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अष्टछाप के कवि और उनका कर्त्तव्य

अष्टछाप के कवि और उनका कर्त्तत्व

 

डॉ. योगेश राव

  6/666, विकास नगर,

                                    लखनऊ, (उत्तर प्रदेश),

                                       पिन-226022

                                            मोबाईल न.- 09452732748

                                      Email: yogesh2011rao@gmail.com

   

     ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम ऋषि-रूप में मिलता है। इसके बाद छान्दोग्योपनिषद् में कृष्ण ऋषि अंगिरा के शिष्य और देवकी-पुत्र के रूप में उल्लिखित हैं। ‘महाभारत’ में गीता का ज्ञानपरक उपदेश देते समय कृष्ण का विराट रूप चित्रित है। यहाँ वो एक योद्धा, योगी और परमज्ञानी के रूप में चित्रित हैं। 200 ई. पू. के आस-पास गीता के एकांत ब्रह्मकृष्ण को वासुदेव धर्म की मान्यताओं के अनुसार ‘परमभागवत’ और ‘लीलाधारी कृष्ण’ के रूप में कल्पित किया गया है। इसके बाद हरिवंशपुराण, वायुपुराण, वाराहपुराण, अग्निपुराण तथा भागवत पुराण में कृष्ण को नारायणी अवतार मान लिया गया।

     कृष्ण की उत्कट भक्ति-भावना का उदय श्रीमद्भागवतपुराण (10 वीं शती ) से हुआ। भागवतपुराण के आधार पर ही ‘नारद्भाक्तिसूत्र’ तथा ‘शाण्डिल्यभक्तिसूत्र’ की रचना हुई और कृष्ण विष्णु के अवतार रूपों में भक्तों के आराध्य बन गए। भागवत में कृष्ण के बालजीवन की लीलाओं का वर्णन अधिकांश मात्रा में है। यहाँ कृष्ण के साथ गोपियों का तो उल्लेख हुआ है, परन्तु राधा की कहीं भी चर्चा नहीं है। यहाँ एक ऐसी गोपी की चर्चा है जो मनसा, वाचा, कर्मणा कृष्ण की आराधना करने वाली है। हो सकता है, आगे चलकर इसी आराधना के आधार पर ‘राधा’ नाम की कल्पना की गयी हो। ‘राधा’ शब्द संस्कृत के ‘राध’ धातु से बना है जिसका अर्थ है- ‘सेवा करना या प्रसन्न करना’। हिंदी क्षेत्र से सर्वप्रथम कृष्णभक्ति का प्रचार करने वाले मध्वाचार्य ( द्वैतवाद 1199-1278 ) ने भी कृष्ण के साथ राधा की चर्चा नहीं की। अब तक हुई खोजों के आधार पर मध्व के बाद रचित ‘गोपाल तापनी उपनिषद्’ में राधा की चर्चा कृष्ण की प्रेयसी के रूप में सर्वप्रथम मिलती है। बाद में विकसित विष्णुस्वामी के ‘शुद्धाद्वैतवाद’ और निम्बार्क के ‘द्वैताद्वैतवाद’ में कृष्ण के साथ राधा का भी उल्लेख मिलने लगता है। इन आचार्यों ने कृष्ण को परब्रह्म के अवतार के रूप में तथा राधा को उनकी लीला-सहचरी के रूप में कल्पित किया है।

     कृष्ण की ललित भक्ति की काव्य में पूर्ण प्रतिष्ठा जयदेवकृत गीतगोविन्दम (12 वीं शती-1170 ई.) में हुई। इसके बाद विद्यापतिकृत पदावली (मैथिली भाषा) में राधा और कृष्ण के उन्मुक्त प्रेम का चित्रण हुआ। विद्यापति पर बंगाल के चैतन्य संप्रदाय की मान्यताओं का बहुत अधिक प्रभाव है।

     हिंदी में कृष्णभक्ति की पूर्ण प्रतिष्ठा ‘वल्लभाचार्य’ के हाथों हुई। उन्होंने कृष्णभक्ति के सैद्धांतिक आधार के रूप में विष्णुस्वामी के शुद्धाद्वैतवाद की विशद व्याख्या की और भक्ति का सर्वथा नवीन मार्ग चलाया जिसे ‘पुष्टिमार्ग’ कहा गया। वल्लभाचार्य ने कृष्ण का अनुग्रह (कृपा ) प्राप्त करना ही भक्ति का एकमात्र उद्देश्य माना। कृष्ण की इसी अनुग्रह-प्राप्ति को ही वे पुष्टि कहते हैं। पुष्टि के उन्होंने चार भेद किये: (1) प्रवाहपुष्टि- गृहस्थ जीवन में भी रहकर की जाने वाली भक्ति। (2) मर्यादापुष्टि- विरक्ति जीवन बिताते हुए भजन, कीर्तन, मनन द्वारा की गयी भक्ति। (3) पुष्टिभक्ति- ईश्वर की कृपा द्वारा प्राप्त ज्ञान का अधिकारी बनना। (4) शुद्ध-पुष्टि-भगवान से अमित प्रेम करना ही शुद्ध-पुष्टि है। इस प्रेम के तीन सोपान है- प्रेम, आसक्ति और व्यसन। कृष्ण-काव्यों में गोपियों की भक्ति इसी कोटि की है।

     वल्लभाचार्य के बाद उनके सुयोग्य पुत्र स्वामी विट्ठलनाथ ने कुछ अपने पिता तथा कुछ अपने शिष्यों को लेकर एक ‘अष्टछाप’ नामक कवि समूह की स्थापना की। इन आठ भक्त-कवियों के हाथों कृष्ण की ललित भक्ति आध्यात्मिकता के साथ ही उच्चकोटि की साहित्यिकता से भी मंडित हो गयी। अष्टछाप के अंतर्गत आनेवाले कवियों के नाम हैं- सूरदास, कुम्भनदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी तथा चतुर्भुजदास। इन आठ कवियों में सूरदास और नन्ददास उच्चकोटि के काव्यग्रंथो के प्रणयन तथा पुष्टिमार्गी भक्ति-सिद्धांतों के अनुसरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

     अष्टछाप के कवियों में सूरदास और नन्ददास की रचनाएँ विशेष महत्व की है। अन्य कवियों में कुम्भनदास के कुछ भक्ति सम्बन्धी फुटकर पद भर मिलते हैं। उनका निम्नलिखित पद उल्लेखनीय है-

“भक्तन को कहा सीकरी सों काम।

आवत जाति पन्हैया टूटी बिसरि गयो हरिनाम।I”1

 

    यह पद उनके अनासक्त-भाव का सूचक। परमानन्ददास ने भी कृष्ण की भक्ति, वात्सल्य और प्रेम का वर्णन फुटकर पदों में किया है। इनकी पुस्तक ‘परमानंदसागर’ प्रसिद्ध है। इनके पदों में भाषा का लालित्य दर्शनीय हैं। प्रेम-पीर से व्यथित एक गोपी की उक्ति द्रष्टव्य है:

“जब ते प्रीत श्याम ते कीनी।

ता दिन ते मेरे इन नैननि नेंकहु नींद न लीनी।I”2

 

    कृष्णदास ने राधा और कृष्ण के श्रृंगार से सम्बन्धित सुन्दर गेय पदों की रचना की है। अष्टछाप के कवियों में सूरदास और नन्ददास के बाद कवित्व की दृष्टि से इन्हीं का स्थान है। छीतस्वामी के सरस पद और गीत उनकी ब्रजभूमि के प्रति अटूट आसक्ति के परिचायक है। निम्नलिखित पद में ब्रजधाम के प्रति उनकी आस्था द्रष्टव्य है:

                    

“अहो विधना ! तो पै अंचरा पसार मांगौं

जनम-जनम दीजो मोहि याही ब्रज वसिनौ।”3

 

    गोविंदस्वामी के पद भक्ति से सराबोर होने के साथ ही उच्चकोटि की संगीतात्मकता से युत हैं। चतुर्भुजदास ने भक्ति और श्रृंगार सम्बन्धी पदों की रचना अत्यंत सरस तथा सुव्यवस्थित ब्रजभाषा में की हैं। इनकी तीन पुस्तकें- ‘द्वादश यश’, ‘हितजू को मंगल’ और ‘भक्ति प्रकाश’ तथा कुछ फुटकल पद भी प्राप्त हुए हैं। भाषा और कविता साधारण कोटि की है। सूर और नन्ददास की भांति व्यवस्थित ढंग से काव्यबद्ध सिद्धांत का प्रतिपादन ऊपर गिनाये गए छ: कवियों में नहीं मिलता। इन दोनों कवियों के समान उच्चकोटि की कव्यात्मक कृतियों का प्रणयन भी ये कवी नहीं कर सके। यही कारण है कि अष्टछाप के कवियों की चर्चा उठने पर सूरदास और नन्ददास के ही कर्त्तत्व पर विशेष ध्यान जाता है।

     सूरदास वल्लभाचार्य  के शिष्य थे। ये अभूतपूर्व प्रतिभा-संपन्न जन्मांध व्यक्ति बताये जाते हैं। सूरदास की तीन रचनायें बतायी जाती हैं: (1) सूरसागर, (2) सूरसारावली, (3) सहित्यलहरी / इनकी सर्वप्रमुख रचना ‘सूरसागर’ है। इसमें सूर द्वारा गाये गये कृष्ण के लीला-पदों का संकलन, उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने किया। प्रारंभ में इन पदों की संख्या सवा लाख बतायी जाती थी, परन्तु आजकल प्राप्त होने वाले सूरसागर में लगभग पांच हजार पद हैं। ‘सूरसारावली’ सूरसागर का ही सार बताई जाती है। इसमें कुल 1103 पद हैं। परन्तु सूरसागर और सूरसारावली के वृतांतों में पर्याप्त भेद है। कुछ घटनाएं और कुछ वर्णन तो एक दूसरे के सर्वथा विपरीत है।

     ‘साहित्य लहरी’ नायिका-भेद से सम्बंधित श्रृंगार का ग्रन्थ है। ऐसा प्रसिद्ध है कि सूर ने इसकी रचना नन्ददास को काव्यशास्त्र का ज्ञान कराने के लिए की। परन्तु किसी भी दृष्टि से यह श्रृंगारिक कृति सूरदास की रचना नहीं लगती।

     सभी विवादों से परे ‘सूरसागर’ सूर की एकमात्र रचना मानी गयी है। यह कृति ही इतनी महत्वपूर्ण है कि सूरदास को हिंदी के श्रेष्ठ कवि का पद प्रदान कर देती हैं। इसमें कुल 12 स्कंध हैं, और इसमें कृष्ण की बाल्यावस्था से लेकर उनकी युवावस्था तक के चरित्र का गान किया गया हैं। श्रीमद्भागवतकी कथा पर आधारित यह मुक्तक शैली में लिखा गया काव्य है। ‘सूरसागर’ हिंदी का एक श्रेष्ठ गीतिकाव्य भी है। काव्यात्मक दृष्टि से इसका दशम स्कंध अत्यंत सराहनीय है। सारा का सारा सूरसागर राधा-कृष्ण या फिर गोपी-कृष्ण की मादक लीलाओं से ओतप्रोत है। वल्लभाचार्य के शिष्य होते हुए भी सूर ने अपने द्वारा रचित कृष्णचरित की पुष्टिमार्गीय सिद्धन्तों की कारा में में नहीं बंद होने दिया।

    सूरदास के कवित्व के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी यह कथन विशेषरूप से उल्लेखनीय है- “सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकारशास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है। वह अपने को भूल जाता है। काव्य में इस तन्मयता के साथ शास्त्रीय पद्धति का निर्वाह विरल है। पद-पद पर मिलने वाले अलंकारों को देखकर भी कोई अनुमान नहीं कर सकता, कि कवि जान-बूझकर अलंकारों का उपयोग कर रहा है। पन्ने-पर-पन्ने पढ़ते जाइये : केवल उपमाओं और रूपकों की घटा, अन्योक्तियों का ठाठ, लक्षण और व्यंजना का चमत्कार- यहाँ तक कि एक ही चीज दो-दो, चार-चार, दस-दस बार तक दुहराई जा रही है, फिर भी स्वाभाविक और सहज प्रवाह कहीं भी आहत नहीं हुआ। “4     

     नन्ददास’ सूरदास के बाद अष्टछाप के दूसरे के प्रसिद्ध कवि हैं। ये स्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य हैं। इन्होंने अपने काव्यों में पुष्टिमार्गी भक्ति के सिद्धातों का भली-भांति प्रतिपादन किया है। सूर की भांति स्वछन्द न रहकर ये सर्वत्र अपने सम्प्रदाय के सिद्धातों से बंधकर चले हैं। नन्ददास संस्कृत भाषा और संगीत के अच्छे जानकार थे ! इनका प्रारम्भिक जीवन बहुत ही लम्पटता-भरा बताया जाता है। वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित होने के बाद ये सूर के संसर्ग में रहकर अपनी वासनात्मक भावनाओं पर विजय पाने की चेष्टा करने लगे। नन्ददास स्वाभाव से रसिक और प्रेम के अति-स्वछन्द चितेरे कवि हैं। वल्लभाचार्य की पुष्टिमार्गी प्रेमलक्षणा भक्ति का विधिवत प्रतिपादन इनके काव्यों में मिलता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नंददास के संदर्भ में लिखते हैं- “उनकी भाषा प्रौढ़ और मार्जित है, विचार-पद्धति शास्त्रीय और पुष्टिमार्गसम्मत है। सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षितपटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपिकाओं में नहीं पाया जाता ! ‘भ्रमरगीत’ में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जातीं, बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती हैं और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती हैं। निर्गुणभाव का प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नंददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है, जबकि नंददास का अस्त्र युक्ति और तर्क; फिर भी नंददास की रचनाओं में अपना मोहक सौन्दर्य हैं। शब्दानुप्रासों के झंकार से वे ऐसे वातावरण की सृष्टि करते हैं की पाठक अभिभूत हो जाता है। शब्दों की ध्वनि और गंभीरता एक दूसरे से स्पर्धा करती हुई आगे बढ़ती है। अष्टछाप के किसी भी दूसरे कवि में शब्द-गठन की और ध्वनि निर्माण की ऐसी क्षमता नहीं है।”5

     नागरी प्रचारिणी सभा की खोज-रिपोर्टों के आधार पर नन्ददास की कुल सोलह प्रमाणिक रचनाओं का पता चलता हैं: (1) अनेकार्थ भाषा (शब्दकोष), (2) अनेकार्थ मंजरी (पर्यायवाची कोष ); (3) जोगलीला (कृष्ण का योगी के रूप में राधिका के पास जाना), (4) दशमस्कंध भागवत (भागवत के दशम स्कंध का भाषानुवाद); (5) नामचिंतामणि माला (कृष्ण नामावली), (6) नाममाला (भिन्न-भिन्न विषयों के विविध नाम), (7) नासिकेतु पुराण भाषा (गद्य); (8) रासपंचाध्यायी (गोपियों के साथ कृष्ण की रासलीला का वर्णन); (9) विरहमंजरी, (10) भँवरगीत (गोपी-उद्धव संवाद-सगुण-निर्गुणवाद); (11) रसमंजरी (नायिका-भेद का ग्रन्थ); (12) राजनीति हितोपदेश; (13) रूक्मिणी-मंगल (रूक्मिणी-हरण की कथा); (14) श्याम-सगाई; (15) मानमंजरीमाला; (16) फुटकर पद /

     नन्ददास की उपर्युक्त रचनाओं में कवित्व की दृष्टि से ‘रसपंचाध्यायी’ और ‘भँवरगीत’ उच्चकोटि की रचनाएँ हैं। इन दोनों में कवि की उच्चतम कवित्व प्रतिभा का दर्शन होता है। हिंदी ब्रजभाषा काव्य में नन्ददास को श्रेष्ठ स्थान दिलाने वाली ये ही दो रचनाएँ हैं। नाभादास ने ‘भक्तमाल’ में नन्ददास की प्रशंसा करते हुए लिखा है-

लीलापद रसरीति ग्रन्थ रचना में आगर।

सरस युक्तियुत युक्ति, भक्तिरस गान उजागर।I

प्रशंसा के शब्द नन्ददास की कविता के लिए हल्के ही हैं /

    अष्टछाप के कवियों की विशेषताओं को उल्लिखित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- “अष्टछाप के सभी कवियों में लीलागान और भगवान का रूप-माधुर्य करने वर्णन की प्रवृत्ति है। प्रायः ही लोग ये लोग इस संकीर्ण सीमा के बाहर नहीं गए। केवल नंददास ने कुछ अन्य विषयों को भी अपनी कविता का विषय बनाया था। इनकी रचनाओं में जिस प्रकार की प्रौढ़ और परिमार्जित भाषा का व्यवहार है, उसकी एक निश्चित परंपरा होनी चाहिए, वह एक दिन की गढ़ी हुई भाषा नहीं है। उसके पीछे निश्चित रूप से कुछ शताब्दियों का इतिहास होना चाहिए। निस्संदेह यह तत्काल प्रचलित लौकिक रीति-परंपरा का ही रूपांतर है। इस भक्ति भाव की रचना के प्रचार के बाद लौकिक रस की परंपरा फीकी पड़कर निर्जीव हो गई। इन कवियों ने उसमें नया प्राण संचारित किया और नया तेज भर दिया। परवर्त्ती काल की ब्रजभाषा को लीलानिकेत भगवान् श्रीकृष्ण के गुणगान के साथ एकांत भाव से बाँध देने का श्रेय इन्हीं कवियों को प्राप्त है।“6

    अष्टछाप से अलग हिंदी कृष्ण भक्त कवियों में हितहरिवंश (हितचौरासी); मीरा (मीरापदावली); नरोत्तमदास (सुदामाचरित); रसखान (प्रेमवाटिका, सुजानरसखान); श्रीभट्ट, व्यासजी, निपट-निरंजन, बलभद्रमिश्र, गणेशमिश्र, कादिरमोहन, मुबारक, बनारसी दास, ध्रुवदास, सुन्दरदास, चतुरदास, धर्मदास, भुवाल, रसिकदास, हरिवल्लभ, जगतानंद आदि उल्लेखनीय हैं। मीराबाई के अतरिक्त और कई स्त्री-कवियित्रियों ने भी कृष्णचरित का गुणगान किया हैं। इनमें प्रवीणराय, कुंवारिबाई, साईं, रसिकबिहारी, सुन्दर कुंवरि, रत्नकुंवरि, ताज, शेख, दयाबाई, सहजोबाई आदि के नाम लिए जा सकते हैं।

     हिंदी कविता का रीतिकाल भी राधा-कृष्ण की महिमा से मण्डित हैं। रीतिकालीन दरबारी कवियों ने राधा-कृष्ण का चित्रण ललित नायिका-नायक के रूप में किया। रीतिकाल के बाद आधुनिक काल में भी कृष्ण के चरित्र को आधार बनाकर रचनाएँ हुईं। पर इनमे पौराणिक राधाकृष्ण का चरित्रयुगीन धारणाओं के अनुरूप बदला हुआ मिलता है। ऐसी रचनाओं में ‘हरिऔधकृत’ ‘प्रियप्रवास’; द्वारिकाप्रसादमिश्रकृत ‘कृष्णायन’ तथा धर्मवीर भारतीकृत ‘कनुप्रिया’ की गणना की जा सकती है।

 

सन्दर्भ:-

  1. हिंदी साहित्य का इतिहास, संपादक- डॉ. नागेन्द्र, मयूर पेपरबक्स नोएडा, पृष्ठ-205, तीसरा संस्करण, 2004
  2. हिंदी साहित्य का इतिहास, संपादक- डॉ. नागेन्द्र, मयूर पेपरबक्स नोएडा, पृष्ठ-206, तीसरा संस्करण, 2004
  3. हिंदी साहित्य का इतिहास, संपादक- डॉ. नागेन्द्र, मयूर पेपरबक्स नोएडा, पृष्ठ-211, तीसरा संस्करण, 2004
  4. हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ- 107, प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1 बी., नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, संस्करण- 2003
  5. हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ- 110, प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1 बी., नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, संस्करण- 2003
  6. हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ- 111, प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1 बी., नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, संस्करण- 2003