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कला से कविता का सृजन करता कवि

कला से कविता का सृजन करता कवि

डॉ अल्पना सिंह

सहायक प्राध्यापक-हिंदी

बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर

(केन्द्रीय) विश्वविद्याल, लखनऊ


 

‘मन जितना अधिक शब्द और अर्थ मरण रमता है उससे अधिक उसे रूप आकार भाते हैं|’ (नाँव के पाँव)

‘कला का स्थान मानव विकास में दर्शन आदि से किसी भी प्रकार कम महत्त्व नहीं रखता। कला का प्रभाव विश्वजनीन है। इस दृष्टि से वह भाषा के सीमित माध्यम से व्यक्त होने वाले सभी प्रकार के साहित्य से ऊपर उठी हुयी लगती है।’ (प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला)

उपरोक्त दोनों कथन डॉ जगदीश गुप्त के है। इस कथन से साहित्य पर कला की श्रेष्ठता सम्बन्धी उनकी विचारधारा का पता चलता है। साहित्य में बिरले ही ऐसे साहित्यकार होते हैं तो साहित्य के समानांतर ही इतर कलाओं से भी सम्बद्धता रखते हैं। जगदीश गुप्त भी महादेवी वर्मा की ही भांति कवि होनें के साथ ही कुशलहस्त चित्रकार भी थे। वह अपना चित्रकला से अटूट सम्बन्ध स्वीकार करते हुए कहते हैं कि- ‘कविता और चित्रकला दोनों युगपथ के रूप में मेरे भीतर एक स्रोत के रूप में प्रवाहित होते रहते हैं। कविता मेरे लिए अलग से प्रेरणास्रोत कभी नहीं रही। यही नहीं, समग्र द्रष्टि मेरी कविता व चित्रकला तक सीमित नहीं है, प्रागैतिहासिक चित्र भी मुझे निरंतर प्रेरित करते हैं।’ ऐसा नहीं है कि वह कला के प्रति आसक्त ही थे। उनका यह कहना कि ‘प्रागैतिहासिक चित्र’ भी उन्हें निरंतर प्रेरित करते हैं, से यह स्पष्ट होता है कि उन्हें कलाओं की बारीक समझ ही नहीं थी वरन वह इसमें पारंगत भी थे। कला और कविता दोनों उनके व्यक्तित्व का प्रमुख भाग रहे हैं। साहित्य में ऐसे व्यक्तित्व की धनी छायावाद की प्रमुख आधार स्तम्भ महादेवी वर्मा जी मानी जाती है। उन्हें भी कलाओं के प्रति ऐसा ही अनुराग था। उनकी कवितायें चित्रात्मक और चित्र काव्यात्मक होते थे। रेखाओं से उनका भी विशेष लगाव था। गुप्त को कलाओं में भी चित्रकला विशेष आकर्षित करती रही। उन्होंने माना कि ‘चित्रकला का अस्तित्व अन्य सभी कलाओं तथा काव्य रूपों में अंतर्व्याप्त है’|

ऐसा माना जाता है कि एक अच्छा कवि भीतर से कहीं न कहीं एक चित्रकार भी होता है। जगदीश गुप्त भी इसका अपवाद नहीं हैं। उन्होंने तो विधिवत इसकी शिक्षा भी प्राप्त की थी। आचार्य क्षितिन्द्रनाथ मजूमदार से उन्होंने कला सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त किया था। भारतीय कला और संस्कृति के प्रति उन्हें ख़ास आकर्षण रहा है। वह कला को साधन नहीं मानते थे बल्कि यह उनके लिए साध्य है, साधना है, अपने साहित्य को परिष्कृत करने का। वह मानते हैं कि- ‘रचना धर्म पर आस्था मनुष्य को महानाश से उबार लेती है और वह स्वभावतः सृजन कर्म में संलग्न हो जता है। ‘निर्माण’ और ‘नाश’ की निर्वैयक्तिकता की जगह मैं  ‘सृजन’ और ‘विलयन’ को अधिक उपयुक्त मानता हूँ क्योंकि यख शब्द-युग्म रचनाधर्मिता से विशेष संगति रखता है। इसमें मनुष्य के रचनाशील स्वभाव को तात्विक स्वीकृति मिलती है और इस प्रकार उसे नया अर्थ भी मिल जाता है।’

अपने कविता संग्रह ‘नांव के पाँव’ की भूमिका में गुप्त नें लिखा है कि- ‘मन जितना अधिक शब्द और अर्थ में रमता है उससे अधिक उसे रूप आकार भाते हैं| ...कवितायें लिखने से अधिक चित्र बनाना रचता है। इसी स्वभाव नें मुझे इस संग्रह की हर कविता को रूपाकारों में अलंकृत करने के लिए प्रेरित किया|’ इस वक्तव्य से उनकी चित्रकला के प्रति रूचि ही प्रदर्शित होती है। उनका यह प्रयास साहित्य की दृष्टि से एक प्रयोग कहा जा सकता है। 

गुप्त नई कविता के पुरोधा माने जाते है। साहित्य में वह ब्रजभाषा में पांरगता और कुशल चित्रकार होने के साथ ही साथ वह अपने विशिष्ट बिम्ब विधान के लिये पहचाने जाते है। साहित्य में उनकी देन प्रमुख रूप से ‘नई कविता’ पत्रिका का कुशल सम्पादन है। ‘नई कविता’ पत्रिका इलाहाबाद से आरम्भ हुई। ’आलोचना’ त्रैमासिक के सम्पादक मंडल की बैठक में यह निर्णय हुआ कि इलाहाबाद के युवा लेखकों के सहकारी प्रकाशन ’कविता प्रकाशन’ की ओर से ‘नई कविता’  शीर्षक से एक अर्द्धवार्षिक पत्रिका का प्रकाशन किया जाय।’1 इसी निर्णय के फलस्वरूप गुप्त और राम स्वरूप चतुर्वेदी के सम्पादन में यह पत्रिका 1954 ई0 में प्रकाशित हुई। ‘इस पत्रिका के माध्यम से जगदीश गुप्त ने इस आन्दोलन को संज्ञा प्रदान की और उसकी विशद समीक्षा भी की।’

नई कविता की प्रमुख विशेषता यह है कि इसने भारतीय समाज के यर्थाथ को सही अर्थों में अभिव्यक्त किया। ‘प्रयोगवाद ने क्षणवाद, बुद्धिवाद, व्यक्तिवाद, लघुमानववाद आदि को वरीयता प्रदान की थी, नयी कविता ने उसे भी आत्मसात कर लिया और दूसरी ओर नये बिम्ब, नये प्रतीक, नयी व्यावहारिक भाषा, गद्यात्मकता अदि को भी वरण किया। नई कविता ने अभिव्यक्ति के संकट की चर्चा करते हुए काव्य को रोमनी स्तर से ऊपर उठाया और साथ ही यथार्थवाद की सीमाओं का अतिक्रमण करके उसे अतियथार्थ वाद तक विकसित किया। यह कविता युगजीवन की जटिल विडम्बनाओं विसंगतियों की देन है। इसमें एक ओर अतिबौद्धिकता है, दूसरी ओर लोकवार्ता का स्वाभाविक उद्गार भी|’2 इसके साथ ही विविध विशेषताओं से युक्त इस कविता को गुप्त ने अपने विचारानुसार अभिव्यक्त किया। उन्होंने नई कविता की मात्र तीन प्रमुख प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है। प्रथम विद्रोह-वृत्तियुक्त मानववादी जीवन दृष्टि, द्वितीय-स्वातन्त्र्य कामना से उत्पन्न छन्द मुक्ति तथा तृतीय-जागरूक व्यक्ति चेतना के साथ सामाजिक दायित्व।3 यह विशेषता उनके काव्य में भी यत्र तत्र दिखाई देती है। जीवन की बिडम्बनाओं का चित्रण उनकी प्रमुख विशेषता है। वह लिखते है-

‘हिसां प्रतिहिसां की

श्रंखला रचकर

मानवता को बलात

बन्दी बनाने वाले

इस देश के कुशल प्रशासन की

कितनी प्रशंसा की जाये

वह हर बार

इस विडम्बना को समझने में

असमर्थता का नाटक कर के

साम्प्रदायिक दंगो को रोकने का

भरपूर प्रयास करता है

और चाहता है कि उसकी

असमर्थता को

हम अपनी असमर्थता माने।’4

           

यह है देश के कुशल प्रशासकों का यथार्थ और यही है जागरूक व्यक्ति चेतना के साथ-साथ उसका सामाजिक दायित्व, जिसे गुप्त ने नई कविता की प्रमुख विशेषता माना है। उनके द्वारा अभिव्यक्त स्वातन्त्रय कामना छन्द उनकी कविताओं में दृष्टव्य होती है। यह स्वातन्त्र्य कामना मुक्ति के साथ ही साथ उनके द्वारा प्रयुक्त बिम्ब विधान में भी दिखाई देती हैं जिसके लिए वह पहचाने जाते हैं । प्रस्तुत पंक्तियाँ उनके विशिष्ट बिम्ब को ही अभिव्यक्त करती हैं-

‘कवियों के कर से जैसे

प्याली मरंद की छलकी

मेरे प्राणों में गूंजी

रूनझुन रूनझुन पायल की।’5

 

इतना ही नहीं यह स्वातन्त्र्य कामना छन्द तथा बिम्ब से गुजरती हुई उनकी भाषा में भी पहुँच जाती है यही कारण है कि ‘विद्रोह वृत्ति से युक्त मानववादी जीवन दृष्टि को प्रमुखता’ देने की पक्षधरता करते हुये भी वह ब्रजभाषा में भी कविता करते है। यद्यपि नई कविता के विषय में उनका विचार है कि- ‘नई कविता बैद्धिकता की छाया में विकस रही है अतः उसमें एक अन्तर्निहित  अलोचनात्मकता मिलती है। यथार्थ चित्रण का आग्रह, सूक्ष्म व्यंग्य, शैलीगत वैचित्र्य एवं नये-नये अर्थों को ध्वनित करने वाले अभिनव प्रतीक विधान अदि जिन्हें कविता की प्रमुख विशेषता कहा जा सकता है, सभी के पीछे प्रेरणा का बुद्धिगत रूप स्पष्ट झलकता है।’6 किन्तु उनका कवि हृदय इस बौद्धिकता को आत्मसात करते हुये भी भावात्मकता को नहीं छोड़ पाता है। उनके द्वारा अभिव्यक्त स्वातन्त्र्य कामना से उत्पन्न छन्द मुक्ति का उदाहरण ब्रजभाषा की उनकी कविता की कुछ पंक्तियों में दृष्टव्य है-

‘गालन पै हिलै लाल गुलाब,

खिलै मुख देखि सरोज हजारन

बालकी बंक विलोकनि में

बिकसे छनही छन ओज हजारन।’7

 

गुप्त की कविताओं का सूक्ष्मता से अवलोकन करनें पर तथा उनके द्वारा नई कविता के सम्बन्ध में अभिव्यक्त विचार एक ही सिक्के के दो पहलू के समान है। उन्होंने नई कविता पर गहनता से विचार किया और अपने मौलिक मानदंड स्थापित किये। उन्होंने जितने भी विचार इस सन्दर्भ में व्यक्त किये वह सभी विविध शीर्षक द्वारा, निबन्धों के रूप में ‘नई कविताः स्वरूप और समस्यायें’  नामक संग्रह में संकलित है| यह रचना उनके विचारों को जानने व समझने का प्रमाणिक दस्तावेज है।

जिस तरह मुक्तिबोध कहते हैं कि हर कविता लिखने के बाद उन्हें लगता है कि उस पर कहानी लिखनी चाहिए उसी प्रकार गुप्त भी कविता के समानांतर चित्रों से अभिव्यक्त होना चाहते हैं। उन्होंने कला सम्बन्धी कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ भी लिखे। जिनमें ‘प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला’, ‘भारतीय कला के पदचिह्न’, ‘चित्रकला और कविता का साहचर्य’, ‘युग्म’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। अपने ग्रन्थ ‘भारतीय कला के पद-चिह्न’ में उन्होंने चित्रकला और मूर्तिकला पर चिंतनपरक अद्ध्ययन  किया है। वह लिखते हैं कि- ‘चित्रकला सब कलाओं की ‘आँख’ है। उसका अस्तित्व अन्य सभी कलाओं तथा काव्य रूपों में अंतर्व्याप्त है। साहित्य में प्रयुक्त ‘लेखन’, ‘वर्णन’, ‘अंकन’, ‘प्रदर्शन’, ‘निदर्शन’ तथा ‘रंजन’ इसी सत्य के प्रमाण हैं।’ इसके साथ ही उन्होंने इन विषयों पर अपनी रचनाओं में विस्तार से प्रकाश डाला है।

साहित्य को मात्र साहित्यिक दृष्टि से देखना उसे संकुचित कर देना है। ‘गुप्त कला को तथा मनुष्य की रचनाधर्मिता को महत्त्वपूर्ण मानते हैं, जिनके द्वारा मनुष्य अन्य भौतिक पदार्थों तथा जीव-जगत से वरीय बनता है तथा अपनी अलग पहचान बनाता है। संभवतः इसी भावना से प्रेरित होकर गुप्त नें ‘भारतीय कला के पद-चिहन’ नामक पुस्तक के द्वारा भारतीय कला पर विशेष प्रकाश डालने का प्रयास किया। यह पुस्तक चार खंडों में विभाजित है। प्रथम खंड प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला से सम्बंधित है। इसी खंड में आधुनिक चित्रकला का मूलाधार तथा आधुनिक कला की लोकोन्मुख धारा का विवेचन किया गया है। द्वितीय खंड में मूर्तिकला से सम्बंधित विचार प्रस्तुत हुए हैं। इस खंड में उन्होंने मंदिरों में प्रणयलीन मैथुन मूर्तियों का सम्यक विवेचन किया है। कला के परिप्रेक्ष्य में श्लील-अश्लील के विवाद के सम्बन्ध में लेखक नें तटस्थ तथा महत्त्वपूर्ण समीक्षा प्रस्तुत की है। इस खंड के लेख का अनुवाद कन्नड़ भाषा के श्री वी.के.वेंकटेश द्वारा तथा गुजराती भाषा में रविशंकर द्वारा किया गया। इससे इस लेख की उपयोगिता सिद्ध होती है। पुस्तक का तीसरा खण्ड ‘कला-शिल्प’ से सम्बन्धित है। भारतीय कला के प्रमुख प्रतीकों जैसे ‘स्वस्तिक’, ‘चक्र’ आदि का इस खंड में विस्तृत विवेचन किया गया है, जो कला जिज्ञासुओं और साहित्यकारों के लिए उपयोगी है। इनमें वैदिक साहित्य में ‘शिल्प’ की चर्चा की गयी है। चतुर्थ खंड में ‘कला-संस्कृति’ से सम्बंधित लेख संग्रहित हैं।8 उनकी कविताओं में भी उनकी चित्रात्मकता दृष्टव्य होती है। उनकी कविताओं के छायाबिम्ब किसी चित्रों की तरह ही ह्रदय पर अपनी छाप छोड़ते हैं। जैसे उनकी एक कविता की पंक्तिया हैं-

‘कोउ प्रभात के पंकज की,

पंखूरीन पै ओस के बिंदु बतावै।

कोउ कहै जुग सीपिन मैं,

मुकुताहल की अवली छवि छावै|’9

इस प्रभात के पंकज और मुक्ताहल की छवि हो याकि ‘वर्षा और भाषा’ कविता की भादों की कारी रात हो-

‘भादों की कारी अंधियारी में,

रह-रह कर

बिजली सी उक्ति चमक जाती है

वाणी की सोने सी देह दमक जाती है

वर्षा की बूंदों में

बूंदों की वर्षा में

शब्द अर्थ मिलते हैं

जीवन सब तुलना है।10

यह कवितायें पढ़ते हुए पाठक के मानस पटल पर कुछ चित्र से अंकित होते जाते हैं। जो अमित होते हैं। कविता के अलग हो जाने के बाद भी यह चित्र अलग नहीं होते हैं, वे अपना प्रभाव व्यापक रूप से छोड़ते हैं। गुप्त की एक पुस्तक ‘युग्म’ है। ‘इस संग्रह में उन्होंनें चित्रों तथा कविताओं का अद्भुत समन्वय किया है। वह अपनी यात्रा क्लासिक शैली से प्रारम्भ करते हैं फिर रोमानी प्रवृत्ति से प्रभावित होते हैं और तत्कालीन जीवन दृश्यों और यथार्थ के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया है| ‘प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रकला’ पुस्तक भी इस लिहाज़ से उल्लेखनीय है। इसमें प्रागैतिहासिक काल की चित्रकला पर विस्तार पूर्वक विचार किया गया है। ‘इस पुस्तक में गुप्त नें भारतवर्ष में प्रागैतिहासिक चित्रों की उपलब्धि के प्रमुख केन्द्रों का परिचय तथा शिला-चित्रों के महत्त्व का उल्लेख किया है। अज्ञात चित्रों की खोज कर स्वयं अनुकृत चित्रों की अनुकृतियों का निर्माण किया।’ इन चित्रों के माध्यम से गुप्त के कुशल चित्रकार होने के प्रमाण मिलते हैं। यह उनकी कलाओं के प्रति रूचि ही थी जिस कारण वह कला सम्बन्धी विभिन्न संस्थाओं के संस्थापक और सदस्य भी रहे जिनमें ‘केन्द्रीय संस्कृति समिति’, ‘रूप शिल्प’, ‘तूलिका’, ‘कला-संगम’ आदि प्रमुख हैं। इसके साथ ही समय समय पर उनके चित्रों की प्रदर्शनियां भी लगती रही है। गुप्त जी जैसे समर्थ कवि और चित्रकार भारतीय साहित्य में कम ही हैं। यह भी कहा जा सकता है कि गुप्त नें अपने अनुभवों को कूची और रेखाओं के साथ ही कलम को साथ ले कर अपनी अनुभूतियों को स्वर दिया है।

गुप्त का समग्र साहित्य वैचारिक चिंतन का दस्तावेज है। वह ‘मूलतः अखंड दृष्टि सम्पन्न रचनाकार थे। काव्य हो या चित्रकला, स्वाध्याय हो या समीक्षा, व्यष्टि हो या सृष्टि सर्वत्र उनकी अखंड चेतना लक्षित होती है। अपने व्याख्यानों तथा सन्निकट वार्ता में प्रो० गुप्त अखंड दृष्टि की चर्चा प्रायः करते हुए कहते थे कि उन्हें यह दृष्टि व्यास, कालिदास एवं तुलसीदास से मिली। व्यास के रास-वर्णन एवं कालिदास के श्रृंगार वर्णन में उन्हें कहीं भी टिप्पणी का अवसर नहीं दिखा। खंड दृष्टि का वे निषेध करते थे। रीतिकालीन कवियों की विशेषज्ञता तो उन्हें प्राप्त थी किन्तु अपनी अन्तरंगता में तुलसी से ही प्रेरित एवं प्रभावित रहे। अनेक बार उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनकी रचनाधर्मिता के मूल में तुलसी हैं।’11 यही द्रष्टि उन्हें कविता लिखने के लिए प्रेरित करती है और इसी के माध्यम से वह रेखाओं के साथ खेलते भी हैं। उनके लिए शब्द और रेखाएं खिलौने के समान हैं।

यह गुप्त की विशिष्टता ही है कि वह जितना ही चित्रकला की बारीकियों की भीतरी तंतुओं को जीते हैं उतना की कविता की तत्कालीन समस्याओं को भी पैनी नजर रखते हैं। गुप्त अपने समकालीन कवियों की श्रेणी में अपनी विचारात्मकता के कारण ही विशिष्ट माने जाते है। शम्भूनाथ सिंह, राम दरश मिश्र, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, विद्या निवास मिश्र, आदि में नई कविता की अलग विशेषताएँ दिखाई देती है तो जगदीश गुप्त में सर्वथा अलग। उन्होंने न केवल अपनी कविताओं के द्वारा नई कविता की नींव मजबूत की बल्कि, इस पर विचार पूर्वक व्याख्या करके उसकी इमारत को भी सँवारते रहे।  यह तो हुयी कविता की बात, इसी के बरक्स यदि उनके कला सम्बन्धी विचारों की बात की जाये तो उसमें भी इनका स्थान अलग ही दिखाई देता है। प्रत्येक साहित्यकार में साहित्य सृजन से इतर कुछ गुण मूलभूत रूप से विद्यमान रहते हैं, जगदीश गुप्त में वह गुण उनकी कला साधना के रूप में देखा जा सकता है।

 

सन्दर्भ-

1-         ’हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’- रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2011, पृ.सं.-233

2-         ’हिन्दी साहित्येतिहास की भूमिका’-भाग-3’ (आधुनिक काल)- डॉ सूर्य प्रसाद दीक्षित, उ.प्र. हिन्दी संस्थान, लखनऊ, संस्करण-2010, पृ.सं.-90

3-         नई कविताः स्वरूप और समस्यायें’- डॉ जगदीश गुप्त, पृ.सं.-280

4-         ’आधुनिक कवि’-विश्वम्भर मानव, राम किशोर वर्मा, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2008, पृ.सं.-256,257,

5-         वही, पृ.सं.-259

6-         नई कविताः स्वरूप और समस्यायें’- डॉ जगदीश गुप्त, पृ.सं.-102

7-         ’आधुनिक कवि’-वही, पृ.सं.-252

8-         जगदीश गुप्त का काव्य : मनन और मूल्यांकन, सं०-प्रो० हरिशंकर मिश्र, अनंग प्रकाशन दिल्ली, संस्करण-2014, पृ.सं.-25

9-         ‘छन्दशती-जगदीश गुप्त, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.सं.-108

10-       (नाँव के पाँव-जगदीश गुप्त, ‘वर्षा और भाषा’ कविता, पृ.सं.-07 )

11-       जगदीश गुप्त का काव्य : मनन और मूल्यांकन, वही, पृ.सं.-68