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कस्तूरबा गाँधी: ‘बा’ बनने की अंतर्कथा

कस्तूरबा गाँधी: ‘बा’ बनने की अंतर्कथा

                    मेघा

                                                                                     एम.फिल शोधार्थी

(स्त्री अध्ययन विभाग)

म.गाँ.अं.हि.वि (वर्धा)

8130656963

Megha4rexam@gmail.com

 


शोध सार:

प्रस्तुत शोध पत्र में कस्तूरबा गांधी गांधी उस पक्ष को सामने रखता है, जिसे इतिहास में कहीं छिप गया। कस्तूरबा गाँधी के पास महात्मा गाँधी के पत्नी होने के अलावा भी अलग पहचान भी थी। स्वतंत्रता की पहल देश से पहले अपने घर में ही विरोध दर्ज कर के किया था। महिला सशक्तिकरण का सन्देश उनसे ही मिलता है। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं को एकजुट कर आन्दोलन में उनकी सहभागिता बा के प्रयासों का ही परिणाम है। बा वह स्त्री शक्ति थी जो बाद में स्त्री मुक्ति का प्रतीक बन गयी थी। वह भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। बा ने सिर्फ बापू के जीवन में ही नही बल्कि पूरे देश के लिए मार्गदर्शक  का किरदार निभाया था।

की वर्ड:

इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन, महात्मा गांधी, महिला सशक्तिकरण।

 

प्रस्तावना

 

इतिहास के पन्ने को पलटते हुए जैसे जैसे हम पीछे जाएंगे, महिलाओं के अदम्य साहस के पूर्ण होने के कई उदाहरण सामने आते दिखेंगे| भारत की गौरवशाली इतिहास की विवेचना की जाए तो संस्कृति, परम्परा, राजनीति, अर्थशास्त्र, युद्ध, शांति, विद्या आदि कोई भी क्षेत्र में स्त्रियों का प्रत्यक्ष या कही नेपथ्य के रूप में अप्रत्यक्ष योगदान रहा है। १८५७ से १९४७  का वो दौर था जब ब्रिटिश हुकूमत से संघर्ष के दौरान पूरा देश एकत्रित होकर अपनी अपनी क्षमता के अनुसार जंग के मैदान में मौजूद था। हमारे देश के सत्ता की संरचना ही कुछ इस प्रकार कर दी गयी है,जहाँ मर्द शक्ति से पूर्ण और स्त्रियों की छवि राजा के शैय्या में भोग्या बन सीमित रह गयी हैं। स्त्रियों के ह्रदय की कोमलता को शारीरिक कोमलता पर इस कदर हावी कर दिया गया जाता है कि उनके द्वारा किये गये संघर्ष भी कही दफ़न हो जाते है। ‘स्वतंत्र भारत के गौरवशाली इतिहास’ के स्वर्णिम पन्नों में स्त्रियों द्वारा किये गये संघर्ष में दिए गये योगदान के साथ उनका नाम भी दफ़न कर दिया गया है या यह कह दिया जाए कि पुरुषों के बलिदान के बाद उनकी अर्धांगिनी का जिस प्रकार सती हो जाना होता था और ‘वीर’ शब्द बस उस राजा के साथ जुड़ता है जबकि अपने जिंदा शरीर को जलते आग में जला देने वाली वीरांगना का कोई ज़िक्र तक नहीं रहता बस शेष राख बच जाता है। इसी प्रकार स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष में पर्याय बनी ‘कस्तूरबा गाँधी’ के साथ था|

ऐसे दस्तावेज काफी कम है जिनमें कस्तूरबा के निजी जीवन या उनके व्यक्ति रूप में पहचान को रेखांकित किया जा सकता हो| १९ वीं सदी के भारत में एक निरक्षर स्त्री का एक पढ़े लिखे व्यक्ति के पत्नी के रूप में जुड़ना फिर धीरे धीरे एक लड़की से पत्नी धर्म निभाना सिखना। उस पद से जुड़ी इच्छाएँ ,कामनाएं और फिर इतिहास के एक बड़े चक्र के फलस्वरूप एक ऐसे व्यक्ति के पत्नी के पद को स्वीकार करना जिसकी ऊँचाई उन के समकालीनों के लिए भी एक पहेली थी। ११ अप्रैल १८६९ पोबंदर में जन्मी कस्तूरबा गाँधी ,जो की महात्मा गाँधी की पत्नी थी और जो भारत में ‘बा’ के नाम से विख्यात थी। इतिहास में कस्तूरबा गाँधी कि महत्ता मात्र मुख्यत: महात्मा गाँधी की पत्नी के रूप में स्थापित है। वाकई में उनका ऐतिहासिक परिचय महात्मा गाँधी के नाम के साथ ही जकड़ कर रखा गया है। कस्तूरबा गाँधी उन महिलाओं में से एक थी जिनकी स्वतंत्रता आन्दोलन की सक्रियता ने उन्हें स्वतंत्रता का पर्याय बना दिया था। गंभीर और शांत स्वभाव ने ‘बा’ के नाम से विख्याती प्रदान की। कस्तूरबा गाँधी अपने पिता गोकुलदास मकनजी,जो की पेशे से व्यापारी थे,उनकी तीसरी संतान थी। वह वक़्त ऐसा था जब लड़कियों को अक्षर ज्ञान से दूर रखा जाता था तथा शादी को प्रमुखता दी जाती थी। इसी परम्परा की शिकार कस्तूरबा गाँधी हुई फलस्वरूप मात्र 7 साल की अवस्था में उनकी सगाई 6 साल के मोहनदास से करा दी गयी थी। इस के पश्चात १३ साल की छोटी उम्र में वे दोनों विवाह के बंधन में बंध गए। ‘बा’ का व्यक्तित्व और महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का तुलनात्मक पूर्ण अध्ययन किया जाए तो ‘बा’ का व्यक्तित्व ज्यादा चुनौतीपूर्ण दृष्ट्व्य होगा। अक्षरों का बोध न होना अज्ञानी होना कतई नही होता है। भारतीय नारी के परम्परागत संस्कार के रूप बुद्धि और व्यवहार कस्तूरबा में यथेष्ट थी। उन्होंने अपने आचरण से ही त्याग ,सेवा, करुणा,अहिंसा को परिभाषित किया था। दया और करुणा के पाठ को पढ़ाने के लिए उन्हें किसी किताबी अक्षरों की पहचान की जरुरत नहीं पड़ी थी। महात्मा गाँधी ज्ञानी होने के बाद अगर राष्ट्रपिता माने गये तो दूसरी तरफ कस्तूरबा गाँधी जो की इन के ठीक विपरीत  एक ऐसा उदाहरण थी जो निरक्षर हो कर भी ‘राष्ट्रमाता’ बन गयी थी। महात्मा गाँधी ने इन के बारे में कहा था कि –

“अहिंसा का सन्देश कस्तूरबा से सिखा जा सकता हैं। कस्तूरबा के बिना अहिंसा के प्रयत्नों और आत्म संयम में मैं सफल नहीं हो सकता था।”

गाँधी के जीवन में बा उस बीज की भांति थी जिसने छायादार वटवृक्ष को आकार तो दी दिया पर स्वयं मिट्टी के अंदर दब चुकी थी। वे इस बात को स्वीकार भी करते है कि – “जो लोग मेरे और बा के निकट संपर्क में आए है उनमे अधिक संख्या तो ऐसे लोगों की है जो मेरे अपेक्षा बा में अधिक श्रद्धा रखते है।”कहा जाता है कि ‘हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है।’ यह कथन कस्तूरबा गाँधी पर अक्षरस सत्य सिद्ध होती है। गाँधी जी का व्यवहार निरंकुश ,अनुशासन प्रिय ,हठी व्यक्तित्व का था जिसके साथ कस्तूरबा गाँधी ने अपनी निरक्षता के बावजूद पूर्ण रूप से कदम कदम पर समझौता किया। उनकी प्रत्येक अच्छी बुरी बात को शिरोधार्य किया। वह स्वयं में एक बड़ी शख्सियत थी। हांलाकि उनकी निरक्षरता बापू को चुभती थी और उन्होंने कस्तूरबा के जिंदगी के श्यामपट्ट को थोड़ा पढ़नेयोग्य बना दिया था। कस्तूरबा धीरे धीरे बापू के गुणों में सहज रूप में समाती गयी थी। उनके वैवाहिक  जीवन में कस्तूरबा के स्वतंत्रता प्रिय व्यवहार उनके व्यवहार के ठीक विपरीत था।  वैवाहिक  जीवन में बापू ईष्यालु तथा शक्की पति की भूमिका निभा रहे थे। वे आत्मविश्वास के साथ साथ दृढ़ इच्छा शक्ति से पूर्ण स्त्री थी ,उन्हें बापू का यह अनुचित व्यवहार कभी रास न आया जिस कारण उन्होंने इसका विरोध भी किया। विवाह के आरंभिक काल में पुरुषों को प्राय: अपनी महत्ता तथा स्वामित्त्व सिद्ध करने का जोश रहता है लेकिन स्त्रियाँ स्वभाव से ही सहनशील और धैर्य की प्रतिमूर्ति होती है। इन्हीं कारणों से गृहस्थी का जहाज विवाद के शिला से टकराने से बचा रहता है। एक स्वतंत्र भारत की कल्पना का खाका खीचनें में अगर आपसी रिश्तों में ही अविश्वास ,शक और जकड़न आने लगे तो वह स्वतंत्रता किस काम की ? भविष्य में स्वतंत्र भारत में भी पत्नियां अपने चारदीवारों के बीच कैद रहे तो यह उस संघर्ष के साथ भी न्याय न था। कस्तूरबा गाँधी स्वंतत्र स्त्री थी। स्वयं के उपर किसी के आदेश की मुहिम तक लगने नहीं दी थी। यह अधिकार अपने पति तक को नही दिया था। उनका ढंग समझौतापरक होता था,चुनौती भरा नहीं। अपनी जिंदगी को अपने बनाए सिद्धांत के अनुसार निर्वाह किया। अपने समझ से परे हर एक तथ्य को अस्वीकृत कर दिया था। यह सर्वविदित है कि कस्तूरबा गाँधी एक धर्मपरायण महिला थी। जिन्होंने जीवनसाथी की परिभाषा को पूर्णता प्रदान किया था। वो एक अच्छी और श्रेष्ठ पत्नी बनना चाहती थी पर उन्होंने अपने स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा के साथ ये धर्म निभाया। गाँधी और कस्तूरबा के चार संतान हुए, हरिलाल गाँधी, मणिलाल गाँधी,रामदास गाँधी और देवदास गाँधी। हालांकि शारीरिक कमजोरी और अस्वस्थता के कारण कस्तूरबा के पहले बच्चे की मृत्यु हो गयी थी। उस परिस्थिती को बांटने वाला भी कोई नहीं था।दिन भर काम की व्यस्तता के बावजूद अपनी भावनाओं के समक्ष रात में कमजोर पड़ जाती थी। गाँधी के इंग्लैंड प्रवास के दौरान वो अकेली ही रही थी। गाँधी ने १८९६ में कस्तूरबा गाँधी को अपने साथ दक्षिण अफ्रीका ले गये थे। दक्षिण अफ्रीका जाने से मृत्यु तक बा ने गाँधी के जीवन का अनुसरण किया है। 

बा के राजनीतिक जीवन के चहल कदमी को देखा जाए तो वो एक सक्रिय  कार्यकर्ता थी। पति के साथ काम करते करते  वो भी एक स्वतंत्र सेनानी बन गयी थी। एक स्त्री और पुरुष के बीच के अंतर को समाप्त करते हुए दक्षिण अफ्रीका में बा ने बापू का साथ बढ़ चढ़ कर दिया। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भारतीयों की दशा में आन्दोलन किया और सक्रिय भागीदारी के कारण तीन महीने की जेल में कड़ी सजा के दौर से भी गुज़री थी। जेल में भी अधिकारीयों के रवैये को सुधार दिया। हिन्दू विवाह जो कि रजिस्टर न होने के कारण उसकी वैधता को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने रद्द कर दिया था,जिस के खिलाफ़ बा के नेतृत्व में सभी वर्ग की महिलाओं ने सत्याग्रह निकाला था। कस्तूरबा गाँधी के नेतृत्व में यह पहला आन्दोलन और उनकी पहली  जीत थी। १९०४ से १९१४ तक ,दुर्बन में वह फिनिक्स सेटलमेंट में सक्रिय रही। १९१५ में भारत वापसी के बाद गाँधी के साथ साबरमती आश्रम में लोगो की मदद करने लगी थी। जब जब गाँधीजी जेल गये तब तब गाँधी के नेतृत्व के स्थान को उन्होंने ग्रहण किया।

 भारत में दार्शिक स्थलों में शामिल साबरमती और सेवाग्राम आश्रम जो की कस्तूरबा गाँधी और बा की कर्मभूमि रह चुकी है। साबरमती आश्रम के संचालन का काम बा के पास था। आश्रम में सफाई, शिक्षा, बागवानी, व्यावसायिक शिक्षा, अनुशासन सब के महत्व को बताया जाता था। जगह जगह घूम कर जरुरतमंदों को दावा का वितरण का कार्य भी करती थी। काम के प्रति स्नेह ने उन्हें कर्मठ छवि प्रदान कर दी थी। स्वयं अशिक्षित होने के बावजूद बा ने महिलाओं का अध्ययन के प्रति उत्साहवर्धन किया था। जब देश में छुआछूत कि आबों हवा बह रही थी तब हरिजनों के लिए वो परिवर्तन की आवाज थी। उनके आश्रम में सभी वर्ग एक ही छत और नियम के साथ रहते थे। यही पर जाति वर्ग भेदभाव पर धुल पद जाता है। पुरानी परम्परा और रूढ़ियों को तोड़ने के लिए उन्होंने ‘लक्ष्मी’ नाम की एक बेटी को गोद लिया था। यहाँ वह सेनानी के रूप में नहीं बल्कि एक माँ के रूप में क्रांति कर रही थी। पंजाब में एक आन्दोलन में उन्होंने कहा भी था कि- “ हरिजन आन्दोलन अब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। यह हमारे दिलों पर गहराई से छा गया है। इसके बिना हम धर्म और सच्चाई के रास्ते पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते है। छुआछूत के पाप को हम सिर्फ त्याग और सेवा से धो सकते है।”

चंपारण सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान भी बापू के साथ परछाई  बन साथ देती रही। इसके साथ साथ स्त्रियों का उत्साहवर्धन भी करती रही। बा की निरक्षता पर विवेक की साक्षरता को देख के स्वयं गाँधी जी ने कहा था-“मेरे हर राजनीतिक संघर्ष में वो मेरे साथ होती थी,वो सच्ची शिक्षा का उदाहरण थी।”

गाँधी जी सादगी का इतना आग्रह करते थे, इसके बावजूद बा के पास उनके समान से भी आधा समान था जो इस बात का परिचय देता है कि बा की जरुरत कितने कम है और वो सादगी में गाँधी को भी पीछे छोड़ चली थी। १९१७ में बिहार के चंपारण में बापू के साथ चली गयी।  वहाँ किसान नील के खेती करने को मजबूर थे। किसानों की इस समस्या का समर्थन करते हुए नील की खेती का विरोध किया गया। चंपारण में ही बा ने एक कुटिया का निर्माण करवाया यहाँ बच्चों को शिक्षा के साथ सफाई सिखाया। यहाँ भी बा का शिक्षा को लेकर जागरूकता को देखा जा सकता हैं। देश की प्रगति का प्रतीक चरखा बन गया इसके साथ साथ गरीबी का राम बाण के रूप में इस चरखे को प्रयोग किया गया। १९१८ में गुजरात के खेड़ा गाँव में अकाल पड़ा। सरकार ने किसानों के लगान को माफ़ नहीं किया था। इसके विरोध में बा ने गाँधी जी के साथ सत्याग्रह किया। गाँधी जी गिरफ्तार हो गये। बा का हौसला तब भी बना रहा। १९२० में असहयोग आन्दोलन में सरकारी चीजों का बहिष्कार शुरू हुआ। गाँधी जी 6 साल के लिए गिरफ्तार किये गये। जब जब आंदोलनों में गाँधी जी गिरफ़्तार किये गये,कस्तूरबा गाँधी तब तब आन्दोलन की रीढ़ की हड्डी बन मोर्चा का नेतृत्व करती रही। १९२८ में गुजरात  के बारडोली में सरकार ने २२% लगान बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में सरकार के खिलाफ़ सत्याग्रह शुरू किया। इस आन्दोलन में विशेष बात यह थी कि कस्तूरबा गाँधी के आह्वान पर पहली बार वहाँ की महिलाओं ने इस आन्दोलन में अपनी सहभागिता प्रदान की थी। स्त्री शक्ति को जागरूक कर संघर्ष में आमने सामने लाने में कस्तूरबा गाँधी सफल हुई। १९३० में गाँधी, नमक आन्दोलन के दौरान नमक में लगाये हुए कर के खिलाफ़ दांडी यात्रा कर रहे थे। उसी दौरान कस्तूरबा गाँधी स्त्रियों को एकजुट कर शराब बंदी के लिए दूकानों पर धरना दे रही थी। स्त्रियों को एकजुट कर महिला शक्ति का परिचय कस्तूरबा ने अपने सफलतापूर्ण प्रयास से किया। बा निरंतर रचनात्मक कार्य में लगी रहती थी। सभी महिलाओं के हिम्मत और प्रेरणा का स्रोत बा थी। परिणामस्वरूप सूरत के दूकान बंद हो गयी। अपने अदम्य साहस का परिचय कस्तूरबा ने तब दिया जब अंग्रेज उनके सारे समान को जब्त कर रहे थे तब उन्होंने सन्देश  दिया कि –“ हम चटाइयों के झोपड़ी में रहेगे और मिट्टी के बर्तन रखेगे,फिर देखे वे क्या ले जाते है ?” नमक आन्दोलन का परिणाम देश को उसकी सफलता के साथ साथ यह भी अदा करना पड़ा,कुछ परिणाम यह भी थे जैसे गाँधी जी की गिरफ्तारी स्वयंसेवकों पर लाठी का प्रहार। कस्तूरबा ने उन स्वयंसेवकों का इलाज करवाया तथा अपने शब्दों से उनके हौसलों ने फिर से उड़ान भर दी। 

रचनात्मकता का साथ वो कभी छोड़ नहीं पायी थी। यही वजह है कि १९३२-३३ के कारावास काल में भी वो डायरी लिखने लगी थी। डॉ. सुशीला नय्यर जो बा की पारिवारिक चिकित्सक थी उन्होंने बताया की –‘बा ने कभी भी यह नहीं दर्शाया की वह असाधारण काम कर रही है। अपनी इच्छा से सभी सुख साधन छोड़ कर गरीबी को अपनाया था। उनका यह त्याग इतिहास में दर्ज रहेगा।” बिजल पुर जलाल पुर परिषद् के अध्यक्ष पद पर कस्तूरबा गाँधी को सम्मानित किया गया था।

यह प्रश्नवाचक चिन्ह इस संदर्भ में लगता है कि क्या यह देश इस अदम्य साहस और  त्याग को इतिहास में दर्ज कर पाया है ?

महात्मा गाँधी और कस्तूरबा गाँधी के बीच सम्बन्ध मात्र पति पत्नी के बंधन में ही नहीं बांधा था बल्कि मित्र,गुरु या ये कहना उचित रहेगा कि वे दोनों एक इसरे के पूरक थे। दूसरों कि निस्वार्थ सेवा कि भावना उनमे पूर्ण रूप से समाहित थी। गुजरात के किसी इलाके के किसानों कि पत्नियों के द्वारा उन्हें तार भेजा गया था,जिनमे बा को साथ देने की गुहार की गयी थी। उनके पतियों को लगान ना देने के जुर्म में बंदी बना दिया गया था। बा के शरीर का साथ नहीं दे पाने के बावजूद उन्होंने वहाँ पहुँच कर सबका हौसला बढ़ाया।

 आज़ादी की अंतिम लड़ाई १९४२ में ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो ‘ के साथ आगाज़ किया था। कस्तूरबा गाँधी विभिन्न महिला संगठनों के साथ सक्रिय थी। जन जन का नारा “करो या मरो” था। यह नारा यह उनके दिलों दिमाग में अंकित हो चुका था। ९ अगस्त १९४२ को कस्तूरबा गाँधी उस स्थान पर पहुँची जहाँ बापू को भाषण देना था। उससे पूर्व ही बापू गिरफ़्तार हो चुके थे पर बा को भी आन्दोलन की मजबूत कड़ी होने का क़र्ज़ गिरफ्तार हो के चुकाना पड़ा। उन्हें भी पूना के आगा खां महल में बंद कर दिया गया जहाँ सरकार ने बापू को रखा था। १८ महीने का जेल का जीवन कस्तूरबा का बुड्ढा शरीर झेल नही पाया। २२ फरवरी १९४४ को दिल का दौरा पड़  जाने  के कारण बा पंचतत्व में विलीन हो गयी। अपनी आत्मकथा में गाँधी जी ने स्वीकार किया है कि कस्तूरबा  ने उनके जीवन और लक्ष्यों को ही अपना जीवन और लक्ष्य बना लिया था। 

कस्तूरबा गाँधी का अक्स महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता शब्द के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से छुपा हुआ है। बा जैसा आत्मबलिदान का प्रतीक व्यक्तित्व उनके साथ नही होता तो गाँधी जी के सारे अहिंसक प्रयास इतने कारगार नहीं होते। बापू के सार्वजनिक जीवन को पुख्ता विचारों से उज्जवल बनाया और बा ने जो स्थान बापू के जीवन में बनाया था उनके गुजर जाने के बाद वो स्थान सूना ही रहा। वह एक असाधारण स्त्री के रूप में उभरी जो त्याग ,साहस और विश्वसनीय रूप में गाँधी को पूर्ण रूप से समर्पित शिष्या थी। इसके साथ ही बहुत ही प्रभावी आलोचक भी रही है।

निष्कर्ष

इन तमाम घटना चक्रों से यह तथ्य सामने आता है कि कस्तूरबा गाँधी के पास महात्मा गाँधी के पत्नी होने के अलावा भी अलग पहचान भी थी। बापू के पत्नी के तौर पर उनका व्यक्तित्व आम पत्नियों से काफी विशाल था। उनका अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण था। स्वतंत्रता की पहल देश से पहले अपने घर में ही विरोध दर्ज कर के किया था। महिला सशक्तिकरण का सन्देश उनसे ही मिलता है। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं को एकजुट कर आन्दोलन में उनकी सहभागिता बा के प्रयासों का ही परिणाम है। एक आम धर्मपरायण गुजराती पत्नी को पति के अजीबोगरीब सनक और जिद के चलते कई तकलीफे उठानी पड़ी पर सही वक़्त आने पर प्रतिरोध भी दर्ज किया। बापू के सारे आन्दोलनों के नीव की ईट के रूप में बा टिकी हुई थी। अहिंसा के पुजारी के नाम से विख्यात महात्मा  गाँधी ने अहिंसा का पाठ स्वयं बा से ही सीखा था। स्वतंत्र देश  का सपना दोनों ने देखा था पर अंतिम परिणाम तक के दौर में बा नही पहुँच पायी थी पर इतिहास उन्हें अपने पन्नों से धूमिल नही कर सकता है। बा वह स्त्री शक्ति थी जो बाद में स्त्री मुक्ति का प्रतीक बन गयी थी। वह भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। बा ने सिर्फ बापू के जीवन में ही नही बल्कि पूरे देश के लिए मार्गदर्शक  का किरदार निभाया था। वह एक ऐसे स्त्री छवि थी जो घर में पत्नी की भूमिका में ,समाज में स्वतंत्रता आन्दोलन की एक वीरांगना के रूप में,जरुरतमंदों के लिए सेवा की प्रतिमूर्ति के साथ बापू की छवि की आधारशिला स्तम्भ के रूप में बा की एक अंतर्कथा थी। नए दौर में कस्तूरबा गाँधी उस शब्द में तब्दील होती जा रही है जिसने देश के लिए बापू से भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और जिस से बापू की हिम्मत बनी रही पर अब उस शब्द को ही कफ़न ओढ़ा दिया गया है।  

 

                                                                 

 

संदर्भ ग्रंथ-

१.किशोर,गिरिराज ,२०१६, “बा”,राजकमल प्रकाशन

२.कुमार,राधा ,२०१४, “स्त्री संघर्ष का इतिहास”,वाणी प्रकाशन

३.आर्य,साधना ,निवेदिता मेनन ,जिनी लोकनीता (संपादक),२०१३, “नारीवादी राजनीती संघर्ष और मुद्दे”,हिंदी माध्यम आर्यान्वन निदेशालय दिल्ली विश्वविद्यालय

४.Adhar,Neelima Dalmia,2016, “The secret diary of Kasturba”,Kindle Edition