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मीरा और समाज : एक पुनर्मूल्यांकन

मीरा  और समाज : एक पुनर्मूल्यांकन

- डॉ. सोमाभाई पटेल

 


मध्यकालीन भक्ति युग को ‘सुवर्ण युग’ कहलाने में अनेक संत-कवियों का प्रदान अहमियत रखता है। भक्तिकालीन कवियों ने अनेक आयामों पर अपना जो विचार व्यक्त किया वह न केवल अपनी सीमा तक सीमित रहा, बल्कि कालजयी सिद्ध हुआ। ऐसे कालजयी विचार प्रस्तुत करनेवाले संत-कवियों के नाम लें तो लम्बी फेहरिस्त बन जाएगी। भक्तिकालीन कवियों की अनेक विलक्षणताओं का जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाज को उपयोगी हो, उसका पुनर्मूल्यांकन होना आवश्यक ही; नहीं अनिवार्य है। यों भी किसी रचना या रचनाकार का सही मूल्यांकन समय ही करता है| मध्य युग को स्वर्णिम बनाने में मीराबाई का योगदान कम नहीं। मीरा बार-बार याद की जाने वाली महान कवयित्री हैं। भक्ति आन्दोलन की स्वर्णिम विरासत में मीरा की कविता हमारे आधुनिक समाज के लिए भी पथप्रदर्शक है। “आज यदि स्त्री आन्दोलन को मीरा की कविता में रौशनी नजर आती है या वे साहित्य विमर्श के केंद्र में हैं तो इसका उनकी कविताओं का युगांतकारी प्रभाव है।”१ मीरा न केवल राजस्थान की; परन्तु समूचे भारतवर्ष की बड़ी अनुपम कवयित्री हैं। मीरा की कविता का मर्म आज व्यापक समाज तक पहुचें यह जरुरी है। क्योंकि समीक्षकों, शोधकर्ताओं, संकलनकर्ताओं द्वारा मीरा उतनी मात्रा में याद नहीं की गयी या लोकप्रिय नहीं हुई जितनी मात्रा में भक्तों, साधू-संतों या सरल स्त्री-पुरुषों द्वारा। करुणता यह है कि समाज में मीरा की भक्ति को जितना प्राधान्य दिया है उतना प्राय: उसके जीवन और समाज के पारस्परिक अंत: संबंधों को नहीं दिया।

मीरा के सामाजिक, दार्शनिक विचारों को, मीरा को आज तक़रीबन पांच सौ से अधिक वर्ष बाद याद किया जाना उसकी महत्ता को स्वत: ही उजागर करता है। आशीष सिसोदिया का कहना है, “भक्ति आन्दोलन के प्रेरणास्रोत रामानुज और रामानंद थे। किन्तु मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन की एकमात्र अत्यंत प्रभावशाली महिला भक्त कवयित्री मीराबाई थी, जिसने विरासत में भक्ति का समग्र दर्शन भावी पीढियों को दिया। इसीलिए उसे भक्त शिरोमणि, भक्ति भागीरथी, भक्ति भगवती आदि विशेषणों से सम्बोधित किया जाता है। मीरा जन-जन की पीड़ा को समझती थी। भारतीय हिन्दू जिस मुगलकालीन अन्याय के संकट से गुजर रहा था मीरा ने उस पीड़ा को पहचाना।”२ सारा जग जानता है की मीरा की भक्ति ने राष्ट्रीय स्तर पर लोकोन्मुख, मानवीय, समतामूलक दृष्टि स्थापित की। लेकिन हम यह न भूलें कि वर्तमान नारी सशक्तिकरण के दौर में सामाजिक विषमताओं के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली नारियों में मीरा का नाम भी अमर है।

प्रथम हमारे लिए भारतीय भक्त-कवियित्री समाज में मीरा का स्थान निर्धारित करना उचित होगा। भक्ति आन्दोलन मातृभाषाओं में रचनाशीलता, आत्माभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ सशक्त स्त्री-स्वर को लेकर आया। इस काल में भारत की अन्य भाषाओं में आंदाल (तमिल), अक्का महादेवी (कन्नड़), बहिणा तथा मुक्ताबाई (मराठी) की तरह हिंदी में मीरा की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यूं तो मीरा से पहले कुछ चारण कवियत्रियों (झीमा, पद्मा, कक्रेची, बिरजू) के नाम मिलते हैं, लेकिन सशक्त स्त्री काव्य का आरम्भ मीरा की कविता से माना  जाता है। उनकी आवाज़ में स्त्री-स्वाधीनता की आकांक्षा से प्रेरित स्वर है, जिसे हम स्त्री-चेतना कह सकते हैं। भाव और भाषा की दृष्टि से मीरा ने केवल मध्यकाल की स्त्री-काव्यधारा को प्रभावित नहीं किया; उनके सामाजिक संघर्ष और कविता से आधुनिक काल की कवयित्रियाँ  प्रेरित-प्रभावित हुई हैं। जैसे – आधुनिक मीरा कही जाने वाली महादेवी वर्मा। कवयित्रियाँ ही नहीं; कवि भी प्रभावित हुए हैं। मीरा के महत्व को व्यक्त करते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है:

लाख लोक भय बाधाओं से विचलित हुए न वीरा,

वर गई ब्रज राज पर मानिक मोती हिरा धीरा।

हरि चरणामृत कर वर विष भी पचा गई गंभीरा,

नचा गई नट नागर को भी नाची तो बस मीरा।

भक्ति आन्दोलन की एक बड़ी उपलब्धि मीरा से कवि या भक्त समाज जितना आकर्षित हुआ उतना आलोचना-समाज नहीं। न तो मिश्र बन्धुओं ने ‘हिंदी नवरत्न’ में उसे स्थान दिया; न तो अन्य इतिहास-ग्रंथों में उसे प्राधान्य मिला। शुक्ल, द्विवेदी, नगेन्द्र, नंददुलारे बाजपेयी; यहाँ तक कि रामविलास और नामवर सिंह ने भी उन्हें उतना महत्त्व नहीं दिया जितना अन्य मध्यकालीन कवियों को।

कोई भी रचनाकार अपने समय के सामाजिक परिवेश से निर्मित होता है। मीरा का अवतरण राजनैतिक अस्थिरता के समय हुआ। वह राठौड़ राजघराने की राजकन्या थी। जोधपुर बसानेवाले राव जोधा के पुत्र राव दूदा मेड़ता को फिर से बसाकर उसके अधिपति बने। राव दूदा के सबसे बड़े पुत्र विरमदेव के चौथे पुत्र रतनसिंह की पुत्री मीरा है। मीरा का विवाह चित्तोड़ के राणा भोजराज के साथ हुआ| मीरा के कृष्ण प्रेम को कुल की मर्यादा-भंग करनेवाला कृत्य माना गया। चित्तोड़ में मीरा को अपने स्वीकृत मार्ग पर चलने के लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ा। दुर्भाग्य से पति भोजराज अधिक समय तक जीवित नहीं रहे। लेकिन मीरा ने उस समय राजघरानों में प्रचलित वैधव्य जीवन अपनाने से इंकार कर दिया। इस प्रकार मीरा ने सामाजिक रूढिवादी व्यवस्था का विरोध किया। समाज राजसी सुख व वैभव की जिन्दगी गुजारने के लिए आज भी सभी तरह का छल-कपट, पाखंड, ईर्ष्या आदि अपनाता है, जबकि मीरा ने उसे न केवल छोड़ा; घृणापूर्ण तिरस्कार भी किया। उसने सामंतवादी व्यवस्था तथा उसकी सीमा का अपनी कविता में संकेत किया है। यदि पांचसौ वर्ष बाद आज भी हमारे परिवेश में सामंतवादी जकडन है तो मीरा की हालत का हम अनुमान लगा सकते हैं। अपने समय मीरा अद्वितीय एवं असाधारण मानी जाएगी क्योंकि छत्तीसों राजकुलों एवं पूरी राजपूती प्रथाओं का विरोध करना सामान्य बात नहीं। ऐसा भी कहा जाता है कि पति की मृत्यु पर मीरा को सती होने के लिए कहा गया था लेकिन उसने तब श्वसुर से कहा था कि ‘मैं सती न हूँगी, गिरिधर का गुण गाया करुँगी क्योंकि वही मेरे पति, माता-पिता, भाई सब कुछ हैं आपसे अब ज्येष्ठ पुत्रवधू का सम्बन्ध ही कहाँ रह गया, अब मैं सेवक मात्र रह गयी हूँ।’ गिरधर-गोपाल को पति मानना छोटी बात नहीं है। अत: मीरा को हम नारी चेतना का आद्य प्रवर्तक मानेंगे। अरे ! मीरा ने रैदास को गुरु मानकर जातिगत भेद को भी नकारते हुए समाज को सन्देश दिया।

सत्संग को लेकर ननद ऊदाबाई ने मीरा को लाख समझाने की कोशिश की लेकिन मीरा का उत्तर रहा, ‘मैंने रात-दिन सत्संग में रहकर ज्ञान प्राप्ति की है। मै तो प्रभु गिरिधर नागर के हाथों बिक चुकी हूँ।’ मीरा ने निर्भिकता के साथ सब सामाजिक बन्धनों को तोडने की कोशिश की है। यह पद देखिए :

            “पग बांध घुँघरयां णाच्या री।|

            लोग कह्याँ मिरां बावरी, सासु कह्याँ कुलनासी री।”३  रिश्तेदार या समाज उसे कुलनासी भले ही कहे, मीरा अपने विचारों में अटल रहती है। मीरा ने अपने अस्तित्व को कुचलने नहीं दिया।

युग की ओर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि उस वक्त मीरा का युग राजनैतिक की अपेक्षा धार्मिक दृष्टि से बरजोर था। तब मुगलों का शासन केंद्र दिल्ही था। अत: राजस्थान मुगलों की द्वेषपूर्ण बर्बरता से सुरक्षित था। मीरा के जन्म समय ज्ञानयोग की धारा का पूर्ण प्रभाव था, जो उसके पदों में सहज मिलता है।  मीरा ने अपने पदों में ‘मीरा के प्रभु हरि अविनाशी, देस्यु प्राण अकोरा’ बार-बार कहा है। ‘मैं गिरधर के घर जाऊ|’, ‘हरि थें हरया जण री भीर।’ आदि पदों में भी निर्गुण समर्पण भाव व्यक्त किया है। उसके युग में प्रेमानुबंध धारा भी बरजोर थी। लोग लौकिक भावनाओं के माध्यम से अलौकिक तत्व की प्राप्ति में लगे थे।  ‘हरि म्हारा जीवन प्राण अधार।’, ‘माई री म्हा लियाँ गोविंदानं मोल।’ जैसे कई पद इस धारा से सम्बंधित हैं।  साथ-साथ भक्तिभाव की धारा भी विद्यमान थी| अत: मीरा में ज्ञान-योग, प्रेमानुबंध तथा भक्तिभाव; तीनों प्रकार की भक्ति का प्रभाव देखने मिलता है। कह सकते हैं कि मीरा ने तत्कालीन धार्मिक विचारधाराओं तथा भक्तिधाराओं का समन्वित रूप स्वीकार किया था। धार्मिक संप्रदाय की जो बात उसे अच्छी लगी; अपनाई। इस प्रकार अपने युग में प्रवर्तमान सभी सम्प्रदायों को, धार्मिक समाज को मीरा ने अपने धार्मिक-जीवन में अपनाया|

कुलमिलाकर कह सकते हैं कि मीरा का सामंतवादी उन्मूलन सराहनीय है। उसने पर्दा प्रथा, सती प्रथा, विधवा की करुणता जैसी सामंती मर्यादाओं का सशक्त विरोध किया। जीवन-व्यवहार में उसकी त्याग-भावना समाज के लिए प्रेरणा समान है। यों तो मीरा के जीवन का महत्वपूर्ण अंग भक्ति और दर्शन है, फिर भी उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि वन्दनीय, सराहनीय है, वर्तमान प्रासंगिक है।

 

सन्दर्भ-संकेत :

  • अरुण चतुर्वेदी (सं.), मीरा एक मूल्यांकन, पृ. प्राक्कथन से
  • वही, पृ. १११
  • डॉ. कृष्णदेव शर्मा (सं.), मीराबाई-पदावली, पृ. १२१

प्रस्तुतकर्ता:

डॉ. सोमाभाई पटेल

हिंदी विभाग,

नीमा गर्ल्स आर्ट्स कॉलेज,गोज़ारिया-३८२८२५