पालें हम सब निज कर्त्तव्य

                                                            भरी इसी में भाव का भव्य।15

व्यष्टि-समष्टि : समाज व्यक्ति का वृहत रूप है। व्यक्ति की अपेक्षा समाज अधिक शक्तिशाली है। सिद्धराज की उक्ति है कि व्यक्तिगत रूप से कोई व्यक्ति चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, समाज के सहयोग के आभाव में उसका कोई भी कार्य पूर्ण नहीं हो सकता, उसे दूसरों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने महान पद या मान सम्मान पर गर्व न करके ‘संघ’ को ही शक्ति माने। यही सुख का मार्ग है –

                                                            व्यक्तिगत कोई रहे चाहे जितना बड़ा

                                                            संघ में ही शक्ति, गति वही एक सबकी।16

हिन्दू में भी इसी प्रकार का आशय स्पष्ट किया गया है कि व्यक्ति का सर्वांगिक विकास समाज में रह कर ही होता है।

                                                            भूल न जाओ बिना समष्टि

                                                            रही न रह सकती व्यष्टि।17

व्यक्ति का सामाजिक विकास समाज में रह कर ही होता है या हो सकता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह समाज के हित के लिए कार्य करे। साकेत के राम के मुख से कवि ने यही बात कहलायी है।

                                                            निज हेतु बरसता नहीं व्योम से पानी

                                                            हम हो समष्टि के लिए व्यष्टि बलिदानी।18

गुरु शिष्य : सामाजिक संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण संबंध गुरु शिष्य का संबंध है। ‘गुरुकुल’ में गुप्त जी ने गुरु का सच्चा गौरव “नव मंत्र गढ़नौ की क्षमता” में बताया है।

                                                `           गुरु का सच्चा गौरव यह है

                                                            वह गढ़ सके नव मंत्र।19

सिख गुरुओं के जितने भी शिष्य हुए हैं गुरुकुल में उनके कर्तव्य पालन की स्थान-स्थान पर प्रशंसा की गई है, जिन्होंने गुरु के आदेश से दूसरों को दुखों से बचाने के लिए हंसते-हंसते फाँसी पर चढ़ जाने में भी संकोच नहीं किया।

                                                            देख दूसरों का उत्पीडन अपने किये कर्म के अर्थ

                                                            फाँसी तक के लिए उपस्थित दिखे गुरु के शिष्य समर्थ।20

रीति-रिवाज़, रुढ़ि एवं परम्पराएं : गुप्त जी पुरानी हानिकारक रुढियों एवं परम्पराओं का त्याग कर देने के पक्षपाती रहे हैं। समाज में प्रचलित उन रुढियों एवं परम्पराओं का बहिष्कार कर देना उचित है जिनसे सामाजिक उन्नति में व्याघात पैदा होने का डर हो। रुढियां मनुष्य के जीवन में जागृति नहीं पैदा करती, अपितु उसके जीवन को शुष्क और नीरस बना देती है।

                                                            रूढ़ि बिना जड़ की वह बेलें

                                                            चूस रही जीवन रस खेल।21

द्वापर में उन्होंने बलराम के माध्यम से रुढियों से निस्सारता को दर्शाया है। गुप्त जी का कथन है कि संकुचित दृष्टिकोण रखने वाली पुरानी रुढियों को त्याग कर नवीन रीति-रिवाज़ को ग्रहण करना चाहिए।

बाल विवाह : गुप्त जी ने बाल विवाह प्रथा का डट कर विरोध किया है। बाल विवाह समाज के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होते हैं। संयम नियम से शरीर एवं मन परिपुष्ट होता है जिससे मानवीय गुणों का विकास होता है। अच्छे व्यक्ति ही सुदृढ़ समाज की स्थापना कर सकते हैं। गुप्त जी ने बाल विवाह को मानवीय गुणों के विकास में बाधा माना है। अतः अनिष्ट से बचने के लिए कुप्रथा को त्याग देना चाहिए।

                                                कितना अनिष्ट किया हमारा हाय बाल्य विवाह ने

                                               

                                                हाय ग्रस लिया है वीर्य बल को मोह रूपी ग्राह ने

                                                खारे गुण को बढ़ाया इस कुरीति प्रवाह ने।22

जाति-पांति, छुआ-छूत : समाज में जाति का बंधन अति कठोर है, इससे अनेक प्रकार की हानिया हुई हैं। इसलिए गुप्त जी सामाजिक सुधर के लिए प्रयत्नशील हैं। गृहस्त गीता में उनका सन्देश है कि जाति-पांति के भेदभाव को मिटा कर मिलजुल कर रहना चाहिए। इसी से स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता है। गुप्त जी का मत है कि समाज में कोई ऊँच–नीच नहीं है समस्त मनुष्यों की एक ही जाति है।

                                                            सभी बंधु हैं लघु या ज्येष्ठ,

लिखी नहीं माथे पर जाति

                                                            गुण कर्मों से उसकी जाति,

सबके दो पद हैं दो हस्त

                                                            सजातीय है मनुष्य समस्त।23

गुरुकुल में गुरु गोबिंद ने छुआ-छूत जी निंदा की है उन्होंने अछूत को समाज का अंग कहा है। उनके द्वारा भी समाज का उद्धार हो सकता है।

                                                            जिन्हें शुद्र कहते हैं वे ही

                                                            हैं समाज एक सच्चे अंग

                                                            प्रथम पैर हैं पूजते हैं जो

                                                            ले चलते हैं सबकुछ संग।24

तात्पर्य यह है कि समाज की उन्नति या विकास के लिए छुआ-छूत, ऊँच-नीच तथा जाति-पांति के भेदभाव को त्याग देना चाहिए।

एकता और फूट : समाज की उन्नति, शांति तथा सुव्यवस्था तभी स्थिर रह सकती है जब प्रत्येक सामाजिक प्राणी अपने कर्तव्यों का पालन करे। गुप्त जी सामाजिक एकता के प्रशंसक हैं। उनका कहना है कि एकता में ऐसी शक्ति है जिससे कठिन से कठिन कार्य भी सरलता से पूरा किया जा सकता है।

                                                            है कार्य ऐसा कौन साधे न जिसको एकता

                                                            देती है अदभुत अलौकिक शक्ति किसको एकता।25

यही भाव ‘अनघ’ में भी व्यंजित हुआ है –

                                                            जुट जावें दस जन जहाँ

                                                            क्या है कि जो हो न वहाँ।26

रंग एवं वेशभूषा की भिन्नता के कारण भेद करना उचित नहीं है क्योंकि ये भिन्नताएं बाह्य हैं आंतरिक स्वरूप सभी का एक समान है। अतः सभी जाति के लोगों को समान मित्रभाव से रहना चाहिए।

                                                            आकृती वर्ण और बहुत वेश

                                                            ये सब निज वैचित्य विशेष

                                                            डालो संत दृष्टि निमेष

                                                            देखो आह। एक ही प्राण

                                                            विश्व बंधुता में ही त्राण।27

गुप्त जी का कथन है कि सभी प्राणी मात्र उसी एक परम पिता परमात्मा की संतान हैं इसीलिए किसी से घृणा नहीं करनी चाहिए और आपस में प्रेम पूर्वक रह कर सुख शांति का जीवन व्यतीत करना चाहिए।

                                                            परमात्मा के पुत्र सभी हम

                                                            कोई नहीं घृणा के योग्य

                                                            भ्रातृभाव पूर्वक रह कर सब

                                                            पाओ सौरूप शांति अरोग्य।28

निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि समाज की आधारशिला मूल्यों को कहा जा सकता है जिसके बिना मनुष्य का सम्पूर्ण विकास संभव नहीं हो सकता जिसमें से सामाजिक मूल्यों का होना और उनका मान्य होना महत्वपूर्ण है। मानव एक सामाजिक है। समाज ने मनुष्य जीवन को सुव्यवस्थित बनाने के लिए कतिपय नियमों की संरचना की है। इन्हीं नियमों के मूलभाव को ही मूल्य कहते हैं।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची   

  1. द्वारका प्रसाद शर्मा, संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ, संस्करण १९७७, पृष्ठ ९३४.
  2. फ़ादर कामिल बुल्के, अंग्रजी हिंदी कोश, संस्करण १९७९, पृष्ठ ८१७.
  3. Rille William and Introduction of ethics, Random Methereon 1948, page 209.
  4. डॉ. नगेन्द्र, भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका, नेशनल पब्लिशिंग हॉउस, नयी दिल्ली, संस्करण १९७८, पृष्ठ १६०.
  5. जगदीश गुप्त, नयी कविता स्वरूप और समस्याएं, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण १९७१, पृष्ठ १२.
  6. रमेशचन्द्र लवानिया, हिंदी कविता में जीवन मूल्य, अमित प्रकाशन, गाज़ियाबाद, संस्करण १९७३, पृष्ठ ०१.
  7. रामचंद्र पाठक, आदर्श हिंदी शब्दकोष, भार्गव बुक डिपो, वाराणसी, संस्करण १९७१, पृष्ठ १६९.
  8. कलिका प्रसाद, वृहद हिंदी कोश, पृष्ठ १४४१.
  9. मैकाइवर और पेज, सोसाइटी, पृष्ठ १३.
  10. डॉ. राधाकृष्ण मुखर्जी, द सोशल स्ट्रक्चर ऑफ वेल्यूज, पृष्ठ १००.
  11. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, चिरगांव झाँसी, साहित्य सदन, संस्करण २००५, पृष्ठ २३३.
  12. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, पृष्ठ २३१.
  13. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, पृष्ठ २३४.
  14. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, पृष्ठ २६४.
  15. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, पृष्ठ ११३.
  16. मैथिलीशरण गुप्त, सिद्धराज, पंचम सर्ग, पृष्ठ १३१.
  17. मैथिलीशरण गुप्त, हिन्दू, पृष्ठ १०२.
  18. मैथिलीशरण गुप्त, साकेत, अष्टम सर्ग, पृष्ठ २२३.
  19. मैथिलीशरण गुप्त, गुरुकुल, पृष्ठ २२.
  20. मैथिलीशरण गुप्त, गुरुकुल, पृष्ठ २६५.
  21. मैथिलीशरण गुप्त, हिन्दू, पृष्ठ १६४.
  22. मैथिलीशरण गुप्त, भारत भारती, पृष्ठ १४४.
  23. मैथिलीशरण गुप्त, हिन्दू, पृष्ठ १०४.
  24. मैथिलीशरण गुप्त, गुरुकुल, पृष्ठ १२३.
  25. मैथिलीशरण गुप्त, भारत भारती, पृष्ठ १६३.
  26. मैथिलीशरण गुप्त, अनघ, पृष्ठ ८०.
  27. मैथिलीशरण गुप्त, कुणाल गीत, पृष्ठ ११२.
  28. मैथिलीशरण गुप्त, गुरुकुल, पृष्ठ ४३.